भारतीय क्रिकेट टीम जिस हालत से गुजर रही है, वह सबके सामने है। घरेलू शृंखला में इंग्लैंड की टीम ने भारतीय क्रिकेट टीम का बैंड बजाया, पाकिस्तान ने आकर भारतीय क्रिकेट को आईना दिखा दिया, और अब फिर इंग्लैंड की बारी है। निराशा सिर्फ क्रिकेट को लेकर ही नहीं है। भारतीय क्रिकेट के बाजारू संस्करण आईपीएल के बाद अब हॉकी की हॉकी इंडिया लीग के भी बाजार में शुभ चरण प्रवेश कर गए हैं। हॉकी खिलाड़ी भी अपने खेल में नीलाम हो गए हैं। खिलाड़ियों को धन मिलना चाहिए, इससे किसी खेल प्रेमी को ऐतराज नहीं होगा। लेकिन क्या नीलामी ही इसका एकमात्र रास्ता है?
आईपीएल क्रिकेट के पांच सफल वर्षों के बाद भारतीय क्रिकेट अपने इतिहास के सबसे कठिन समय से गुजर रहा है। इससे साफ है कि पूंजी खेल को लोकप्रिय और खिलाड़ियों को धनी तो बना सकती है, पर खेल में सफलता नहीं दिला सकती। भारतीय क्रिकेट की यह दुरावस्था तब है, जब क्रिकेट आर्थिकी में भारतीय क्रिकेट बोर्ड को सबसे रईस और वैश्विक क्रिकेट को चालित करने वाला माना जाता है।
यानी खेल और खिलाड़ियों की सफलता का आकलन उसमें आने वाले धन से नहीं किया जा सकता। पूंजी जरूरी होती है, लेकिन उसके उत्तरदायित्व भी होते हैं। जब तक पूंजी से सही व्यवस्था चलती है, तब तक खेल भी पनपता है। लेकिन जब उस व्यवस्था को चलाने वाले पूंजी को ही चलाने के खेल में लग जाते हैं, तो खेल और व्यवस्था, दोनों चरमरा जाती है। जो हाल भारतीय क्रिकेट का हो रहा है, आशा है, वह भारतीय हॉकी का नहीं होगा।
दरअसल खेल को व्यापार बना देने वाली मौजूदा व्यवस्था गलत है। यह हम सबको मालूम है कि नीलाम की गई वस्तु का मूल्य कभी सही नहीं लगता। नीलामी में महंगी वस्तु सस्ते में और सस्ती वस्तु महंगे में बिक जाती है। सवाल है कि खेल चलाने वालों की समझ में यह क्यों नहीं आता। या फिर वे समझना ही नहीं चाहते? खेल में पूंजी लाने के लिए वे खेल के अस्तित्व से ही समझौता करते हैं।
आईपीएल की सफलता दरअसल उसमें लगने वाली पूंजी से नहीं, बल्कि उसके क्रिकेटीय स्वरूप और खिलाड़ियों के आकर्षक खेल के कारण हुई है। आईपीएल में खिलाड़ियों की नीलामी वह खेल है, जिसे खेलकर टीम मालिकों को सट्टे का उन्माद और नशे का आनंद मिलता है। बड़े उद्योग घराने इसी कारण खेल को व्यवसाय मानकर पूंजी लगाते हैं। आईपीएल के सभी टीम मालिक बेशक पिछले पांच वर्षों में मुनाफा नहीं कमा पाए हैं। फिर भी वे आईपीएल में पूंजी क्यों लगाए हुए हैं? दरअसल आईपीएल की व्यवस्था उन्हें ऐसा अवसर देती है, जिस कारण वे अपना काला धन सही जगह लगाते हैं। खिलाड़ियों के मालिक बनने का नशा और खेल में सट्टे की संभावना को वे खेल प्रोत्साहन के बहाने भुनाते हैं।
भारतीय हॉकी की बात करें, तो इसका परिदृश्य निराशाजनक ही रहा है। प्रीमियर हॉकी लीग तो आईपीएल से भी पहले शुरू की गई थी। लेकिन वह राज्य खेल संघों द्वारा चलाई गई थी, जो दो साल बाद बंद हो गई। अब हॉकी में आईपीएल की तर्ज पर हॉकी लीग कराई जाएगी और उद्योग घरानों को खिलाड़ियों का मालिकाना हक दिया जाने वाला है। हॉकी में पूंजी चाहे जैसे भी आए, यह शुभ संकेत है, लेकिन खिलाड़ियों के गौरव को सरेआम नीलाम करना खेल नहीं हो सकता। यह मान लेना भोलापन है कि नीलामी से भारतीय हॉकी का कायाकल्प हो जाएगा।
यह वैसा ही उदाहरण है, जैसे करीब दो दशक पहले आई नव उदारवाद की बाजारवाद नीति से देश में गरीबी दूर करने के सपने दिखाए गए थे। हॉकी को आईपीएल की तर्ज पर ले जाने से पहले हॉकी के हमारे नीति-नियंता कम से कम भारतीय क्रिकेट की मौजूदा दुर्दशा देखकर ही कुछ सबक लेते। ज्यादातर विशेषज्ञ कह रहे हैं कि क्रिकेट में अपनी टीम का यह हाल ज्यादा से ज्यादा ट्वंटी-20 खेलने के कारण हुआ है। भारतीय हॉकी तो पिछले काफी समय से मृतप्राय पड़ी है। ऐसे में उसे आईपीएल की तर्ज पर ले जाने का फैसला एक और सुबूत है कि हॉकी प्रबंधन इसकी बीमारी दूर करने का इच्छुक नहीं है।