गांधी इन दिनों झिलमिलाते-से दीखते हैं। लगता है, गांधी गुम हो रहे हैं। फिर वह जनमानस में लौट आते हैं। विश्व में संभवतः गांधी पहले, अकेले या सबसे बड़े धार्मिक व्यक्ति हैं, जिन्होंने राजनीति को अपने कंधों पर उठा रखा था। आजादी के बाद गांधी निराश नहीं हुए होते और केंद्रीय भूमिका में कायम रहते, तो बीसवीं सदी का नसीब कुछ अलग हो सकता था। महामानव बताए गए गांधी बुनियादी तौर पर एक साधारण मनुष्य की तरह जीते रहने में भरोसा करते थे। आजादी के पांच वर्ष पहले से उन्हें सहकर्मियों ने हाशिये पर डालने की कोशिश की थी। सत्तानिरपेक्ष गांधी समयसापेक्ष मूल्यों के सबसे बड़े नियंता थे। यह गांधी नहीं, हिन्दुस्तान का दुर्भाग्य है कि तवारीख की उर्वर इबारतें नहीं लिखी जा सकीं।
इन दिनों राजनीतिक हरकतों का नकली भूचाल उठाया जा रहा है। देश की नब्ज चुनाव के थर्मामीटर से नापी जा रही है। गांधी के जन्म-प्रदेश में गांधी को महज एक आध्यात्मिक पुरुष बनाकर फकत चित्रों, दीवारों और किताबों में कैद किया जा रहा है। गांधी की मादरी राजनीतिक पार्टी ने उन विकल्पों को अपना लिया है, जिनका निषेध महात्मा ने किया था। भारत-अमेरिकी परमाणु करार, खुदरा और थोक व्यापार में विदेशी पूंजी निवेश, राष्ट्रीय संपत्तियों के निजीकरण के कानून और जनता को प्राथमिकताओं के अंतिम पायदान पर रखने के नौकरशाही और नेताओं के शगल गांधी की हेठी करते हैं। अब तो यह भी लगता है कि उनके नाम पर वोट मांगने से कई लोगों को परहेज भी होने लगा है।
गांधी किसी एक देश, समाज, विचार, भाषा या परंपरा से बंधकर नहीं रह सकते थे। अरसे तक विदेशों में रहने के कारण उनमें ईसाईयत के सर्वोच्च सात्विक गुण इस तरह पैठ गए थे, मानो उन्होंने ईसा मसीह से सीधा साक्षात्कार किया हो। गांधी दक्षिण अफ्रीका से फकत हिन्दुस्तान के भूगोल में नहीं लौटे, बल्कि अपनी मातृभूमि की पुश्तैनी हिन्दुत्व की समझ को उन्होंने नए अनुभव-संसार से समृद्ध किया। उनमें इस्लाम की शिक्षाओं का अक्स अनुवाद की तरह नहीं, बल्कि मूल आग्रह की तरह आत्मसात हुआ था। यही तासीर उनमें बुद्ध की शिक्षाओं को लेकर भी विकसित हुई थी। जिन्हें सांप्रदायिक चश्मों से लगाव है, उनकी आंखें गांधी की नजरों से दो-चार होने पर इसीलिए चुंधियाने लगती हैं।
पता नहीं, ऐसा कोई दूसरा व्यक्ति इतिहास में पहले अपने आपको इस कदर क्यों ढूंढ़ नहीं पाया। उन्हें सेंट मेरिट्सबर्ग के स्टेशन पर सामान की तरह फेंक दिया गया। उन्हें लात, घूंसों और लाठियों तक से पीटा गया। कई रातें उन्होंने बिना सोए और बिना खाए-पिए भी काटीं। वह मीलों तक चलकर शाकाहारी भोजन भी ढूंढ़ते थे। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका जैसे परदेस में अपना देश अपनी परंपराओं में बिंधकर ढूंढ़ लिया। उन्होंने कांग्रेस के पूरे आंदोलन को उसके तामझाम से अलग करके सबको आईना दिखाया। आईना आत्ममुग्धता का एक बड़ा कारण होता है, लेकिन आईने के अंदर खुद का ईमान, अक्स और चरित्र ढूंढ़ने की कला को भी गांधी ने ही ईजाद किया। आत्मा वही है, जो अन्याय करने पर खुद को अपना मुंह नोचने की मौलिकता और हिम्मत दे। उन्होंने खुद को बार-बार सजा दी, जब-जब उन्होंने खुद को गुनहगार पाया।
अंग्रेज कौम ने हिन्दुस्तान को अपने जबड़े से निकालते वक्त गांधी से पराजय का अनुभव किया। यूरोपीय राजनय के औपचारिक पाठ और निष्कर्ष गांधी के तरल सियासी भाष्य को पढ़ने की कूबत नहीं रखते थे। सबसे अंतिम व्यक्ति गांधी के सृजन का रूपक था। वह हर क्षण के दूसरे अंतिम व्यक्ति को पंक्ति में ऊपर धकेलता था। उसके बाद फिर तीसरा अंतिम व्यक्ति समाज रचना का भवितव्य बन सकता। दक्षिण अफ्रीका जाते लिखी हिन्द स्वराज महान रूमानी कवि जॉन कीट्स की वसीयत की शब्दावली में ‘पानी पर लिखी’ अद्भुत इबारत है। अंगरेज वेस्टमिन्स्टर पद्धति की संसदीय प्रणाली और अलिखित संविधान-परंपरा के वणिक संग्राहक होते हुए पूरी दुनिया को किताबी ज्ञान के जरिये फतह करने निकले थे। गांधी उस खलबली की तरह वैचारिक समुद्र मंथन से बाहर निकले, जिसने ज्ञानशास्त्र की सभी विधाओं के भाष्य को शब्दों, अक्षरों, वाक्यों आदि के जुमले में पढ़ने से इन्कार किया। उनकी ‘आत्मकथा‘ हर भारतीय की आत्मकथा है, बल्कि संसार के हर मनुष्य की। इसलिए सत्य को व्यक्तिगत अहिंसक हथियार बनाकर उन्होंने सामूहिक यथार्थ के आग्रह के साथ जोड़ दिया।
गांधी संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण नहीं हैं। वह समाज का समास हैं, बल्कि बहुब्रीहि समास। चरखा, खादी, नमक, नील, अहिंसा, सत्य, हरिजन, बकरी, आखिरी आदमी जैसे सैकड़ों शब्द हैं, जिन पर एक तरह से गांधी का पेटेंट है। उन्हें लोगों तक पहुंचने के लिए किताबों, फिल्मों, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया, विज्ञापनों या नोबल पुरस्कार या भारत रत्न की पदवी की जरूरत नहीं है। निचले तबके के लोग अपने उपचेतन में गांधी की याद को सुरक्षित रखते हैं। यही वे संग्रहालय, पुस्तकालय या यादघर हैं, जहां गांधी का मानवीय रूप एक एहसास की तरह सुरक्षित है।
कोशिशें जारी हैं कि इस बूढ़े आदमी को इक्कीसवीं सदी में खारिज कर दिया जाए, या उसे इतिहास में दाखिल दफ्तर कर दिया जाए। गांधी मानवीय सभ्यता की ऊंचाइयों और उसकी विफलताओं का लेखा-जोखा लिए एक अजूबा बने अपनी कौंध लिए धरती पर आए थे। इसके बावजूद उनमें आसमानी देवता होने का अंश नहीं है। वह एक साथ पांचों कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों के समुच्चय बनकर औसत मनुष्य होने का शाश्वत बोध कराते हैं। कबीरदास ने कहा था शायद गांधी के लिए, लेकिन पांच छह सौ वर्षों पहले, कि इसने अपने होने की चादर जैसी पाई थी, वैसी ही ओढ़ी और वैसी ही बाद की पीढ़ियों को वापस कर दी।