भारतीय दवा उद्योग चीन से शुरू हुए कोरोना वायरस महामारी की चपेट में आ गया है। यदि चीन में इसका प्रकोप जारी रहा, तो भारतीय दवा उद्योग पर संकट छा जाएगा। भारतीय दवा कंपनियां तकरीबन 60 ऐक्टिव फॉर्मास्युटिकल्स इनग्रेडिएंट या एपीआई चीन से मंगाती रही हंै, जो चीन के हेनान, हुबेई, गुआनडोंग, हुनान, वुहान, झेजेंग में बनते रहे हैं। हालांकि केंद्र सरकार ने इससे निपटने के लिए कई निर्णय लिए हैं, लेकिन यह संकट इतने से नहीं टलने वाला है। उन देशों के मरीजों पर इसका असर पड़ना शुरू हो गया है, जो भारत से निर्यात की जाने वाली दवाओं पर निर्भर हैं। दूसरी तरफ केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा चलाए जा रहे अस्पतालों में जिन दवा कंपनियों द्वारा जीवन रक्षक तथा आवश्यक दवाओं की आपूर्ति की जाती है, वे समय पर आपूर्ति नहीं कर पा रहे तथा सरकार से मांग कर रहे हैं कि इसके लिए उन पर कोई कार्रवाई न की जाए, न उन्हें काली सूची में डाला जाए।\
भारतीय दवा उद्योग जीवन रक्षक तथा आवश्यक दवाओं का उत्पादन करने के लिए चीन से आयातित होने वाले ऐक्टिव फॉर्मास्युटिकल्स इनग्रेडिएंट या एपीआई तथा इंडरमीडियेट्स पर अत्यधिक निर्भर है। वैसे अमेरिका, इटली तथा जर्मनी से भी ड्रग का आयात किया जाता है। हालांकि अभी भारतीय दवा कंपनियों के पास दो-तीन महीने का स्टॉक है, पर यदि चीन में स्थितियों में सुधार नहीं हुआ, तो भारतीय दवा कंपनियां मुसीबत में पड़ सकती हैं।
चीन पर दवाओं के लिए निर्भरता का मामला वर्ष 2016 में संसद में उठा था। भारतीय दवा कंपनियां दवा उत्पादन में लगने वाली 84 फीसदी बल्क ड्रग का आयात करती है, जिसमें से 65 से 70 फीसदी चीन से आयात किया जाता है। दवाओं के लिए चीन पर अति निर्भरता पर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने आगाह भी किया था। उसके बाद कटोच समिति का गठन किया गया, जिसने अपनी अनुशंसा में कहा कि देश में बल्क ड्रग के उत्पादन को फिर से पुनर्जीवित करने के लिए निर्माताओं को कर सहित कई रियायतें दी जाएं। पर उसके बाद भी स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है।
दो-ढाई दशक पहले ऐसी स्थिति नहीं थी। तब बल्क ड्रग का हमारे यहां उत्पादन होता था तथा उसे विदेशों को निर्यात भी किया जाता था। पर वैश्वीकरण की जंग में भारत इसमें पिछड़ गया, क्योंकि चीन से मंगाए जाने वाले बल्क ड्रग सस्ते होने लगे। दुखद यह है कि पिछले कई दशकों से सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियां सरकारी नीतियों के कारण बीमार हो गई हैं। सरकारों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि देश का आत्मनिर्भर दवा उद्योग विदेशों पर निर्भरशील होता जा रहा है। पूरी दुनिया में भारत को 'फॉर्मेसी ऑफ वर्ल्ड' माना जाता है। करीब 200 देशों को भारत से दवाओं का निर्यात किया जाता है। यहां तक कि जब से अमेरिका में भारतीय कंपनियों ने एड्स की दवा सस्ते दामों में उपलब्ध कराई, तो मजबूरन वहां की दवा कंपनियों को भी अपनी दवाओं के दाम कम करने पड़े। दवा उद्योग की देश की जीडीपी में 1.75 फीसदी की भागीदारी है।
इस समस्या के समाधान के लिए निजी क्षेत्र की दवा कंपनियों के भरोसे नहीं रहा जा सकता। स्थिति ठीक होते ही वे कंपनियां फिर चीन से सस्ता ड्रग मंगाना शुरू कर देंगी। लिहाजा सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियों को पुनर्जीवित कर ड्रूग तथा इनग्रेडिएंट का उत्पादन शुरू कर देना चाहिए, ताकि जीवनरक्षक तथा आवश्यक दवाओं के लिए विदेशों की निर्भरता कम होते-होते बंद हो जाए।