आठ नवंबर को प्रधानमंत्री की नोटबंदी की घोषणा और उसके प्रति रोष की आवाज अब बेशक कमजोर पड़ गई है, लेकिन वह पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। चूंकि नोटबंदी को अब दो महीने हो गए हैं, इसलिए इस पर समझदारी से विश्लेषण किया जा सकता है। नोटबंदी के मुद्दे से वस्तुतः कई विवादास्पद मुद्दे जुड़ गए हैं और इसके जरिये काले धन पर प्रहार ही ज्यादा सुर्खियों में आया। प्रधानमंत्री के एजेंडे का सबसे निराशाजनक पहलू यह है कि नोटबंदी का फैसला लेते हुए विनिमय अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर पर सबसे कम ध्यान दिया गया। प्रधानमंत्री के किसी सलाहकार ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया। मेरे लिए दीर्घकालीन अर्थों में यही सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है।
पर सबसे पहले काले धन पर बात करते हैं। इसका न तो काले से कुछ लेना देना है, न ही धन से। यदि रंगों से धन की पहचान होती, तो कानून लागू करने वाली एजेंसियों का काम बहुत आसान हो जाता। भारत सरकार की कई रिपोर्टों में इस समस्या को रेखांकित किया गया है, जिसमें पूर्व वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी की रिपोर्ट भी है। काला धन दूसरे धन की ही तरह है और प्रवर्त्तन निदेशालय तथा सीबीआई के रडार के बावजूद विदेश चला जाता है। घरेलू स्तर पर जमीन, सोना, बेनामी शेयर में इसे खपाया जाता है।
विदेशों में यह कम से कम पंद्रह देशों में जाता है, जिसे टैक्स हेवन कहा जाता है और अब तक इस धन का पता लगाना असंभव साबित हुआ है। टैक्स हेवन देशों का नाम पढ़ना भूगोल की प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता की तरह लगता हैें-एंडोरा, लिकेटेंस्टीन, गर्नजी, मोनाको, मॉरीशस, लाइबेरिया, सेशल्स, ब्रुनई, हांगकांग, मालदीव, कूक द्वीप, नाउरू, नीयू,मार्शल द्वीप, वनातु, एंगुइला, एंटीगुआ, बारबुडा, बहामास, बारबाडोस, बेलिज, बरमुडा, ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड, कैमेन द्वीप, ग्रेनाडा, मोंटसेराट, पनामा, सेंट विंसेंट और ग्रेनेडाइंस, सेंट किट्स और नेविस, तुर्क और कैकोस, अमेरिकी वर्जिन आइलैंड। हममें से कितने लोग इन जगहों को नक्शे पर ढूंढ सकते हैं? केंद्र सरकार समेत क्या किसी निकाय के पास कोई सुराग है कि हमारा पैसा कहां चला गया है?
उससे भी बड़ी समस्या यह है कि काला धन वास्तव में धन नहीं है। यह ऐसी आय है, जिस पर कर नहीं चुकाया गया है। इस कर की चोरी अतीत से हो रही है। धन और आय में अंतर महत्वपूर्ण हो गया है। धन की आपूर्ति को सिद्धांततः रिजर्व बैंक द्वारा नियंत्रित किया जाता है, जबकि जीएनपी (सकल राष्ट्रीय उत्पाद) प्रति वर्ष होने वाले आय का प्रवाह है, जो अर्थव्यवस्था द्वारा पैदा किया जाता है। धन के एक निश्चित भंडार और अर्थव्यवस्था के उत्पाद (जीएनपी) के बीच मध्यस्थता बाजार द्वारा विनिमय के जरिये किया जाता है।
विनिमय बाजार तंत्र की वस्तु है। वस्तु एवं सेवा का विनिमय पैसे के लिए किया जाता है और फिर पैसे का विनिमय वस्तु एवं सेवा के लिए किया जाता है। इसके पीछे एडम स्मिथ का अदृश्य हाथ है। यह गंभीर रूप से विनिमय के माध्यम पर निर्भर है, जिसकी कल्पना एडम स्मिथ ने की थी, लेकिन उन्होंने मोदी फेनोमिना की कल्पना नहीं की थी। स्टालिन की ही तरह मोदी ने गंभीर रूप से विनिमय की अर्थव्यवस्था को बाधित किया। स्टालिन ने जहां यह काम कीमतों में हेराफेरी कर किया था, वहीं मोदी ने तमाम बाजारों को असंतुलन में डालकर। हम जानते हैं कि स्टालिन की अर्थव्यवस्था का क्या हुआ।
प्रधानमंत्री ने एक ही झटके में बाजार से 86 फीसदी विनिमय के माध्यम यानी मुद्रा को हटाकर बाजार की विनिमय क्षमता को अपंग बना दिया। इससे सभी बाजारों में असंतुलन पैदा हो गया, जिससे वे जरूरत के मुताबिक वस्तु, सेवा और संसाधन आवंटित करने में असमर्थ हो गए। सबसे बुरा प्रभाव श्रम बाजार पर पड़ा। यदि आप अपनी इच्छा के मुताबिक आलू नहीं खरीद सकते, तो थोड़े से आलू खरीदकर काम चलाएंगे, लेकिन यदि आप अपने परिवार का पेट भरने के लिए अपना श्रम और समय नहीं बेच सकते, तो आपको अपने परिवार को भूखा रखना पड़ेगा।
वर्ष 2016 में पैसे की आपूर्ति भारतीय रुपये दर में 15972.5 अरब थी। यह करेंसी नोट तथा चालू एवं बचत खाते की कुल जमा रकम है। जाहिर है, बैंक में जमा राशि बहुत ज्यादा थी, जो बताती है कि मोदी ने बैंकिंग लेन-देन को क्यों इतना कम कर दिया। लेकिन विमुद्रीकरण के जरिये बाजार से भारी मात्रा में बड़े मूल्यवर्ग की मुद्रा को हटाया गया, और मुमकिन है भारी मात्रा में काले धन को मुद्रा के रूप में रखा गया हो। लेकिन जब काला धन छिपाने के लिए इतने टैक्स हैवन देश हैं, तो कोई देश में काला धन क्यों रखेगा? नोटबंदी के दौरान ही अनेक जगह आयकर के छापे पड़े और कथित रूप से भारी मात्रा में काले धन की बरामदगी हुई। इस व्यापक पैमाने पर यह कार्रवाई तो पहले भी हो सकती थी।
नोटबंदी के साथ इलेक्ट्रॉनिक विनिमय भी आया। यह करोड़ों मध्यवर्गीय और गरीब भारतीयों के साथ क्रूर मजाक है। क्या किसी ने भी सफाई कर्मचारी को क्रेडिट कार्ड या चेक से भुगतान करने की कोशिश की है?
और फिर बैंकों की बैलेंस शीट, कर्ज और ऋण कारोबार का क्या हुआ, यह रहस्य है। उनकी एफडीआई स्थिति क्या है, हमें नहीं मालूम। बैंक ग्राहकों को संतुष्ट तो नहीं ही कर पा रहे हैं, साथ ही, वे स्थायी तौर पर असंतुलन की स्थिति में हैं। इस तरह वे कब तक अपना अस्तित्व बनाए रख पाएंगे? दीर्घावधि में बैंकिंग व्यवस्था का नुकसान वर्तमान नीति का सबसे घातक परिणाम हो सकता है। श्रम और मुद्रा बाजार, दोनों के असंतुलित होने से अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति बेहद गंभीर है। ऐसी स्थिति में जीएसटी का क्या होगा, यह सबसे बड़ा सवाल है। यदि आर्थिक विकास दर कम होती है और देश का राजस्व घटता है, तो जीएसटी के लिए जरूरी समायोजन को संभालना मुश्किल होगा। यह देश की वित्तीय क्षमता का भारी नुकसान होगा। ऐसे में एकीकृत बाजार अर्थव्यवस्था की आशा बिखर सकती है। ऐसे में आगामी बजट से कितनी उम्मीद की जा सकती है!