पर्यावरण और विकास के बीच सतत युद्ध चल रहा है। विकास का मौजूदा मॉडल पर्यावरण की रक्षा के लिए गंभीर नहीं है, जबकि राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2006 के मूल बिंदुओं पर गौर करें, तो प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर समाज की कतई अनदेखी नहीं की जा सकती। पर्यावरण की सेवा करने वाले पेड़-पौधों, नदियों, ग्लेशियरों और इनके संरक्षण में अहम भूमिका निभाने वाले समाज की आजीविका को भी सुरक्षित रखना आवश्यक है।
चिंता का विषय यह है कि वैश्विक स्तर पर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में जितनी गहनता से विचार किया जा रहा है, उतनी ही सरलता से विभिन्न देशों की सरकारें अपने यहां के पर्यावरण मानकों पर अमल करने के प्रति अपनी असमर्थता जाहिर करती हैं। इसी कारण पर्यावरण के मोर्चे पर इतनी विसंगतियां हमें दुनिया भर में देखने को मिलती हैं।