वर्षांत के समय में 90 प्रतिशत आपदाओं का कारण पानी है। दूसरी ओर पानी जीवन का आधार है। यह चाहे नदियों, जल स्रोतों, जलाशयों, बारिश की बूदों आदि के रूप में जहां से भी आ रहा हो, मानसून के समय में इन स्रोतों में पानी की मात्रा बढ़ जाती है। लेकिन यही समय है जब अधिक से अधिक पानी जमा करके साल भर की आवश्यकता की पूर्ति की जा सकती है। यदि वर्षांत से पहले तालाबों का निर्माण किया जाता है, तो इनमें पर्याप्त मात्रा में पानी जमा हो जाएगा। इसके कारण जल स्रोतों में भी पानी बढ़ जाता है, और छोटे-बड़े नालों में बहाव तेज दिखाई देता है। पर्वतीय क्षेत्रों में इसी पानी से रोपाई का काम पूरा होता है।
लेकिन पानी की चिंता गर्मियों में अधिक होती है, जब जल स्रोत सूखने लगते हैं। घरों में पानी की आपूर्ति रुक जाती है। कम पानी से काम चलाने की नसीहत मिलती है। गर्मियों में कई स्थानों पर लोगों की प्यास बुझाने के लिए गाड़ियों और मालवाहक पशुओं की पीठ पर बस्तियों में पानी पहुंचाया जाता है। बीहड़, रेगिस्तान या पहाड़ों की ऊंचाई पर बसे गांवों की महिलाएं दिन-भर एक गागर पानी भी ढूंढ़कर नहीं ला पाती हैं। कुछ दूरस्थ स्थानों से बड़ी मेहनत करके पानी लेकर भी आएं तो, वह साफ पानी के रूप में नसीब नहीं होता है। ताज्जुब इस बात का है कि वर्षांत के मौसम में भी पीने के पानी की कमी होती है।
कहा जा रहा है कि पूरी दुनिया के हिसाब से हर दस में से चार लोगों को पर्याप्त पानी नहीं मिल रहा है, जो मिलता भी है, वह इतना प्रदूषित है कि उसके कारण तीन-चार लाख बच्चे हर साल डायरिया के कारण मर जाते हैं। सच्चाई यह भी है कि बोतल बंद पानी के नाम पर कमाई का एक बड़ा साधन बन गया है, जिसके कारण गरीब, किसान, आदिवासी बेपानी बन रहे है। जबकि संयुक्त राष्ट्र ने जुलाई, 2010 में हर व्यक्ति को प्रतिदिन 50-100 लीटर पानी दिलाने का अधिकार दिया है।
इनके इस प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि प्रतिव्यक्ति पानी का स्रोत एक किमी से अधिक दूर नहीं होना चाहिए, और वहां पानी एकत्रित करने में 30 मिनट से अधिक का समय न लगे। इसके अनुसार प्रत्येक देश को अपने पानी का बंदोबस्त करने के लिए स्थानीय लोगों की पारंपरिक व्यवस्था को ही मजबूती प्रदान करनी होगी। गांव एवं शहर में पानी के स्रोतों को चिह्नित करके लोक ज्ञान के अनुसार स्थानीय जल प्रणाली के सुधार के लिए मास्टर प्लान तैयार करना चाहिए। इसको कार्यरूप देने के लिए जल संबंधी विभागों को अपनी चिर-परिचित जल व्यवस्था छोड़नी पड़ेगी। ठेकेदारों और प्रभावशाली लोगों के दबाव से मुक्ति पानी होगी।
यह काबिले गौर है कि देश में पानी की नीति में सबसे पहले पेयजल, इसके बाद सिंचाई और उद्योगों व कारोबारियों, को जलापूर्ति करने की प्राथमिकता को स्वीकारा गया है। परंतु इसकी जमीनी हकीकत देखें, तो पानी व्यापारियों के मुनाफे की वस्तु बन गया है। इसके सामने जनकल्याणकारी व्यवस्था लाचार है। पानी की बर्बादी और जलस्रोतों के विनाश में मानवीय हस्तक्षेप सबसे बड़ा कारण है। दूसरी ओर वैज्ञानिक मानते हैं कि बारिश के पानी का संचय न होने से वह समुद्रों व महासागरों में मिट्टी काटकर ले जा रहा है। वर्तमान में नदियों और भूमिगत पानी का अधिकांश भाग प्रदूषित हो चुका है। अतः बरसात में पानी को एकत्रित व संरक्षित करने की व्यवस्था की जाए, तो यह भविष्य की सुख-समृद्वि लौटा सकता है।
-लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।