दिल्ली के सेक्यूलरों के मोह को देख भगवान विष्णु का मन पसीजा और उन्होंने उनके मोह निवारण के लिए दिल्ली में एक कुर्सी मोह निवारण कैंप लगाने की सोची, ताकि उनमें आगामी लोकसभा चुनाव तक जैसे-तैसे एका बना रहे। पर वह समझ नहीं पा रहे थे अपने इस कार्यक्रम की रूपरेखा देश के अधिक से अधिक कुर्सी मोह से ग्रस्त राजनेताओं तक कैसे प्रसारित करें, कि तभी अचानक वहां नारद आ धमके।
नारद ने समाधान देते हुए कहा, भगवन! इत्ते परेशान क्यों? आपको जिस लोक में जिसके कल्याण हेतु मोह निवारण कैंप लगाना है, उस लोक के टीवी चैनलों पर अपने कार्यक्रम की खबर दे दें! हर लोक का निर्धन से निर्धन जीव आज कुछ देखे या न देखे, पर टीवी जरूर देखता है। चाहे उसे बिजली चोरी कर ही टीवी क्यों न देखना पड़े।
और विष्णु भगवान लक्ष्मी सहित दिल्ली आ पहुंचे।
यहां उन्होंने देखा कि दिल्ली मौसमी गर्मी से उतनी नहीं उबल रही, जितनी राजनीतिक गर्मी से। सारे एसी बेकार हो गए हैं। पसीना से तरबतर होते-होते वे जिस भी चैनल में अपने कार्यक्रम की सीडी लेकर गए, उन्हें जवाब मिला, साहब! अभी कम से कम हफ्ता दस दिन रुकिए! अभी देश की सबसे बड़ी धुआंधार खबर चल रही है।
कब तक चलेगी? विष्णु ने सीडी अनमने से अपनी जेब में डालते पूछा, तो निपटाने के मूड में उनसे कहा गया, साहब! कुछ कह नहीं सकते! पार्टी में जो चल रहा है, उसे देखते हुए हफ्ता तो मजे से निकल ही जाएगा। देखो तो, प्रधानमंत्री इन वेटिंग पार्टी से इस्तीफा देने और वापस लेने का खेल खेल रहे हैं। देश के मीडिया में ही नहीं, ब्रह्मांड के मीडिया में तक में कैसी हलचल हो गई है?
थक हारकर अपने होटल में आकर भगवान विष्णु ने जिस भी लोक का जो भी चैनल ऑन किया, उन सब पर ही बस एक ही चर्चा! अब पार्टी का क्या होगा? फाइव स्टार होटल का एसी भट्टी-सी गर्म हवा दे रहा था। लक्ष्मी से जब दिल्ली की गर्मी बर्दाश्त नहीं हुई, तो उन्होंने चुनरी के पल्लू से खुद को हवा देते कहा, प्रभु! बहुत हो गया कल्याण! चलो, अपने लोक चलो!
पर पार्टी? विष्णु हताश, निराश!
प्रभु! हम सब अपने-अपने स्वार्थों को लेकर ही तो पार्टी से जुडे़ हैं। जिस दिन खुद का नुकसान होते दिखा, ये लो इस्तीफा! काहे का देश! काहे का दल!
यह सुनकर विष्णु ने चुपचाप वापस जाने की हामी भर दी।