फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

ऐसी उदारता किस काम की

Fri, 11 Jan 2013 10:39 PM IST
अरुण नेहरू
विज्ञापन
विज्ञापन
बीते दिनों पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा नियंत्रण रेखा के भीतर घुसकर आठ सैनिकों की पलटन पर घात लगाकर हमला करना एक बड़ी त्रासदी है। उन्होंने दो सैनिकों की हत्या कर उनमें से एक के शव को विकृत कर दिया। यह ठीक है कि हमारा पड़ोसी एक शैतान मुल्क है, और हम उसके साथ रिश्ते सुधारने का औचित्य ठहराते हुए कोई भी तर्क दे सकते हैं, लेकिन क्या हम मुंबई हमले से आगे बढ़ पाए हैं? हमारे तमाम तर्क पुराने हैं, और अपने कदमों को सही ठहराने की तमाम दलीलें पहले सुनी जा चुकी हैं। हम क्रिकेट खेलेंगे, वीजा नियमों को उदार बनाएंगे, व्यापारिक संपर्कों को बढ़ावा देंगे, पाकिस्तान में अच्छे शासन के आने की प्रतीक्षा करेंगे और उसके प्रायोजित आतंकी गुटों द्वारा मारे गए अपने नागरिकों, सैनिकों एवं सुरक्षाकर्मियों को सही वक्त पर श्रद्धांजलि देंगे!
विज्ञापन


ठीक है कि पाकिस्तान से निपटने का कोई आसान विकल्प नहीं है, लेकिन हम यह भी समझना नहीं चाहते कि हमारी उदारता से कुछ नहीं होने वाला। पाकिस्तान से अपनी गतिविधियों को अंजाम देने वाले आतंकवादी इस बात को जानते हैं। यही कारण है कि हमारे एवं वैश्विक समुदाय की लाख कोशिशों के बावजूद 26/11 मामले में अब तक कुछ नहीं हुआ और इस घटना के संदर्भ में भी कुछ नहीं होगा। ऐसे मौकों पर हमें अपनी पारंपरिक सोच से बाहर निकलकर सोचना होगा।

पिछले महीने की घटनाओं ने महिलाओं की सुरक्षा के संदर्भ में एक सोच को जन्म दिया है। लेकिन तमाम बुरी चीजों के बीच मैं कुछ अच्छाइयां भी देखता हूं। मुझे कहा जाता है कि मैं अक्सर वस्तुस्थिति से अनभिज्ञ रहता हूं, क्योंकि मुझे अपने देश और देश की चीजों में कुछ भी गलत नहीं लगता है। मैं मानता हूं कि इसके लिए हम सभी दोषी हैं, क्योंकि हमें अपने देश से प्यार है। यह दुखद है कि सुधार की पहल सुशासन की निरंतर प्रक्रिया और अपना स्वार्थ न सोचने वाले कुछ बेहतर नेताओं की कोशिशों के कारण नहीं, बल्कि व्यापक कष्ट एवं नुकसान के बाद होती है। यह सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि शासन के तीनों अंगों की कटु सचाई है। दुखद है कि गठबंधन ढांचे ने सुधार की प्रक्रिया को मुश्किल बना दिया है, जिसका खामियाजा सबको भुगतना पड़ेगा।
विज्ञापन


इसके लिए हमें सोच-समझकर कदम उठाना होगा। अब देखिए कि 'निर्भया' के साथ जो बर्बर बर्ताव हुआ, उससे उसको एवं उसके परिवार को कितना कष्ट भुगतना पड़ा। बेशक हम एक-दूसरे पर दोष मढ़कर अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ सकते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि इसके लिए हम सभी जिम्मेदार हैं। महिलाओं के जीवन में हर स्तर पर उसके साथ स्वाभाविक रूप से भेदभाव होता है। इस ऐतिहासिक भूल को सुधारने का यह हमारे लिए एक अवसर है। और हमें अपने व्यवहार में बदलाव की शुरुआत अपने घर एवं परिवार से करनी होगी।

हम अक्सर अपनी जनसांख्यिकी प्रणाली, नई प्रौद्योगिकी और सोशल मीडिया की अभिव्यक्ति के व्यापक प्रसार के बारे में बातें करते हैं और पाते हैं कि हाल की घटनाओं पर इसके अच्छे एवं बुरे प्रभाव पड़े हैं। हम सबने अरब क्रांति देखी है, जिसके चलते कई देशों में लोग सड़कों पर उतर आए।  लोकतांत्रिक संस्थाओं के अभाव में मानव जीवन का नुकसान होता है, पर हमारे देश में चीजें वहां से अलग हैं। दिल्ली में लोगों ने सड़कों पर उतरकर जिस तरह प्रदर्शन किया, वह राष्ट्रीय भावनाओं को दर्शाता है। यह मानना गलत होगा कि इस मुद्दे पर ग्रामीण एवं शहरी भारत अलग-अलग सोचता है।

आसाराम बाबा के 'विचारों' को हल्के में नहीं लेना चाहिए। ऐसा लगता है कि दकियानूसी मानसिकता का पर्दाफाश हो रहा है। हमें जागरूक टीवी मीडिया एवं प्रौद्योगिकी का शुक्रगुजार होना चाहिए, जो सुनिश्चित करता है कि अब कुछ भी गोपनीय नहीं है। बाबा और उन जैसे लोग पहले भी ऐसी भाषा का प्रयोग करते थे, पर मुझे नहीं लगता कि भविष्य में वे ऐसी भाषा का प्रयोग करेंगे। अच्छा होता, अगर उन्होंने माफी मांगने के क्रम में हाथी और भौंकने वाले कुत्ते का जिक्र नहीं किया होता। अच्छी बात यह है कि ऊंची उड़ान भरने वाले इस बाबा पर अब लोगों की नजर रहेगी। उनकी संपत्ति की जांच भी जरूरी है। ऐसे आत्मकेंद्रित लोग खुद को लोक निगरानी और कानून से ऊपर समझते हैं।

आसाराम के अलावा हैदराबाद में मजलिस-ए इत्तेहादुल-मुस्लमीन के विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी ने भी नफरत फैलाने वाला भाषण दिया। ऐसा नहीं है कि उन्होंने पहली बार ऐसा भाषण दिया। हां, इस बार फेसबुक, ट्वीटर, यू ट्यूब मीडिया के कारण ही यह संभव हुआ कि नफरत फैलाने वाला उनका भाषण चंद सेकंडों में दुनिया भर में फैल गया। जनमत की प्रतिक्रिया काफी गंभीर थी। हैदराबाद से बाहर ओवैसी को शायद ही कोई जानता होगा, लेकिन आज गलत कारणों से पूरे देश के लोग उन्हें जान गए हैं। इस घटना में सभी राजनेताओं के लिए एक सबक छिपा है। जनसभाओं को संबोधित करते हुए नफरत फैलाने वाले भाषण देना आजकल आम प्रवृत्ति है। ऐसे लोग यह भी नहीं सोचते कि इस तरह की असावधानी को अब रिकॉर्ड करके मिनट भर में पूरे देश में प्रसारित किया जा सकता है। पिछले महीने कई राजनेताओं के साथ ऐसा हुआ है।
विज्ञापन



विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें