अजमल कसाब को फांसी देने का मतलब यह नहीं है कि इससे देश में आतंकी हमले का खतरा खत्म हो गया है या पाकिस्तान के रवैये में फर्क आ जाएगा अथवा सीमापार आतंकी संगठन इससे कोई सबक लेंगे। यह तो होना ही था। कसाब को एक न एक दिन फांसी होनी ही थी। इसलिए यह कोई चमत्कार नहीं हो गया है।
यह बात समझ लेनी चाहिए कि अजमल कसाब और उसके साथी मरने के लिए ही भारत आए थे। बाकी नौ उसी वक्त मारे गए, जब उन्होंने मुंबई पर हमला किया, और यह उस समय बच गया, इसीलिए चार साल और जी गया। लेकिन यह भी सच है कि एक कसाब को फांसी दे देने से हालात में कोई बहुत बड़ा बदलाव आने वाला नहीं है। यह जरूर कहना चाहिए कि भारतीय न्याय प्रक्रिया के हिसाब से कसाब के इस मामले को शीघ्रता से निपटाया गया। वरना उसी मुंबई में एक के बाद एक तेरह बम धमाके हुए थे, लेकिन उस हमले के दोषी को आज तक सजा नहीं दी गई है।
जहां तक पड़ोसी देश पाकिस्तान की बात है, तो वह भले ही आधिकारिक तौर पर यह कहे कि वह आतंकवाद के खिलाफ है और किसी भी आतंकी कार्रवाई को समर्थन नहीं करता है, लेकिन सचाई यह है कि वह आतंकी संगठनों को समर्थन और सहायता देने से किसी भी तरह बाज नहीं आने वाला। उसके ऐसा न करने की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है।
वस्तुतः जब तक वह अपने देश में आतंकी ढांचे को खत्म नहीं करता, तब तक उसके दावे पर कतई भरोसा नहीं किया जा सकता। इसलिए कसाब को फांसी देकर हम यह कतई न समझें कि इससे वहां के आतंकी संगठनों को कोई सख्त संदेश मिलेगा, बल्कि वे इसी बहाने अपने लिए और समर्थन जुटाने की कोशिश करेंगे। वे कसाब को नायक का दरजा देकर शहीद बताने की कोशिश करेंगे तथा इसी बहाने अन्य युवाओं को भी अपने नापाक संगठनों में शामिल करने की जी-तोड़ कोशिश करेंगे।
इस एक घटना से हमें यह भी नहीं समझना चाहिए कि आतंकवाद के खिलाफ अब हमारी सरकार आर-पार के मूड में आ गई है। सवाल यह उठता है कि मुंबई हमले के बाद जब हमने आतंकवाद को प्रश्रय देने और आतंकी घटनाओं को प्रायोजित करने के विरोध में पाकिस्तान से बातचीत बंद करने की बात कही, तो फिर आखिर ऐसी क्या मजबूरी आ गई कि हम स्वयं ही उससे बात करने के लिए तैयार हो गए? पाकिस्तान के स्वभाव में इस बीच ऐसा क्या बदलाव आ गया कि हम उससे बेहतर रिश्ता बनाने की बात करने लगे?
पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र घोषित करवाने के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव बनाने के बजाय उससे बातचीत शुरू करके हमने उसे अपनी बराबरी पर ला दिया और उसे वैधानिकता प्रदान कर दी। अब बेहतर रिश्ते बनाने के नाम पर पाकिस्तान के साथ क्रिकेट मैच खेलने की बात हो रही है! इसे क्रिकेट कूटनीति का नाम दिया जा रहा है। क्रिकेट से भला संबंध कैसे सुधर सकते हैं? देश में ऐसे भी लोग हैं, जो क्रिकेट मैच के बहाने करोड़ों रुपये बनाने की बात सोचते हैं।
कनफ्लिक्ट मैनेजमेंट का बुनियादी तर्क है कि जब तक आप स्वयं किसी सिद्धांत पर अडिग नहीं रहेंगे, तब तक दूसरा आपकी इज्जत नहीं करेगा। इसलिए पाकिस्तान को सही रास्ते पर लाने के लिए हमें ठोस पहल करनी पड़ेगी, ढुलमुल नीति से काम नहीं चलेगा। आतंकवाद को खत्म करने के लिए हमें अपनी नीतियों में ईमानदारी बरतनी होगी। आतंकवाद को वोट बैंक की राजनीति से अलग करना पड़ेगा। यह नहीं कि एक को फांसी चढ़ा दिया और दूसरे के प्रति राजनीति होने लगी। सवाल है कि क्या हमारी सरकार इसके लिए तैयार है। कसाब को फांसी देकर केंद्र सरकार जिस तरह के सख्त तेवर दिखा रही है, क्या यही रवैया आगे भी जारी रहेगा? क्या देश-दुनिया आगे भी आतंकवाद के खिलाफ इसी सख्ती का उदाहरण देखेगी?