यह कानून इसलिए बनाया गया कि ऋण समाधान की प्रक्रिया को मनमानेपन और देरी से मुक्त कर ऐसी संरचना दी जाए, जहां पूर्वानुमेयता, अनुशासन, पारदर्शिता और समयबद्धता सर्वोपरि हों। हालांकि, संहिता लागू होने के बाद देश की ऋण संस्कृति में सुधार आया है, किंतु आईबीसी की वास्तविक परीक्षा तब होती है, जब प्रक्रिया, विवेकाधिकार और आर्थिक हित टकराने लगते हैं। हाल ही में, जेपी एसोसिएट्स लिमिटेड से जुड़े मामले ने यह सवाल उठाया है कि क्या सुव्यवस्थित और पूर्ण नीलामी प्रक्रिया के बाद भी सर्वोच्च बोली को बिना स्पष्ट तर्क के अस्वीकार किया जा सकता है? क्या यह स्थिति संहिता के मूल भाव को चुनौती नहीं देती?
इस मामले में जब लेनदारों की समिति को प्रारंभिक चरण में कमजोर या अपर्याप्त बोलियां प्राप्त हुईं, तब अधिकतम मूल्य सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने एक संरचित प्रतिस्पर्धी नीलामी प्रक्रिया अपनाई। कई दौर की इस प्रक्रिया में बाजार को खुली चुनौती दी गई और प्रतिभागियों को बराबरी का अवसर दिया गया। इन दौरों में वेदांता लिमिटेड लगातार सर्वोच्च बोलीदाता बनी रही तथा उसने अतिरिक्त राशि जोड़कर अपनी पेशकश को और मजबूत किया। सर्वोच्च बोली कई चरणों में बगैर चुनौती के शीर्ष पर बनी रही। ऐसे में, यह स्वाभाविक था कि सर्वोच्च प्रस्ताव पर संहिता के सिद्धांतों के अनुरूप विचार होगा, किंतु बिना कारण बताए सर्वोच्च बोली को लंबित रख दिया गया। ऐसा किस आधार पर हुआ?
दरअसल, आईबीसी में लेनदारों की समिति को व्यावसायिक विवेक का अधिकार प्राप्त है, जिसे कई अवसरों पर सर्वोच्च न्यायालय ने भी मान्यता दी है। हालांकि, यह विवेक कानून, निष्पक्षता और तर्कसंगतता की सीमाओं के भीतर ही मान्य है। जब नीलामी प्रक्रिया के पांचों चरण निष्पक्ष रूप से संचालित हो जाएं, तो सर्वोच्च बोली को बगैर किसी स्पष्ट, लिखित व तार्किक कारण के अस्वीकार किया जाना प्रशासनिक सिद्धांतों का सीधा उल्लंघन प्रतीत होता है। इसलिए, अब विशेषज्ञ मांग कर रहे हैं कि संहिता के भीतर समाधान प्रक्रिया में कारण-सहित निर्णयों को अनिवार्य बनाया जाए, ताकि यह स्पष्ट रहे कि लेनदार समिति का विवेकाधिकार असीमित नहीं, बल्कि नियंत्रित तथा उत्तरदायी है।
जब कोई कानून आर्थिक गतिविधियों को संचालित करता है, तो उससे सिर्फ कानूनी व्यवस्था नहीं, बल्कि पूंजी प्रवाह, निवेश निर्णय और बाजार का व्यवहार भी प्रभावित होता है। यदि नीति स्पष्ट हो और परिणाम पूर्वानुमेय हों, तो निवेशक आत्मविश्वास से भाग लेते हैं। किंतु यदि प्रक्रिया के अंतिम परिणाम अनिश्चित हों, तो उसका प्रभाव पूंजी लागत, प्रतिस्पर्धा और मूल्य निर्धारण पर पड़ता है। संरचित नीलामी प्रक्रिया का उद्देश्य अधिकतम मूल्य पाना और सार्वजनिक संसाधनों की सुरक्षा होता है। यदि बाजार यह मानने लगे कि नीलामी में सर्वोच्च स्थान पाने के बाद भी समाधान सुनिश्चित नहीं है, तो भविष्य में बोलीदाता या तो भाग लेने से हिचकेंगे या फिर प्रक्रियागत जोखिम प्रीमियम जोड़कर कम आकलन प्रस्तुत करेंगे। इससे प्रतिस्पर्धा घटेगी, मूल्य में कमी आएगी और संहिता का मुख्य उद्देश्य प्रभावित होगा।
यह स्थिति दिवाला परिसंपत्तियों के समग्र बाजार के लिए भी हानिकारक है। लिहाजा, आईबीसी की सफलता केवल वसूली की मात्रा से नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने से तय होगी कि प्रक्रिया निष्पक्ष, स्थिर, पूर्वानुमेय और पारदर्शी बनी रहे। इसलिए जरूरी है कि नीलामी शुरू करने से पहले एक स्पष्ट सार्वजनिक प्रक्रिया-पत्र तैयार किया जाए, जिसे बाद में बदला न जा सके। साथ ही, लेनदार समिति किसी भी बोली को रद्द करते समय अपना निर्णय लिखित व सुसंगत कारणों के साथ दर्ज करे। नीलामी और चुनौती प्रक्रियाओं के लिए भी एक मानक संचालन प्रक्रिया जारी की जानी चाहिए, ताकि मामलों में पारदर्शिता और प्रक्रिया-निश्चितता सुनिश्चित हो सके। जब तक संहिता को विवेकाधीन अस्पष्टता से मुक्त नहीं किया जाता, तब तक उसकी साख और निवेशकों का भरोसा स्थापित नहीं हो पाएगा।
आईबीसी की मजबूती केवल कॉरपोरेट विवादों का प्रश्न नहीं है; यह उस वित्तीय ढांचे की साख का प्रश्न भी है, जिस पर देश की आर्थिक प्रगति टिकी है। यदि प्रक्रिया स्पष्ट व परिणाम निश्चित हों, तो उसका लाभ अंततः बैंकिंग प्रणाली, निवेश वातावरण और आम नागरिक तक पहुंचता है।
(लेखक चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं।)