हमारे यहां चीन की आलोचना करने की एक प्रवृत्ति बन गई है। जबकि चीन ने हाल के दशकों में जो विकास किया है, उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। लिहाजा चीन की आलोचना करने के बजाय उसकी उपलब्धियों से कुछ सीखना हमारे लिए ज्यादा उपयोगी होगा। वर्ष 2010 में हमने हजारों करोड़ रुपये खर्च कर राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन किया। जो लोग पिछला लंदन ओलंपिक देखकर आए हैं, वे बताते हैं कि हमारी व्यवस्था लंदन से लाख गुना बेहतर थी। इसके बावजूद राष्ट्रमंडल खेलों पर हमारे घोटाले भारी पड़ गए।
इसके विपरीत बीजिंग में छह साल पहले हुए आलंपिक के लिए बनाया गया ‘बर्ड नेस्ट’ स्टेडियम आज भी पर्यटकों और खिलाड़ियों का स्वर्ग बना हुआ है। हमारे नेहरू स्टेडियम के बड़े हिस्से में सरकारी दफ्तर चल रहे हैं, त्यागराज स्टेडियम को शादी व अन्य आयोजनों के लिए खोल दिया गया है। इन स्टेडियमों से पांच सौ मीटर की दूरी पर ही झुग्गियां सड़क पर आ गई हैं। लेकिन ‘बर्ड नेस्ट’ स्टेडियम के चारों ओर सफाई, सुंदरता और हरियाली बरकरार है। स्टेडियम के भीतर कम उम्र के प्रशिक्षु बच्चों के लिए सभी सुविधाएं निःशुल्क उपलब्ध हैं और आज भी यह परिसर कई ओलंपिक विजेता तैयार कर रहा है।
बीजिंग में दर्शनीय स्थानों पर बमुश्किल कहीं सुरक्षाकर्मी दिखते हैं। कई जगह निजी सुरक्षा गार्ड दिखते हैं, लेकिन बगैर किसी हथियार के। वहां सड़क पर ट्रैफिक नियंत्रण करने वाले तो दिखते ही नहीं। हां, कुछ व्यस्त चौराहों पर पैदल लोगों को सड़क पार करने में मदद करने वाले स्वयंसेवक जरूर दिख जाते हैं। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था और सबसे अधिक आबादी वाले देश की राजधानी भी आतंकवाद के खतरे से अछूती नहीं है। लेकिन वहां सुरक्षा तनाव या बंधन नहीं, एक अनिवार्य गतिविधि है, जो हादसे का इंतजार नहीं करती। बैटरी चालित तिपहियों पर दौड़ते चौकस सुरक्षाकर्मियों के पास केवल एक छोटा-सा हैंडीकैम होता है और वायरलेस। उनका काम केवल किसी संदिग्ध परिस्थिति की सूचना देना है, पलक झपकते ही कारों में सवार पुलिसकर्मी घटनास्थल पर पहुंच जाते हैं।
बीजिंग हमारे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से बड़ा है। इसकी आबादी दो करोड़ के करीब पहुंच गई है। सड़कों पर कोई 47 लाख वाहन सूरज चढ़ते ही आ जाते हैं और कई सड़कों पर ट्रैफिक रेंगता दिखता है, पर जाम नहीं होता। लेन में चलना वहां की आदत है। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर सीसीटीवी कैमरे लगे हैं और यातायातकर्मी कहीं बैठकर उसे देखते रहते हैं।
बीजिंग में 800 रूटों पर बसें चलती हैं। कुछ बसें तो दो केबिन को जोड़कर बनाई हुई हैं, यानी हमारी लो-फ्लोर बस से दोगुनी, लेकिन मजाल है कि कहीं मोड़ पर ड्राइवर अटक जाए। अधिकांश बसों में ऑटोमेटिक टिकट सुविधा और स्मार्ट कार्ड व्यवस्था है। इन बसों में तीन दरवाजे हैं-चढ़ने के लिए बीच वाला, उतरने के लिए आगे और पीछे दो दरवाजे। पुराने बीजिंग में जहां सड़कों को चौड़ा करना संभव नहीं था, वहां बसें मेट्रो की तरह बिजली के तार पर चलती हैं। एक तो वहां बस की रफ्तार बांध दी गई है, तिस पर वे सिर पर लगे बिजली के हैंगर से चलती हैं, इधर-उधर भाग नहीं सकतीं। हम भी अपने यहां कम खर्चें में ऐसी बेहतर सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था शुरू कर सकते थे।
सार्वजनिक परिवहन का सबसे लोकप्रिय माध्यम वहां सब-वे या मेट्रो है और इसकी किसी भी लाइन पर कितना भी लंबा सफर करने के लिए मात्र दो युआन चुकाने होते हैं। दिल्ली मेट्रो के सामने लोग कूदकर खुदकुशी कर लेते हैं। शायद ऐसी ही घटनाओं से बचाव के लिए बीजिंग के मेट्रो स्टेशनों पर ट्रेन के दरवाजे से पहले अलग से कांच का एक दरवाजा होता है, जो कोच के आकर ठहरने के बाद ही खुलता है। पता नहीं, हमारे तकनीकी विशेषज्ञों ने इस छोटी-सी चीज को क्यों नहीं देखा। बीजिंग की मुख्य सड़कों पर सफाई कर्मचारी भी हमारे लिए मिसाल हैं। वे कम ऊंचाई वाली साइकिल पर चलते हैं, जिसके पीछे कैरियर में जरूरी उपकरण होते हैं। वहां बेतरतीब खुली दुकानें कहीं नहीं मिलेंगी। समूचे शहर में सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक प्रदर्शन, धरनों पर कड़ाई से पाबंदी है।