जो बयार आजकल बह रही है, उसमें अगर प्रधानमंत्री पद के दावेदारों के नित नए नाम उछल रहे हैं, तो किम आश्चर्यम? इतिहास साक्षी है कि जहां ज्यादातर विपक्ष में बैठने और घुटने जाम हो जाने पर भी प्रधानमंत्री बनने का योग है, वहीं प्रतीक्षा सूची में नाम होने के बावजूद ‘बर्थ’ किसी और को एलॉट हो जाने का वियोग भी। सोलहवीं संसद का सारथी कौन होगा, यह सोलह मई के बाद ही पता चलेगा। वेटिंग लिस्ट बढ़ती जा रही है। पिछली बर्थ तो ‘तत्काल’ कोटे से कन्फर्म हुई थी।
हर डिजाइन के प्रधानमंत्री शोभायमान हैं हमारे संग्रहालय में। चूड़ीदार पैजामे से प्रारंभ होकर साड़ी के परिधान को अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलाते इस देश के असरदार से लेकर सरदार प्रधानमंत्री वाले पद का पहनावा धोती-पैजामा की यात्रा करता लुंगी पर भी कुछ दिनों टिका रहा। ऊंघने, झपकी लेने वालों तक ने अतीत में इस पद को सुशोभित किया। जब जहाज चलाने वाला युवक ‘हमें देखना है...हम देख लेंगे’ की सिफत से देश चला सकता है, तो उनके दल में ट्रेन में चाय बेचने वाले की ‘नमो-कामना' पर काहे का वितंडावाद। कुश्ती के दांव-पेच वाले तक अखाड़े पर नजर गड़ाए हुए हैं।
कविता से अतिरिक्त जुड़ाव रहा है इस पद का। अपने काव्य बोध को रोबर्ट फ्रॉस्ट की माइल्स टू गो...से अभिव्यक्ति देने वाले पहले प्रधानमंत्री के बाद 'राजा नहीं फकीर है, देश की तस्वीर है' मार्का कवि प्रधानमंत्री की वेदना जब पैगाम तुम्हारा/पता उनका/दोनों के बीच मैं ही फाड़ा जाऊंगा से व्यक्त हुई, तो कुर्सी ही कठुआ गई। कविता के दिन एक बार फिर बहुरे, जब कवि प्रधानमंत्री ने प्रभु से लघुता का विनम्र आशीष मांगा। मोर्चाबंद भक्तों ने समवेत कहा, एवमस्तु। हार नहीं मानूंगा/रार नहीं ठानूंगा कवि-मना प्रधानमंत्री अशक्त हो नेपथ्य में हैं। कम बोलने वाले प्रधानमंत्री ने कविता भले न पढ़ी हो, एकाध शेर ‘कट-पेस्ट’ कर अपने शायराना अंदाज का नमूना जाते-जवाते दे ही दिया। वह रिटायर हो रहे हैं, और ‘सिंह’-आसन के अनेक दावेदार हमारे सामने हैं। देखें, किसे क्या मिलता है!