इस साल पहली जनवरी को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) सूचकांक 41,306 अंकों पर बंद हुआ था। 12 मार्च को यह 20 फीसदी की गिरावट के साथ 32,778 अंकों पर पहुंच गया था। वहीं कल यानी 16 मार्च को यह 31,390 अंकों के साथ निचले स्तर पर पहुंच गया। यह गिरावट 25 फरवरी को शुरू हुई थी और ऐसा कोई स्पष्ट संकेत नहीं है कि यह गिरावट कब बंद होगी। इन तीन हफ्तों के दौरान वैश्विक शेयर बाजारों पर कोरोना वायरस का प्रभाव समान रूप से गंभीर रहा है। लेकिन भारत में केवल कोरोना वायरस के कारण निवेशकों का धन नहीं डूबा, बल्कि यस बैंक की विफलता भी इसके लिए जिम्मेदार थी।
इस वर्ष की शुरुआत से सोने की कीमत शिखर पर रही है और उसने 42,600 रुपये प्रति 10 ग्राम के आंकड़े को छू लिया है, कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय बाद सबसे कम है, तथा ब्याज दरों में कटौती की गई है। अमेरिकी बाजार भी गिरावट की गिरफ्त में है, लेकिन वहां के केंद्रीय बैंक ने वायरस के प्रभाव से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए 700 अरब डॉलर के सहायता कार्यक्रम की शुरुआत की है। अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने आपातकालीन ऋण देने की दर में 0.25 फीसदी की कटौती की और ऋण की न्यूनतम अवधि 90 दिनों तक बढ़ा दी। वास्तविकता यह है कि कोरोना वायरस का खतरा वैश्विक शेयर बाजारों के लिए भारी नुकसान का सबब बना है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 11 मार्च को कोरोना को वैश्विक महामारी घोषित किया, जो विश्व बाजार में गिरावट का एक बड़ा कारण बना। इसके अलावा भारत समेत कई देशों ने अनिश्चित काल तक के लिए अपनी सीमाएं बंद कर दी हैं। चूंकि शेयर बाजार खबरों और भावनाओं पर चलता है, और इन दोनों कारकों का संयोजन नकारात्मक है, यही वजह है कि केंद्रीय बैंकों के हस्तक्षेप का भी कोई अनुकूल नतीजा नहीं मिल पा रहा है। भारत में शेयर बाजार में गिरावट वैश्विक संकेतों के कारण है, जो इसे और गिरावट की ओर धकेल रहा है। अब जब यस बैंक की स्थिति नियंत्रण में है, भारत में कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों के कारण शेयर बाजार में घबराहट है।
स्कूलों और विश्वविद्यालयों का बंद होना तो समझ में आता है। लेकिन मॉल, मल्टीप्लेक्स और यात्राओं में कटौती ने अर्थव्यवस्था के कई हिस्सों को प्रभावित किया है। इन सब का वास्तविक प्रभाव अभी स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया है, लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि बाजार के पटरी पर आने और उसे पहले वाली ऊंचाई तक पहुंचने में कुछ समय लगेगा। मौजूदा वायरस से संबंधित आतंक कब खत्म होगा, इसका कोई स्पष्ट संकेत नहीं है, ऐसे में यह बताना असंभव है कि यह समस्या कब खत्म होगी। हालांकि इबोला और सार्स के भय के पिछले अनुभवों को देखें, तो लगता है कि कुछ समय के बाद सब कुछ ठीक हो जाएगा।
भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी देखी जा रही है, जो शेयर बाजार में गिरावट के कारण और गहराएगी। चीन अपनी तरह की बंदी की गिरफ्त में है, इसलिए दुनिया भर में वस्तुओं और कच्चे माल की आपूर्ति प्रभावित है। निवेशकों के बीच अपने निवेश को लेकर आशंका है, जिस कारण अनेक निवेशकों ने शेयर बाजार से अपना पूरा पैसा निकाल लिया है। हालांकि यह स्थिति से निपटने का बेहतर तरीका नहीं है। जमीनी हालात उतने बुरे नहीं हैं, जितना शेयर बाजार बता रहा है। ऐसे निवेशक, जिन्होंने पांच-दस साल या उससे अधिक समय के लिए निवेश किया है, वास्तव में उनके घबराने का कोई कारण नहीं है। शेयरों को बेचने के बजाय निवेशक निवेश करके इस तेज गिरावट को रोक सकते हैं। कई चतुर निवेशक इस तेज गिरावट का निवेश के अवसर के रूप में उपयोग करते हैं। हालांकि इस तरह का साहसिक कदम उठाना सभी निवेशकों के लिए संभव नहीं है।
बाजार के कामकाज के तरीके से निपटने का एक उपाय यह है कि आप अपने वित्तीय लक्ष्यों की प्राथमिकता तय करें। यदि आपके सामने कोई वित्तीय लक्ष्य है, तो उसे इस वर्ष में बाद के लिए या अगले वर्ष के लिए टाल दें।
आपको अपने मौजूदा निवेश पर विचार करना चाहिए। इस तरह से आपको कुछ नुकसान हो सकता है, लेकिन आगे के नुकसान में कटौती एक ऐसा कदम है, जो पूरी तरह बर्बादी की तुलना में बेहतर हो सकता है।
कुछ निवेशक, जिनके पास अपने वित्तीय लक्ष्य के लिए दो-तीन साल से अधिक का समय है, लेकिन वे अपने निवेश को जारी रखने के प्रति आश्वस्त नहीं हैं, वे तेजी से बाहर निकलना चाहते हैं। इसके बजाय वे तब तक निवेश रोक सकते हैं, जब तक कि शेयर बाजार में निवेश के अनुकूल माहौल न दिखे। यदि आप लंबे समय से निवेश कर रहे हैं और आपको 2008 के वित्तीय संकट का अनुभव है, तो इसे उसका एक और उदाहरण मान सकते हैं, जब बाजार केवल सामान्य रूप से काम करने के लिए अनुकूल अवसर की तलाश में अंधाधुंध व्यवहार करता है।
आप अपनी परिस्थितियों का मूल्यांकन करें और कोई भी कदम उठाने से पहले यह देखें कि कैसे आपका निवेश बढ़ सकता है। यदि आपका पैसा बैंक में जमा है, तो ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि भारत में बैंक कभी विफल नहीं हुए हैं। यहां तक कि हालिया यस बैंक प्रकरण से आश्वस्त होना चाहिए कि बैंक विफल नहीं होंगे। यदि आपका पैसा सहकारी बैंकों में जमा है, तो जितनी जल्दी हो सके, उसे किसी सार्वजनिक या निजी क्षेत्र के बैंकों में स्थानांतरित करें। यदि आपने म्यूचुअल फंड एसआईपी में निवेश किया है, तो आप अपने निवेश को जारी रख सकते हैं, यदि वित्तीय लक्ष्य तीन-पांच साल या उससे अधिक का हो। भारतीय वित्तीय प्रणाली में निवेश की सुरक्षा की कमी से संबंधित अफवाहों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।
भारतीय बैंकिंग और वित्तीय प्रणाली मजबूत है और किसी भी कठिन परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार है। हां, हम भविष्य में भी ऐसी स्थिति में बने रहेंगे, जब वित्तीय बाजार में स्थितियां कठिन रहेंगी, लेकिन पिछले आकंड़ों और प्रदर्शन का सबक यह है कि बाजार समय के साथ अपने नुकसान की भरपाई कर लेता है। इसलिए धैर्य रखें और निवेश करते रहें।