1930 के दशक में मनोवैज्ञानिकों ने आक्रामक व्यवहार के संबंध में एक परिकल्पना विकसित की थी, जिसके मुताबिक, जब किसी व्यक्ति का लक्ष्य किसी तरह से बाधित होता है, तो यह कुंठा की ओर ले जाता है, जिसके परिणामस्वरूप आक्रामकता पैदा होती है।
आक्रामकता को कुंठा की इस अप्रिय स्थिति को दूर करने का एक ‘स्वाभाविक’ तरीका माना जाता था। अगले कुछ दशकों में, इस परिकल्पना को ज्यादातर मनोवैज्ञानिकों ने जटिल मानवीय व्यवहार का सरलीकरण माना। इसने हताशा और आक्रामकता के बीच एक सीधा संबंध मान लिया, और अन्य सभी परिस्थितिजन्य और संज्ञानात्मक कारकों को नजरअंदाज कर दिया, जो हस्तक्षेप कर सकते हैं।
मनोवैज्ञानिकों का तर्क है कि मनुष्य उससे कहीं ज्यादा जटिल है, जितना कि हम समझते हैं। वह अपनी कुंठाओं से निपटने के दूसरे तरीके खोज लेता है। वह समाधान खोजने के लिए अपनी तर्कसंगत सोच प्रणाली का इस्तेमाल करता है। इसलिए जब लोग राष्ट्रपति ट्रंप को इस तरह उग्र रूप में देखते हैं, तो उन्हें झटका लगता है। दूर से देखने पर तो यही लगता है कि बहुत जल्दी निर्णय लेना ट्रंप का तरीका है। अपने राष्ट्रपति पद और अपने व्यावसायिक कॅरिअर, दोनों में वह तत्काल कार्रवाई को प्राथमिकता देते दिखे हैं। यही कारण है कि वह अक्सर अपना मन बदल लेते हैं। उनके निर्णय प्रबल भावनाओं से प्रेरित होते हैं। घटनाओं, विरोधियों और मुद्दों पर उनकी प्रतिक्रिया अक्सर भावुक और भावनात्मक होती है। इससे निर्णय अनुचित रूप से प्रभावित हो सकते हैं।
ट्रंप की निर्णय लेने की शैली में तत्कालिकता और भावनात्मक दृढ़ विश्वास पर जोर दिया जाता है, जो समर्थकों को एकजुट करने और निर्णायकता की भावना पैदा करने में प्रभावी हो सकता है। हालांकि, यह अप्रत्याशित परिणामों को भी जन्म दे सकता है। कई लोगों का मानना है कि ट्रंप की निर्णय लेने की शैली उच्च व्यावसायिक दबाव की उनकी पृष्ठभूमि को दर्शाती है, जहां ऐसे प्रतिस्पर्धी वातावरण में त्वरित निर्णय और सहज ज्ञान लाभदायक हो सकते हैं। लेकिन युद्ध की दुनिया में फैसले लेते समय ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है। लेकिन ट्रंप तो ट्रंप हैं और यही उनकी शैली है।