आईपीएल में स्पॉट फिक्सिंग के मामले में जेल से छूटने के बाद एस श्रीसंत ने कहा कि, 'मैं इस प्रकरण को कभी नहीं भूलूंगा। इसने मुझे कई चीजें सिखाई हैं।'
श्रीसंत, अंकित चह्वाण और अजित चंदीला को आप खारिज कर दीजिए, भर्त्सना कीजिए। पर सब जानते हैं कि इस पापकर्म के वे सूत्रधार नहीं हैं। उनके पास इज्जत, शोहरत और पैसे की कमी नहीं थी। खेल जीवन में यह सब उन्हें मिला और मिलता। फिर भी उन्होंने अपना करियर चौपट करना मंजूर किया।
किस लालच ने उन्हें इस गलीज रास्ते पर डाला? उसी क्रिकेट ने, जिसे यह खेल समझ कर आए थे। हमारे जीवन में पहले से मौजूद ‘फिक्सिंग’ शब्द को आईपीएल ने नया आयाम दिया है। यह अति उत्साही कारोबारियों का कमाल है, जिन्होंने सब देखा, पर उस गड्ढ़े को नहीं देखा, जिस पर उनके कदम पड़ चुके हैं।
खेल का रिश्ता समाज के स्वास्थ्य से है, पर अब खेल की जगह अनैतिक धंधे ने ले ली है। सट्टेबाजी ने इसमें घुसी राजनीति, पैसे के खुले खेल और पूरे कुएं में पड़ी भांग का पर्दाफाश किया है। दो-चार को पकड़ कर इस बीमारी का इलाज होने से रहा। इसका रिश्ता हमारे सांस्कृतिक जीवन के अलावा राजनीतिक और कारोबारी मर्यादाओं से है। यह सिर्फ संयोग नहीं है कि पिछले तीन साल में जितने घोटाले सामने आए हैं, उनके पात्र घूम-फिरकर खेल से जुड़ जाते हैं।
जिन दिनों क्रिकेट की सट्टेबाजी की खबरें हवा में थीं, उन्हीं दिनों अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी (आईओसी) की एक टीम के साथ खेल मंत्री जितेंद्र सिंह की मुलाकात हुई और ओलंपिक में वापसी का रास्ता साफ हुआ। पिछले साल दिसंबर में भारतीय ओलंपिक महासंघ (आईओए) के चुनाव होने के पहले ही आईओसी ने भारतीय ओलंपिक महासंघ की मान्यता खत्म कर दी थी। देश का शायद ही कोई खेल संघ हो, जिसमें राजनीतिक खींचतान न होती हो। दरअसल खेल व्यवस्था में सबसे ऊंचे पदों पर वे लोग जा बैठे हैं, जिनका खेल से वास्ता नहीं है।
एवेरी ब्रंडेज 1952 से 1972 तक अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी के अध्यक्ष रहे। उनका निश्चय था कि अपने जीते जी ओलंपिक खेलों को पेशेवर नहीं बनने देंगे। वर्ष 1972 में उनके रिटायर होने के बाद ओलंपिक खेलों में विज्ञापनों, प्रसारण अधिकारों और स्पांसरों का प्रवेश हो गया। 1972 में आईओसी के पास कुल 20 लाख डॉलर थे, जो 1980 में बढ़कर साढ़े चार करोड़ डॉलर हो गए। इसके बाद अकेले 1984 के लॉस एंजेल्स खेलों की कमाई साढ़े बाईस करोड़ डॉलर थी। दुनिया भर के खेल संस्थान आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना चाहते हैं, पर इस लालच में वे कॉरपोरेट शिकंजे में फंस गए हैं।
आज दुनिया के ज्यादातर खेल पेशेवर हैं। खेलना पेशा है और खेलों का आयोजन उससे भी बड़ा पेशा। इसका फायदा खेलों और खिलाड़ियों, दोनों को मिला। उन्हें अच्छा पैसा मिलने लगा। दर्शक भी खुश हुए। उनका मनोरंजन बेहतर होने लगा। इसके सहारे उपभोक्ता सामग्री का बाजार बढ़ा। मीडिया हाउसों की कमाई बढ़ी। लेखकों, पत्रकारों, विश्लेषकों, कमेंटेटरों, फोटोग्राफरों की कमाई बढ़ी। पर इसके अंतर्विरोध भी पैदा हुए।
साल 1998 में यह बात सामने आई कि आईओसी के अनेक सदस्यों ने 2002 के विंटर ओलंपिक के आयोजन के लिए सॉल्ट लेक सिटी के आयोजकों से घूस ली। वर्ष 2012 के लंदन ओलंपिक खेलों को लेकर भी आरोप लगे। एवेरी ब्रंडेज को पता था कि खेल-प्रतिष्ठानों के पास साधन नहीं हैं। पर वे जानते थे कि जैसे ही कॉरपोरेट दुनिया के लिए खेल के मैदान खुलेंगे, धंधेबाजी पहले घुसेगी।
फॉर्मूला वन रेस को लें। यह खेल से ज्यादा कारोबार है। इसे संचालित करने वाली संस्था बर्नी एकलस्टोन का पारिवारिक ट्रस्ट है। यह अरबों डॉलर के मुनाफे का कारोबार है। 28 जून, 2000 को जेनेवा में हुई एक बैठक में अंतरराष्ट्रीय ऑटोमोबाइल फेडरेशन की विशेष बैठक में सत्तर देशों के प्रतिनिधियों ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पास करके 31 दिसंबर, 2110 तक (यानी एक सौ साल से ज्यादा समय) के लिए इसके समस्त व्यावसायिक अधिकार फॉर्मूला वर्ल्ड चैंपियनशिप लिमिटेड को सौंप दिए। इसके बाद इनके साथ तमाम विवाद भी जुड़ते चले गए। हालांकि परोक्ष रूप में से ये अधिकार बर्नार्ड (बर्नी) चार्ल्स एकलस्टोन के ही पास हैं।
माना जाता है कि खेल प्रशासन सरकारी दबावों से मुक्त होना चाहिए। इसका मतलब खेल संस्थाओं को छुट्टा छोड़ना भी तो नहीं। भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता ने इसका कारोबार चलाने वालों को बेशुमार दौलत दी है। इस ताकत ने बीसीसीआई का एकाधिकार कायम किया है। सत्ता के गलियारों में माना जाता है कि केंद्रीय मंत्री अजय माकन को खेल मंत्रालय से इसलिए हाथ धोना पड़ा, क्योंकि वे बीसीसीआई पर फंदा कसने की कोशिश कर रहे थे।
उन्होंने मांग की थी कि बीसीसीआई खुद को आईपीएल से अलग करे। अगस्त, 2011 में उन्होंने कैबिनेट के सामने राष्ट्रीय खेल विकास अधिनियम, 2011 का मसौदा रखा, जिसका उद्देश्य खेल संघों के कामकाज को पारदर्शी बनाना था। इसके चौदह-पंद्रह संशोधित प्रारूप बने, पर कानून नहीं बना। बीसीसीआई बेहद ताकतवर लोगों की जमात है, जिसके शीर्ष पर क्रिकेटरों से ज्यादा राजनीतिक नेता बैठे हैं।
आईपीएल ने सांस्कृतिक-जहर घोलने का काम भी किया है। इन खेलों से पार्टियां अनिवार्य रूप से जुड़ी हैं। और उनसे जुड़े हैं, सांस्कृतिक विवाद। पिछले साल मुंबई के वानखेडे स्टेडियम में शाहरुख खान को लेकर विवाद खड़ा हुआ। फिर एक विदेशी लड़की को लेकर झगड़े पर पुलिस केस बना। यह विषद चक्र नहीं टूटा, तो सब बढ़ता जाएगा।