भाजपा की भोपाल में हुई रैली को देखकर एक बात तो साफ हो गई कि अब यह पार्टी नरेंद्र मोदी की रणनीति का अनुसरण कर रही है। मोदी का कद उनकी पार्टी से बड़ा हो चुका है और उनके बाहरी समर्थकों ने उन्हें यहां पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई है। हर कुंभ में संतों का सम्मेलन होता है। इन सम्मेलनों में राम मंदिर पर चर्चा होती है। पर इस बार जनवरी में इलाहाबाद में हुए महाकुंभ का संत समागम थोड़ा अलग था। उसमें मंदिर मुद्दे पर चर्चा बाद में हुई, पहले मोदी को प्रधानमंत्री बनाने को लेकर मंथन हुआ। वहां संतों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत से कहा कि भाजपा को मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने के लिए तैयार करें।
इसी तरह हरियाणा की कुछ जानी-मानी शख्सियतों ने मोहन भागवत को इस बात के लिए मनाया कि संघ की तरफ से यह न कहा जाए कि भाजपा से उन लोगों का कोई मतलब नहीं है। बाबा रामदेव का उदाहरण भी इसी तरह का है, जिन्होंने कहा कि अगर भाजपा मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं करती, तो वह अपना सहयोग नहीं देंगे। और अब हालात ऐसे हैं कि मोदी अगले लोकसभा चुनाव के केंद्रबिंदु बन चुके हैं। वैसे मोदी की यह बात मानने लायक नहीं है कि अगला चुनाव 1977 जैसा होगा। बल्कि 2014 का चुनाव 1971 जैसा होगा। उस चुनाव में कांग्रेस (आई) के खिलाफ एक बड़ा गठजोड़ बना था, जिसमें स्वतंत्र पार्टी, जनसंघ, संगठन कांग्रेस और संसोपा यानी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी शामिल थी। पर इंदिरा गांधी ने बैंकों के राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स खत्म करने जैसे कदम उठाकर तथा 'गरीबी हटाओ' का नारा देकर गरीब हितैषी की छवि गढ़ ली थी। तब एक तरफ इंदिरा थीं, दूसरी तरफ उनके विरोधी। आज भी तकरीबन वही हालात हैं। राजनीति दो खांचों में बंटी है। एक तरफ मोदी हैं, दूसरी तरफ उनके विरोधी।
दरअसल, मोदी विकास पुरुष की अपनी छवि गढ़ने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते। कॉरपोरेट से लेकर युवाओं तक और यहां तक कि गरीब तबके में भी वह यह प्रचारित करने में कामयाब होते दिख रहे हैं कि वह हालात बदल देंगे। झुग्गियों में रहने वालों के राजनीतिक रुझान के बारे में सर्वेक्षण करने वाले शख्स ने पिछले दिनों मुझे बताया कि यह तबका भाजपा का वोटर नहीं है, लेकिन मोदी को वोट देने की बात कह रहा है।
विपक्ष के सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि मोदी की छवि और कद का मुकाबला करने लायक कोई चेहरा फिलहाल उसके पास नहीं है। उसकी यही कमजोरी मोदी की ताकत बनती जा रही है। इसी वजह से कांग्रेस कई बार मोदी की तरफ से चलाए गए अस्त्र जैसा ही जवाबी हथियार खोजने में जुट जाती है। मसलन, मोदी ने कांग्रेस के भ्रष्टाचार को एबीसीडी (आदर्श, बोफोर्स, कोलगेट और दामाद) के जरिये समझाया, तो जवाब में कांग्रेस ईएफजी (एनकाउंटर, फेक, गोधरा) लेकर आ गई।
अपनी छवि चमकाने के लिए मोदी की मशीनरी जबर्दस्त काम करती है। हाल ही में उसने देश भर के तकरीबन 4,500 सफल किसानों को गुजरात बुलाकर सम्मानित किया और वहां के डेयरी विकास, सौर ऊर्जा से संबंधित परियोजनाओं से रूबरू करवाया। अब ये किसान अपने-अपने क्षेत्र में मोदी का गुणगान करें, तो हैरान होने वाली बात नहीं है। मोदी ने विकास के काम किए या नहीं किए, उनका विकास समावेशी है या नहीं है, इन बातों पर तो खूब बहस हो सकती है, लेकिन यह बिल्कुल स्पष्ट है कि वह अपनी बात लोगों तक ले जाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे।
अब मोदी की रणनीति होगी कि वह चुनाव तक राजनीति के केंद्र में बने रहें। यह भी सच है कि भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशी पार्टी के नहीं, मोदी के प्रत्याशी होंगे। वे पार्टी के नाम पर नहीं, मोदी के नाम पर वोट मांगेंगे। और विरोधी भी भाजपा के बजाय मोदी की मुखालफत करते नजर आएंगे। यह भी कहा जा रहा है कि भाजपा 2014 की जंग बिलकुल उसी तरह लड़ने की तैयारी में है, जैसा अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव होता है। पर मेरा मानना है कि भले ही मोदी अगले चुनाव का केंद्रबिंदु बने रहें, पर यहां चुनाव अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव से भिन्न होगा। दरअसल, अमेरिका में राष्ट्रपति का चुनाव जनता सीधे करती है, जबकि अपने यहां हम सांसद चुनकर भेजते हैं, फिर संख्या बल के आधार पर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने वाले शख्स की तस्वीर साफ होती है। वैसे यह सच है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान कई विधानसभा चुनावों में ऐसा पैटर्न देखने को मिला है, जिनमें मतदाताओं ने पार्टियों को नहीं, मुख्यमंत्री पद के दावेदार व्यक्ति को प्रमुखता दी। खुद नरेंद्र मोदी से लेकर नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और अखिलेश यादव इसके उदाहरण हो सकते हैं।
खैर, प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में भाजपा के भीतर मोदी को स्वीकार करने के हालात को तूफान से पहले की खामोशी माना जा सकता है। लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज दो प्रमुख नेता हैं, जिन्हें लग रहा है कि उनका हक छीना गया है। ये अभी भले ही मान गए हों, लेकिन चुनावी नतीजों के बाद की परिस्थितियों को लेकर उनके अपने आकलन हैं। एक बड़ा तबका आडवाणी को रिटायर हो जाने की सलाह दे रहा है, लेकिन भोपाल की रैली में उनके तेवर देखकर साफ हो गया है कि वह लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे। हां, इस बार वह गुजरात के बजाय मध्य प्रदेश की किसी सीट से ताल ठोक सकते हैं। यानी मोदी को चुनाव के बाद भी जंग लड़नी है।