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कम होता अमेरिकी दबदबा!

Wed, 12 Mar 2014 07:09 PM IST
डेविड ब्रूक्स
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अमेरिकी दुनिया को कैसे देखते हैं और विश्व में अमेरिका की क्या भूमिका है, इसके बारे में अमेरिकियों की धारणा में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखा जा रहा है। हाल ही में किए गए प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे के मुताबिक, पिछले पचास वर्षों में यह पहली बार है, जब अमेरिका की बहुसंख्यक आबादी यह कह रही है कि वैश्विक मामलों में अमेरिका की भागीदारी कम होनी चाहिए।
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ज्ञात इतिहास में पहली बार बहुसंख्यक अमेरिकियों का मानना है कि दुनिया भर में जो कुछ भी हो रहा है, उसमें अमेरिका का प्रभाव घट रहा है। कुछेक लोगों का कहना है कि वैश्विक समस्याओं के समाधान के लिए उनके देश ने काफी कुछ किया है। पहली नजर में यह वैश्विक घटनाओं से खुद को अलग-थलग करने की कोशिश जैसा लगता है। मानो इराक एवं अफगानिस्तान के युद्धों से थके और लंबे आर्थिक ठहराव से जूझते अमेरिकी अपने अंदरूनी मसलों तक ही सिमटे रहना चाहते हैं। लेकिन आंकड़ों पर नजर डालेंगे, तो पाएंगे कि ऐसा नहीं है। आर्थिक रूप से अमेरिका खुद में नहीं सिमट रहा है। तीन चौथाई से ज्यादा अमेरिकी मानते हैं कि अमेरिका को विश्व के साथ आर्थिक रूप से और ज्यादा जुड़ना चाहिए।

सांस्कृतिक रूप से भी अमेरिका अपने तक सीमित नहीं रहना चाहता। बहुसंख्यक आबादी संस्कृति के भूमंडलीकरण एवं कॉलेजों व कार्यस्थलों के अंतरराष्ट्रीयकरण की हिमायती है। वे लोकतंत्र, मानवाधिकार एवं विकास को बढ़ाने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर प्रयास करने में ज्यादा विश्वास करते हैं।
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जो हो रहा है, उसे स्पष्ट तौर पर इस तरह कहा जा सकता है कि वैश्विक मामलों में ऊंची राजनीति से अमेरिकियों का विश्वास उठ गया है। उनका इस पर से भी भरोसा उठ गया है कि अमेरिकी राजनीतिक एवं सैन्य संस्थान दुनिया को आकार देने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। अमेरिकी राय में अद्भुत तरीके से ऐसी सीमाएं भी देखी जा सकती हैं कि राजनीतिक एवं सैन्य प्रयासों में किस तरह की बंदिशे हैं।

सर्वे दिखाता है कि यह भावना डेमोक्रेट एवं रिपब्लिक, दोनों में समान रूप से है। आश्चर्यजनक रूप से रक्षा बजट में प्रस्तावित कटौती के खिलाफ बहुत कम विरोध हुआ, जिसमें अमेरिकी सेना को 1940 के बाद से घटाकर अपने न्यूनतम स्तर पर लाने की बात है। ऐसा इसलिए, क्योंकि अमेरिकी लोगों को अब यह यकीन हो गया है कि हमारे पास काफी सैन्य शक्ति है। ये बदलाव मात्र इराक के बाद का मोहभंग या ओबामा प्रशासन के कार्यकलाप का परिणाम नहीं है, बल्कि विदेश नीति के मूल्यों में परिवर्तन गहरे और व्यापक सांस्कृतिक बदलाव का प्रतिफल है।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दिग्गज बड़ी इकाइयों, बड़ी सेना, निगमों और संघों में बुनियादी भरोसे के साथ नागरिक जीवन में लौटे थे। वे एक श्रेणीबद्ध नेतृत्व शैली को अपनाने की ओर प्रवृत्त हुए। शीत युद्ध स्पष्ट रूप से परिभाषित राष्ट्र-राज्यों के बीच की प्रतिस्पर्धा थी। प्रभावशाली अमेरिकी नेताओं ने एक उदारवादी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाई। उन्होंने समुद्र में विचरने वाले बेड़े, दुनिया भर में तैनात सेनाओं तथा कूटनीतिक कौशल से उसे संरक्षित किया।

आगामी दशकों में जीवन के हर क्षेत्र में बड़ी इकाइयों पर से भरोसा उठ गया। प्रबंधन पदानुक्रम तेजी से शिथिल हुआ। आज लोग संभवतः यही मानते हैं कि इतिहास चौराहों पर एकत्र लोगों से संचालित होता है, न कि शीर्ष पर बैठे लोगों से। उदारवादी व्यवस्था अमेरिकी सैन्य ताकत द्वारा आयोजित और संरक्षित व्यवस्था मात्र नहीं है, बल्कि यह सीधे लोगों से लोगों के बीच संपर्क का एक सहज नेटवर्क है, जो इंटरनेट की धमनियों में बह रहा है।

विश्व की असली ताकत सैन्य या राजनीतिक नहीं है। यह ताकत है, लोगों की सहमति वापस लेने की क्षमता। वैश्विक बाजार, वैश्विक मीडिया के इस युग में माना जाता है कि सामूहिक जनशक्ति के आगे सरकार और टैंकों की शक्ति धूमिल पड़ जाती है। नेतृत्वहीनता एक वैश्विक परिघटना है। राजनेता इतिहास के अग्रिम मोर्चे पर नहीं हैं। समूह में ही असली सत्ता निहित है। आगामी सिद्धांत निश्चित रूप से रीगनवाद नहीं है, जिसमें माना जाता है कि अमेरिका को अपनी ताकत का इस्तेमाल निरंकुशता को हराने एवं लोकतंत्र को बढ़ाने के लिए करना चाहिए। यह कांटवाद (जर्मन दार्शनिक इमानुएल कांट का सिद्धांत) या वह धारणा नहीं है, जिसमें कहा जाता है कि विश्व का संचालन अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार होना चाहिए। यह यथार्थवाद भी नहीं है, जिसमें माना जाता है कि राजनयिकों को शक्ति संतुलन एवं राष्ट्रीय हितों को बढ़ाने के लिए शतरंज की चाल चलनी चाहिए। यह एक क्रांतिकारी विचार है कि सत्ता की प्रकृति (यह कैसे आती है और इसका कैसे इस्तेमाल होता है) मूलरूप से बदल गई है और सिर्फ बड़े पदों पर बैठे लोगों को ही सत्ता नहीं मिलती है। यह मानना बिल्कुल नादानी है कि संघर्ष मुक्त सहयोग और लोगों को धमकाकर विश्व की समस्याएं हल की जा सकती हैं, चाहे वह पुतिन या ईरान के रूप में ही क्यों न हो, आसानी से उनका सामना नहीं किया जा सकता। यह काल्पनिक धारणा है कि राजनीति और संघर्ष वैकल्पिक हैं।

असल में हम एक ऐसे देश में रहते हैं, जहां कई लोग इस तरह काम करते हैं, मानो इतिहास नेतृत्वविहीन है। घटनाएं सतह से स्वाभाविक रूप से उभरती हैं। ऐसे समाज का नेतृत्व करना बहुत मुश्किल है। ऐसे समाज का नेतृत्व वही व्यक्ति कर सकता है,जो लोगों में तीव्र नैतिक वफादारी जगा सकता है, और यहां तक कि वह क्षणभंगुर भी हो सकता है।
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