अगले एक महीने के दौरान अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक अर्थव्यवस्था में अफरा-तफरी दिखाई दे सकती है, जब चार नवंबर, 2018 को ईरान के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंध लागू हो जाएंगे। ट्रंप प्रशासन यह कहकर अपने रुख का औचित्य ठहराएगा कि उसने अमेरिका के प्रतिबंधों से बचने के लिए चीन के साथ व्यापार करने वाले देशों को छह महीने का समय दिया।
राष्ट्रपति ट्रंप को अच्छी तरह से पता है कि उनकी नीति कई देशों की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करेगी, जबकि उनका लक्ष्य स्पष्ट रूप से ईरान को दंडित करना है। अनुषांगिक नुकसान भारी महंगा होने जा रहा है। वह इस बात को लेकर सुनिश्चित दिखते हैं कि इससे अमेरिका खुद को महाशक्ति के रूप में दिखा सकेगा और यह भी कि वह अपनी मर्जी से चाहे जिस किसी देश को भी रौंद सकता है। इस तरह ट्रंप प्रशासन अपने नजरिये में बहुत संकीर्ण है।
जबसे राष्ट्रपति ट्रंप छह पक्षीय ईरान परमाणु समझौते से बाहर निकल गए हैं, वैश्विक व्यवस्था, पश्चिम एशिया में क्षेत्रीय व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय तेल एवं गैस बाजार पर अनिश्चितता के बादल गहराने लगे हैं। यह अराजक घटनाक्रम अंततः अमेरिका के अपने राष्ट्रीय हितों का ही नुकसान करेगा।
आखिरकार अमेरिका में घरेलू राजनीति इस मुद्दे पर विभाजित है, अमेरिकी कंपनियां इसे खुले दिल से समर्थन नहीं कर रही हैं, ईरान के साथ छह पक्षीय परमाणु समझौते के अन्य सदस्य ट्रंप के नजरिये का समर्थन नहीं करते हैं। अमेरिका के कई मित्र देशों ने ट्रंप प्रशासन की इस प्रतिबंध की नीति पर अत्यंत नाराजगी जताई है।
इससे ऐसी स्थिति बन गई है, जिसमें अमेरिका एक तरफ और शेष अंतरराष्ट्रीय समुदाय दूसरी तरफ हैं। केवल एक देश ने ईरान के साथ पूरी तरह व्यापार बंद कर दिया है और वह देश है दक्षिण कोरिया। मगर सियोल का यह निर्णय स्वैच्छिक नहीं है, बल्कि उसने ऐसा फैसला दबाव के तहत लिया है!
यूरोपीय संघ, रूस, चीन, भारत और कई अन्य देश अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के लिए अमेरिकी डॉलर के बजाय अन्य मुद्राओं में ईरान के साथ व्यापार करने के लिए रास्ता तलाशने के लिए जूझ रहे हैं। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस तरह के उपाय सफल होंगे या नहीं। लेकिन अगर यह सफल होता है, तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश व्यवस्था के लिए एक झटका होगा, जिस पर अब भी अमेरिकी डॉलर का वर्चस्व है। जल्द ही इस उपाय की दूसरों द्वारा नकल की जा सकती है और डॉलर का प्रभुत्व चुनौतियों के दायरे में आ जाएगा। हालांकि यदि यह उपाय विफल होता है, तो यह ट्रंप प्रशासन की जीत होगी तथा ईरान की भारी हार और उन देशों के लिए पीड़ा, जो ईरान से तेल और गैस खरीदते हैं तथा अपने उत्पाद ईरान को बेचते हैं।
दूसरी तरफ ईरान ने अमेरिकी तानाशाही के आगे नहीं झुकने का संकल्प ले लिया है। उसने हाल ही में विद्रोहियों के कब्जे वाले सीरियाई क्षेत्र में एक मिसाइल दागी, जो एक तरह से अमेरिका, इस्राइल और सऊदी अरब के लिए चेतावनी है। वह अमेरिकी डॉलर के बजाय अन्य मुद्राओं में अपना तेल व्यापार जारी रखने के लिए तैयार है और वह भी रियायती मूल्यों पर। परमाणु समझौते को तोड़ने पर उसने अपने परमाणु कार्यक्रम को फिर से शुरू करने की धमकी दी है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यूरोपीय संघ, रूस, चीन, तुर्की और भारत समेत कई अन्य देशों ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एकपक्षीय रवैये के खिलाफ अपनी ताकत को एकजुट नहीं किया है। वे सभी वाशिंगटन के साथ द्विपक्षीय वार्ता के जरिये से इस मुद्दे को निपटाना चाहते हैं। इन सभी देशों की ईरान के साथ संलग्नता और व्यापारिक हित के स्तर अलग-अलग हैं। अमेरिका के साथ इन सभी देशों के गहरे आर्थिक रिश्ते हैं। यदि यह सिर्फ अमेरिका और ईरान के बीच एक मुद्दा है, तो जाहिर है कि उपरोक्त देशों में से कोई भी अमेरिका के साथ व्यवसाय करने से संबंधित अपने आर्थिक हितों को खोना नहीं चाहेगा। ईरान के साथ व्यापार जारी रखना उनके लिए महंगा साबित होगा।
यही वजह है कि कम-से कम अभी कुछ समय के लिए ट्रंप प्रशासन की स्थिति मजबूत है। उदाहरण के लिए, भारत के पास ईरान को अपने पक्ष में रखने के पर्याप्त कारण हैं। भारत ने ईरान में चाबहार बंदरगाह विकसित किया है, अफगान से संबंधित मुद्दों पर उसने ईरान के साथ तालमेल किया है और ईरान से तेल खरीदने का मुद्दा उसके लिए इतना महत्वपूर्ण है कि उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। लेकिन भारत की अमेरिका के साथ सामरिक भागीदारी है और अमेरिका के साथ व्यापार व निवेश संबंधी रिश्ता बेहद महत्वपूर्ण है। ऐसे में उसके पास 'या तो' (विकल्प) की स्थिति नहीं हो सकती है।
भारतीय कूटनीति के समक्ष अमेरिका के साथ ऐसी सौदेबाजी करने की चुनौती है, जिससे अमेरिकी प्रतिबंध प्राधिकरण द्वारा भारत को उससे छूट मिल सके। भारत को ट्रंप प्रशासन को यह समझाना होगा कि ईरान मुद्दे के बहुआयामी पहलुओं की अनदेखी करने की कीमत क्या होगी। ईरान के साथ ऊर्जा व्यापार भारतीय दृष्टिकोण से एक पहलू है। अमेरिका ने यह संदेश भेजा है कि वह भारत के मामले पर विचार करेगा, लेकिन इसमें उस लागत को भी शामिल किया जाएगा, जिसका भार भारत को वहन करना होगा। कुल मिलाकर डोनाल्ड ट्रंप ने एक व्यापक वैश्विक अव्यवस्था को जन्म दिया है और उनकी ईरान नीति इस अर्थव्यवस्था का कारण और लक्षण, दोनों है।
-लेखक जेएनयू में प्राध्यापक हैं