परंतु देवता और असुर, दोनों की दृष्टि एक लक्ष्य पर थी और वह था अमृत, क्योंकि उसे पीने वाला अमर हो जाता। आखिर वह क्षण आ ही गया। समुद्र से एक तेजस्वी, दिव्य पुरुष प्रकट हुए। वे भगवान धन्वंतरि थे, जो अपने हाथों में अमृत-कलश लेकर समुद्र में से निकले थे। वे न केवल आयुर्वेद के प्रवर्तक माने जाते हैं, बल्कि उन्होंने मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कर ली थी।
देवता कुछ कर पाते, इससे पहले वृषपर्वा नामक एक दैत्य ने चालाकी से अमृत-कलश छीन लिया और उसे लेकर पाताल लोक की ओर भाग गया। देवता भी पाताल लोक पहुंचे और दैत्यराज बलि से अमृत वापस मांगा। बलि मुस्कराकर बोला, ‘हे देवताओ! तुम लोगों को समुद्र मंथन से लक्ष्मी, कामधेनु, ऐरावत, और बहुमूल्य रत्न मिल चुके हैं। असुरों को केवल अमृत चाहिए था।’ निराश देवता भगवान विष्णु के पास पहुंचे और उन्हें अपना दुख बताया।
विष्णु मुस्कराए और बोले, ‘घबराओ मत। मैं योगमाया से दैत्यों को मोहित कर अमृत तुम्हारे पास पहुंचा दूंगा।’ यह कहकर भगवान विष्णु ने मोहिनी नामक अत्यंत सुंदर, मोहक स्त्री का रूप धारण किया और असुरों के पास पहुंच गए।
उधर, पाताल में असुरों में अमृत बांटने को लेकर परस्पर विवाद छिड़ चुका था। तभी वहां मोहिनी प्रकट हुईं। उनका रूप इतना सुंदर था कि सभी दैत्य उन्हें देखकर मंत्रमुग्ध हो गए। दैत्यराज बलि ने विनम्रता से कहा, ‘हे देवी! हमारे बीच अमृत वितरण का झगड़ा है, कृपया आप इसे उचित रूप से बांट दीजिए।’
मोहिनी मुस्कराईं और बोलीं, ‘स्त्रियों पर विश्वास करना मूर्खता है, क्योंकि वे माया, छल और निर्भीकता के लिए विख्यात होती हैं। फिर भी यदि तुम कहते हो, तो मैं अमृत बांट दूंगी, लेकिन यह निर्णय सोच-समझकर लो।’ दैत्यों ने मोहिनी पर पूर्ण विश्वास प्रकट किया। मोहिनी ने सुझाव दिया, ‘आज अमृत को सुरक्षित रखो, व्रत रखो और कल सुबह शुद्ध होकर अमृत को ग्रहण करना। सच्ची भक्ति वही है, जिसमें त्याग होता है।’ असुरों ने मोहिनी की बात मान ली।
अगले दिन सभी दैत्य स्नान आदि करके तैयार होकर पंक्तियों में बैठ गए। मोहिनी अमृत-कलश लेकर आईं। तभी देवता भी वहां आ पहुंचे। मोहिनी ने मुस्कराकर असुरों से कहा, ‘ये लोग तुम्हारे अतिथि हैं। धर्म के अनुसार, अतिथि देवो भवः, इसलिए इन्हें भी अमृत का भाग मिलना चाहिए।’ दैत्यों ने यह बात भी मान ली।
मोहिनी ने सबसे पहले देवताओं को अमृत पिलाना शुरू किया। एक-एक कर सब देवताओं ने अमृत का सेवन कर लिया। तभी राहु नाम का एक दैत्य चुपचाप देवताओं की पंक्ति में आ बैठा और अमृत पीने का प्रयास करने लगा। परंतु सूर्य और चंद्रमा ने उसे पहचान लिया और विष्णु को संकेत करके बता दिया। विष्णु ने तुरंत सुदर्शन चक्र से राहु का सिर काट दिया।
अमृत की कुछ बूंदें पी लेने से राहु के सिर का भाग अमर हो चुका था। वह उड़कर आकाश में जा पहुंचा। लेकिन उसे सूर्य और चंद्रमा पर क्रोध आ रहा था। इसलिए वह चंद्रमा को निगलने के लिए दौड़ा। चंद्रमा भयभीत होकर भगवान शिव की शरण में पहुंच गया। तब शिव ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर स्थान देकर उसकी रक्षा की। तभी राहु वहां पहुंचा और शिव से बोला, ‘हे प्रभु! चंद्रमा मेरा ग्रास है। कृपया मुझे लौटा दें।’ शिव मुस्कराए और बोले, ‘मैंने चंद्रमा को शरण दी है, इसलिए अब यह मेरे द्वारा रक्षित है।’ इस तरह चंद्रमा को शिव के मस्तक पर स्थान मिला और शिव स्वयं ‘चंद्रशेखर’ कहलाए।