प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में इतनी रैलियों को संबोधित किया है, जितना किसी संसदीय चुनाव में इससे पहले किसी राष्ट्रीय पार्टी के नेता ने नहीं किया था। यह स्पष्ट है कि मोदी चाहते हैं कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की सीटों की संख्या नाटकीय रूप से बढ़ जाए, क्योंकि उनकी पार्टी को हिंदी पट्टी के राज्यों में होने वाले संभावित नुकसान की भरपाई करनी है। भाजपा के नेता अपने प्रदर्शन को लेकर बड़े-बड़े दावे कर भी रहे हैं।
अमित शाह ने कहा है कि भाजपा को बंगाल की 42 में से 23 सीटें मिलेंगी। 29 अप्रैल को रेल मंत्री पीयूष गोयल ने दावा किया कि इस राज्य में भाजपा का सीटों का आंकड़ा 30 को पार कर जाएगा। इसी दिन मोदी ने उत्तरी कोलकाता में एक सभा को संबोधित करते हुए दावा किया, 'दीदी आपके 40 विधायक हमारे संपर्क में हैं।' और यह दावा मोदी के उस खुलासे के तीन दिन बाद आया, जब उन्होंने कहा था कि दीदी उन्हें मिठाइयां और कुर्ते भेजती हैं; यह तृणमूल कांग्रेस के समर्थकों को भ्रमित करने की स्पष्ट कोशिश थी।
यानी बंगाल की लड़ाई सिर्फ संसदीय चुनाव में अधिक सीटें जीतने तक सीमित नहीं है। ऐसा लगता है कि बांग्लाभाषी बहुल त्रिपुरा में मिली नाटकीय जीत से प्रेरित भाजपा की नजर 2022 के विधानसभा चुनाव पर है। ममता की तरह, जिन्होंने 2009 में लोकसभा चुनाव में भारी जीत के बाद 2011 में विधानसभा चुनाव में भी बुनियादी तौर पर जीत दर्ज की थी, भाजपा 2019 के लोकसभा चुनाव को बंगाल के लिहाज से सेमीफाइनल मान रही है। मोदी और अमित शाह उम्मीद कर रहे हैं कि इतिहास खुद को इस बार उनके लिए दोहराएगा।
पश्चिम बंगाल में भाजपा जिस तरह से जोर लगा रही है, वह संघ परिवार द्वारा राज्य में सदस्यता के लिए चलाए गए अभियान के क्रम में ही है। आरएसएस दक्षिण बंगाल के महासचिव जिश्नु बसु कहते हैं, 'पिछले तीन से चार सालों में पश्चिम बंगाल में आरएसएस की सदस्यता के लिए चलाए गए अभियान के अच्छे नतीजे सामने आए हैं। नियमित शाखाओं में आने वाले युवक और युवतियों की संख्या में खासी बढ़ोतरी हुई है। 2013 में पश्चिम बंगाल में संघ की 750 शाखाएं लगती थीं, जो 2018 में बढ़कर 1,279 हो गईं।'