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जानना जरूरी है: राजा शृगाल जब खुद बन बैठा कृष्ण संस्कृति के पन्नों से जानें पूरी कहानी

आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 02 Mar 2025 05:09 AM IST

सार

भगवान श्रीकृष्ण जब शृगाल के सामने पहुंचे, तो वह प्रार्थना करने लगा, ‘भगवन! जय-विजय की तरह मैं भी आपका द्वारपाल हूं। मेरा नाम सुभद्र है। लक्ष्मी के शाप से मैं भ्रष्ट हो गया था; मेरा वह समय पूरा हो चुका है।
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : अमर उजाला


प्रातःकाल होते ही श्रीकृष्ण रथ पर सवार हुए और शृगाल के पास पहुंच गए। उनके आने का समाचार सुनकर शृगाल कृत्रिम-रूप से चार भुजा धारण करके युद्ध के लिए आ गया। 


श्रीकृष्ण उसे देखकर मुस्कराए और उससे लौकिक रीति से वार्तालाप किया। वह अचानक श्रीकृष्ण से भयभीत होकर बोला, ‘प्रभो! आप सुदर्शन-चक्र से मेरे इस पापी शरीर को नष्ट कर दीजिए। जय-विजय की तरह मैं भी आपका द्वारपाल हूं। मेरा नाम सुभद्र है। लक्ष्मी के शाप से मैं भ्रष्ट हो गया था; मेरा वह समय पूरा हो चुका है। मैं पुनः आपके लोक चला जाऊंगा।’ श्रीकृष्ण बोले, ‘शृगाल, पहले तुम मुझ पर प्रहार करो; फिर मैं तुमसे युद्ध करूंगा।’ तब शृगाल ने माधव पर बाणों से वार किया, किंतु वे सब बाण आकाश में विलीन हो गए। फिर शृगाल ने अग्नि-शिखा के समान गदा फेंकी, परंतु वह भी श्रीकृष्ण के स्पर्शमात्र से टुकड़े-टुकड़े हो गई। फिर उसने कई अन्य अस्त्र-शस्त्रों से कृष्ण पर वार किया। परंतु उसके सभी अस्त्र-शस्त्र जगदीश्वर कृष्ण के सामने विफल हो गए। अंत में शृगाल ने कृष्ण के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘प्रभो! आत्मा रूपी आकाश को अस्त्र से बेधा नहीं जा सकता। इस भवसागर से मेरा उद्धार कीजिए। आप कर्मों के ईश्वर, ब्रह्मा के भी विधाता, शुभ फलों के दाता, समस्त संपत्तियों के प्रदाता, कर्मों के कारण और उनके खंडन में समर्थ हैं। मैं अपने इस पंच भौतिक नश्वर देह का त्याग करके आपके वैकुंठ के सातवें द्वार पर जाऊंगा, क्योंकि वही मेरा घर है।’ 


शृगाल के अमृतमयी वचन सुनकर श्रीकृष्ण समरभूमि में स्नेहवश रोने लगे। उनके नेत्रों से गिरे हुए अश्रुबिंदुओं से वहां सहसा ‘बिंदुसर’ नामक दिव्य सरोवर प्रकट हो गया; जो तीर्थों में परम श्रेष्ठ है। उसके जल के स्पर्शमात्र से मनुष्य जीवनमुक्त हो जाता है और उसे अपने सात जन्मों के संचित पापों से मुक्ति मिल जाती है। इसके बाद श्रीकृष्ण ने शृगाल से पूछा, ‘यदि तुम्हारा मन इतना ही निर्मल है, तो फिर तुम्हारी बुद्धि में युद्ध की इच्छा कैसे उत्पन्न हुई और तुमने उस ब्राह्मण-दूत के द्वारा ऐसा निष्ठुर संदेश क्यों कहलवाया?’ इस पर शृगाल ने कहा, ‘नाथ! मैंने आपके प्रति ऐसे निष्ठुर वाक्यों का प्रयोग किया, तभी तो आप क्रोधपूर्वक यहां आए। अन्यथा स्वप्न में भी आपके दर्शन दुर्लभ हैं।’ यह कहते हुए शृगाल ने योगावलंबन द्वारा अपने भौतिक शरीर का त्याग कर दिया और वह श्रीकृष्ण के देखते-देखते ही विमान पर सवार होकर दिव्य धाम को चला गया। उस समय शृगाल के शरीर से सात ताड़-जितनी लंबी एक ज्योति निकली और वह श्रीकृष्ण के चरण कमलों में प्रणाम करके चली गई। इसके बाद श्रीकृष्ण अपनी सेना लेकर वापस द्वारका की ओर चल दिए। यह कथा हमें ब्रह्मवैवर्त पुराण के उत्तरार्ध में मिलती है। इसी तरह जब एक अन्य राजा पौंड्रक ने कृष्ण का छद्म-वेश धारण किया, तो कृष्ण ने उसका भी उद्धार किया था।

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