बीती सदी के सातवें दशक में हम पहली बार रूस गए रघुवीर सहाय के साथ। दूसरी शाम मॉस्को के लेखक संघ के सभागार में काव्यपाठ हुआ। हमारे साथ तब यवतुशंको और आंद्रई वोजनेसिंस्की भी आमंत्रित थे। उन्हीं दिनों दुभाषिनी मीरा शेल्गानिक द्वारा तैयार किया गया हिंदी के कुछ कवियों का रूसी अनुवाद संकलन भी छप कर आया था।
मीरा ने हमारी कविताओं के रूसी अनुवाद श्रोताओं के समक्ष पढ़े। दूसरी शाम प्रश्नोत्तर श्रृंखला आयोजित थी। साहित्य के प्रति रूसियों में जितना अनुराग है उसकी तुलना सिर्फ अमेरिका के कई देशों से की जा सकती है। तीसरी शाम जब हम वोजनेसिंस्की और मीरा शेल्गानिक के साथ कहवाघर में, ‘तबके रूस में लेखक की हैसियत’ के विषय में बातें कर रहे थे, तभी वोजनेसिंस्की ने दबी जुबान से कहा, ‘हमारे यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसी कोई वस्तुस्थिति नहीं।
उल्टे हुआ यह कि जब मेरी कुछ कविताएं डब्लयू.एच.ऑडेन ने अंग्रेजी में अनुवाद की, तब मुझे रूस से बाहर कर दिए जाने की पहल भी हुई थी।’
हमारे अपने देश का हाल रघुवीर जी ने बताया कि कैसे उनकी रचना ‘हमारी हिंदी’ जब लखनऊ से निकलने वाली पत्रिका ‘युगचेतना’ में छपी तो तत्कालीन पुराधाओं ने उन्हें क्या प्रताड़ना दी थी। रघुवीर जी की बातें सुनकर वोजनेसिंस्की ने जो कुछ कहा उसे सुनकर हमें धक्का लगा। वोजनेसिंस्की के अनुसार उसने जब विदेश जाने के लिए पारपत्र बनवाना चाहा तब ख्रुश्चेव ने ‘यू वांट टु गो टु डॉग्स?’ कहकर उसे अपने कक्ष से बाहर कर दिया था।
बातों-बातों में वोजनेसिंस्की को जब यह पता चला कि आगे पांच देशों की यात्रा में हमारा अंतिम पड़ाव इटली होगा तो वोजनेसिंस्की अगली शाम हमसे मिलने होटल मॉस्को आया। कहा कि, ‘कैलाश, क्योंकि तुम्हारे पास कूटनीतिक पारपत्र (डिप्लोमेटिक पासपोर्ट) है इसलिए मेरी पाण्डुलिपी साथ ले जाकर इसे इटली में रह रहे ‘गॉड दैट फेल्ड’ के लेखक सीलोनी को सौंप देना।’ हमने वह किया, यही नहीं देश लौटकर वोजनेसिंस्की की कविताओं का हिंदी अनुवाद भी ‘आलोचना’ पत्रिका में छपवाया।
सन् 1999 में हमने हिंदी के इक्तीस कवियों की रचनाएं रूसी में अनुवाद करवाकर ‘दिल्ली में कविता’ शीर्षक से एक संकलन संपादित किया। फिर इसके लोकार्पण का भार सरकार ने लिया। इसी सिलसिले में दोबारा मॉस्को जाने का अवसर मिला।
वहां के मेयर बढ़िया अंग्रेजी बोल लेते थे। उन्हें हमारी योजना भली लगी साथ ही मॉस्को, उनकी भाषा में ‘मॉस्वन्वा’ का अर्थ समझाया, ‘सिटी एट द काउ रिवर’। उस रात तो मेयर महोदय की कृपा से प्रीतिभोज में भारतीय भोजन मिल गया। दूसरे दिन दोपहर को, किसी ने हमारे होटल के कमरे का द्वार खटखटाया। हमने द्वार खोला तो देखा एक गोरा रूसी युवा गेरुए रंग की धोती पहने सामने खड़ा था। हमें देखते ही बोला, ‘हरे कृष्णा’, हमने भीतर बुला लिया। उसे पता नहीं हमारा नाम कैसे ज्ञात था।
उसने बताया वह निकटस्थ कृष्ण मंदिर से आया है। हमारे लिए ‘प्रसादम’ के नाम पर हलुआ पूड़ी लाया है। हम स्तब्ध। अपने संन्यासी हो जाने की कहानी कहकर वह थोड़ी देर बाद उठ खड़ा हुआ साथ ही श्रीकृष्ण मंदिर आने का निमंत्रण भी दे गया। अगले दिन हम वहां गए। मंदिर के प्रभारी मदनमोहन दास से परिचय हुआ। बहुत गरीब लोगों की उजड़ी सी बस्ती में स्थित वह मंदिर पवित्र सुगंध से भरा हुआ था। कालांतर में साकेत स्थित अपने आवास पर हमें मदनमोहन दास का फोन मिला। उसने बताया कि मंदिर और उसके आसपास के इलाके को तोड़कर मॉस्को के मेयर ने वहां एक मॉल बनाने की घोषणा की है। हो सके तो हम कुछ करें। उसने यह भी नहीं सोचा कि हमारा जैसा अध्ययन-अध्यापन करने वाला जीव उसकी कोई मदद न कर पाएगा।
इसके दो सप्ताह बाद हमें प्रधानमंत्री कार्यालय से भेजा गया एक निमंत्रण मिला। व्लादीमीर पुतिन के भारत आगमन के उपलक्ष्य में स्थानीय ताज पैलेस में, दोपहर के भोजन का बुलावा था। इस तरह के निमंत्रण इंदिरा जी के जमाने से आने शुरू हुए थे जब मार्शल टीटो भारत आए थे, पूर्व निर्धारित जिस मेज पर हम बैठे उसी से जुड़ी कुर्सी पर एक वर्दीधारी रूसी युवा बैठा था, ‘कैलाश वाजपेयी’ हमारा नाम पढ़ते हुए उसने प्रश्न किया, ‘क्या आप प्रधानमंत्री (अटल जी) के संबंधी हैं। ‘तात्विक दृष्टि से हम सभी एक हैं’ वाक्य बोलकर हमने उस रूसी युवा की नाम पट्टी पर निगाह डाली। लिखा था, व्लादीमीर मितीन, पूछने पर उसने बताया कि वह व्लादीमीर पुतीन के ही वंश का है और उनका ए.डी.सी है।
भोजन करते हुए हमने उसे अपनी दोनों रूस-यात्राओं के बारे में बताया और मदनमोहन दास की समस्या के बारे में भी। बिना किसी तरह का आश्वासन दिए व्लादीमीर मितीन ने चर्चा वोजनेसिंस्की की ‘एंटी वल्डर्स की ओर मोड़ दी, प्रीतिभोज समाप्त हो गया। मितीन भी पुतिन के साथ रूस लौट गया। वर्ष पर वर्ष बीतते गए। दिल्ली वि.वि ने हमें सेवामुक्त कर दिया। तभी एक सुबह रूस से आया एक सचित्र पत्र मिला। मदनमोहन दास का वह संकल्प साकार हो चुका था।