भारत में सैकड़ों भाषाएं हैं, बोलियां हैं और हर समुदाय इन्हें अपने हिसाब से व्यवहार में लाता रहा है। लेकिन उदारीकरण के बाद बहुत कुछ बदल गया है। हमारे पारंपिरक उद्योग, कामकाज, रहन-सहन के औजार और उपादान बदल गए हैं। पर्व-त्योहारों का भी मूल रूप कहीं खोता जा रहा है। पुरानी पीढ़ियों की सामूहिक स्मृतियों और व्यवहार में यह कहीं न कहीं बचा हुआ था, लेकिन वह पीढ़ी भी खत्म हो रही है। नई पीढ़ी उन परंपराओं एवं संस्कृति से अनजान तो है ही, उन परंपराओं, संस्कृतियों, कामों, जरूरतों आदि को व्यक्त करने वाले शब्दों से भी अनजान होती जा रही है। इस तरह, स्थानीय भाषाओं की अपनी जो पारंपरिक शब्द संपदा रही है, वह लगातार खत्म होती जा रही है। उदारीकरण, बाजारवादी व्यवस्था और संचार क्रांति में प्रमुख भाषाओं के रूप में अंग्रेजी और हिंदी ही उभरी हैं। बेशक कुछ स्थानीय संचार और विज्ञापनों के लिए स्थानीय भाषाओं का इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन बाजार को संचालित करने वाली ताकतों की सोच और चिंतन की भाषा अंग्रेजी ही है। स्थानीय भाषाओं में उनका अनुवाद हो रहा है। अनुवाद और मूल भाषा के बीच एक अंतर होता है। अनुवाद करते वक्त अनुवादक के मानस पर उसकी संस्कृति से ज्यादा अनुवाद की जाने वाली भाषा का परोक्ष असर होता है। इसका असर अनुवाद में भी दिखता है। अनुवाद की तुलना में मूल लेखन में सोच से उभरी भाषा जेहन में आती है, जिस पर स्थानीय सांस्कृतिक प्रभाव ज्यादा होता है।
प्लेटो ने भाषा को लेकर एक त्रिवीमिय सिद्धांत दिया है। भारतीय ग्रंथों में त्रिस्तरीय सिद्धांत मिलता है। इसके अनुसार कोई रचनाकार या कलाकार कुछ रचता है, तो वह बुनियादी रूप से सोचता है। उस सोच को वह लिखकर या चित्र बनाकर अभिव्यक्त करता है। सोचने वाले व्यक्ति या समुदाय की स्थानीय भाषा इसे कहीं ज्यादा नजदीकी स्तर तक अभिव्यक्त कर सकती है। अनुवाद यहां पिछड़ जाता है। कहना न होगा कि भारतीय स्थानीय भाषाएं इसी वजह से छीज रही हैं। बाजार पर एक या दो भाषाओं का वर्चस्व है। एकरूपता और एकता की अभिव्यक्ति का माध्यम भी एक या दो प्रमुख भाषाएं ही बनती जा रही हैं। इसका असर स्थानीय भाषाओं पर पड़ रहा है। उनकी शब्द संपदा का छीजना और पारंपरिक शब्दों का लोप होना इसी प्रक्रिया का विस्तार है। वक्त आ गया है कि संस्कृति के अपने उपादान, संस्कृति और समुदाय विशेष की स्पष्ट अभिव्यक्ति की भाषाओं को इस नजरिये से भी बचाने की कोशिश शुरू हो।