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जब मिलेंगे ट्रंप और किम

सुरेंद्र कुमार, पूर्व राजदूत Updated Wed, 16 May 2018 06:19 PM IST
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ट्रंप व किम
यह लंबे कद के 'मानसिक रूप से विक्षिप्त बूढ़े' और छोटे कद के 'रॉकेट मैन' के बीच चल रही प्रतिद्वंद्विता है। ऐसा लगता है, मानो जापानी सम्राट की तरह वे सूमो कुश्ती का मुकाबला देखते रहे हैं और उससे ही दांव-पेच सीखा है। दरअसल यही एकमात्र ऐसा खेल है, जिसमें भारी-भरकम पहलवान के लिए उसका वजन बोझ नहीं माना जाता, बल्कि यह उसकी संपत्ति है, इसके दम पर प्रतिद्वंद्वी को पटखनी दी जा सकती है। बेशक अपने वजन का बहुत चालाकी के साथ इस्तेमाल करना पड़ता है।


अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के राष्ट्रपति किम जोंग, दोनों जिस तरह से अप्रत्याशित और सनक भरे कदम उठाते हैं, उसे सामान्य व्यवहार के एकदम उलट कहा जा सकता है। वास्तव में इन दोनों ने राष्ट्र प्रमुख की पारंपरिक छवि को ध्वस्त करने के साथ ही मीडिया को भी बेचैन कर दिया है। इस वजह से वह उनके संदेश नहीं पकड़ पाता। अमेरिका और उत्तर कोरिया के संदर्भ में 12 महीने का समय काफी लंबा वक्त होता है।


ऐसा लगता है कि घड़ी का पेंडुलम पूरे 180 डिग्री घूम गया और जहां युद्ध की आशंका जताई जा रही थी, वहां अब वार्ता की मेज पर दोनों का इंतजार किया जा रहा है। अमेरिका और उत्तर कोरिया के राष्ट्रपति, दोनों के रिश्ते बेहद बदतर स्थिति में पहुंच गए थे और अब दोनों खुद के विजेता होने का दावा कर सकते हैं। किम के मिसाइल परीक्षणों से भड़ककर ट्रंप ने  ट्वीट किया था कि उन्हें ऐसे गुस्से का सामना करना पड़ सकता है, जैसा दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा। 11 अप्रैल, 2017 को उन्होंने चेतावनी दी, 'सैन्य समाधान की तैयारी पूरी कर ली गई है, उत्तर कोरिया को संभल जाना चाहिए। उम्मीद है किम जोंग उन सबक सीखेंगे।'


संयुक्त राष्ट्र महासभा में उन्होंने 18 सितंबर को अपने पहले संबोधन में टिप्पणी की, 'रॉकेट मैन आत्मघाती राह पर है।' वाकई ट्रंप ने यह कहते हुए सारी दुनिया को अवाक कर दिया था कि 'अमेरिका उत्तर कोरिया को तबाह कर देगा'। किम ने भी तीखे शब्दों में पलटवार किया और ट्रंप को ऐसा 'राजनीतिक विद्रोही' करार दिया, जो 'सर्वोच्च कमांडर बनने के काबिल नहीं है' और 'ऐसा सरगना है, जिसे आग से खेलना पसंद है'।


संयुक्त राष्ट्र महासभा में ट्रंप के भाषण के एक दिन बाद किम ने यह कहते हुए हिसाब बराबर किया, 'मैं निश्चित रूप से मानसिक रूप से विक्षिप्त बूढ़े को काबू में करूंगा'। 


इसे भले ही खोखली बयानबाजी कहकर खारिज कर दिया जाए, मगर 28 सितंबर, 2017 को उत्तर कोरिया ने सफलतापूर्वक इंटर कांटिनेंटल बैलास्टिक मिसाइल ह्ववांग-15 का परीक्षण किया, मिसाइल विशेषज्ञ डेविड राइट के मुताबिक, इसकी रेंज 8,078 मील थी और यह वाशिंगटन तथा अमेरिका के पश्चिमी तट के अनेक शहरों, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया तक मार कर सकती है।


उम्मीद के मुताबिक, अमेरिका, रूस, चीन और यूरोपीय देशों ने इस पर चिंता जताई। जेम्स मार्टिन इंस्टीट्यूट ऑफ नॉन प्रोलिफरेशन की मेलिसा हैन्हम के मुताबिक, उत्तर कोरिया ने इसके जरिये यह दिखाने की कोशिश की कि वह जो चाहता था, वह उसने हासिल कर लिया है। तो क्या यह ट्रंप और किम के लिए क्यूबा के मिसाइल संकट जैसा क्षण है? क्या वह जॉन एफ केनेडी और निकिता ख्रुश्चेव की तरह तनाव के शिखर पर पहुंचकर अपने पैर वापस नहीं खींच रहे हैं? वास्तव में वह व्यावहारिक राजनीति कर रहे हैंः अपने विरोधी से बात करने से पहले उस पर काफी दबाव बनाओ और कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत के बल पर वार्ता की मेज पर आओ। 
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ट्रंप और किम के अलावा तनाव कम करने का श्रेय दक्षिण कोरिया और चीन के राष्ट्रपतियों को भी दिया जाना चाहिए। अगस्त, 2017 में दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति मून ने कहा था, 'कोरिया प्रायद्वीप में अब कोई युद्ध नहीं होना चाहिए। हमें चाहे जिस स्थिति का सामना करना पड़े, उत्तर कोरिया की स्थिति का शांतिपूर्ण समाधान निकाला जाना चाहिए। मुझे विश्वास है कि अमेरिका वर्तमान परिस्थितियों में शांतिपूर्ण ढंग से प्रतिक्रिया व्यक्त करेगा और ऐसा कदम उठाएगा, जिसमें हमारे हितों का ध्यान हो।' सार्वजनिक रूप से अमेरिका के लिए यह कड़ा संदेश था। 


शी जिनपिंग, जिनसे ट्रंप किम पर और मिसाइल परीक्षण न करने के लिए दबाव डालने के लिए कह रहे थे, चाहते थे कि यह सुनिश्चित किया जाए कि चौतरफा घिरते जा रहे उत्तर कोरिया की सत्ता प्रतिबंधों के बावजूद ध्वस्त नहीं होगी और ट्रंप-किम के बीच चल रही जुबानी जंग ऐसे खुले विवाद में न बदल जाए, जिसमें चीन के लिए किसी एक पक्ष का साथ देना जरूरी हो जाए। चीन यह उम्मीद कर रहा है कि कोरियाई प्रायद्वीप में जो कुछ घट रहा है, उसमें उसे भी विश्वास में लिया जाए।


मसलन, मून-किम की मुलाकात और ट्रंप-किम की प्रस्तावित मुलाकात के बाद के सारे घटनाक्रम। उत्तर और दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपतियों की 27 अप्रैल को हुई ऐतिहासिक मुलाकात सकारात्मक रही है। दोनों ने न केवल हाथ मिलाए, एक दूसरे से गले मिले और एक दूसरे के बारे में सकारात्मक तथा भविष्योन्मुखी बातें कीं। मून ने इसे एक नए युग की शुरुआत करार दिया और कहा कि कोरिया प्रायद्वीप में अब कोई युद्ध नहीं होगा।


वहीं किम ने एकीकरण की महत्वाकांक्षा जताई और कहा, एक भाषा, एक संस्कृति, और एक इतिहास के साथ दक्षिण और उत्तर कोरिया एक देश के रूप में फिर से एक होंगे, ताकि स्थायी तौर पर शांति और समृद्धि हासिल कर सकें। अमेरिका और चीन के उतार-चढ़ाव भरे इतिहास और उनके रिश्ते को देखकर यही कहा जा सकता है कि यह तो समय ही बताएगा कि मून और किम कितनी दूर तक साथ जाएंगे। वास्तव में ट्रंप और किम की प्रस्तावित मुलाकात पर बहुत कुछ निर्भर है। 


तो क्या ट्रंप अब शांति के नोबेल के दावेदार हो जाएंगे? उनके दबाव ने काम किया है। मून और किम ने शांति के बीज बो दिए हैं, अब कोंपलें फूटने का इंतजार है।
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