नया साल चढ़ते ही फिर चुनावों का मौसम आ गया है। यह मौसम इतनी बार आता है कि देशवासियों ने स्वीकार कर लिया है कि लोहड़ी, वसंत, बरसात आएं न आएं, चुनावों का मौसम हर वर्ष जरूर आएगा। इस मौसम के आते ही हमारे राजनेताओं को प्रशासनिक समस्याओं को ठंडे बस्ते में डालकर राजनीतिक समस्याओं पर पूरा ध्यान देना पड़ता है।
प्रधानमंत्री मोदी कई बार कह चुके हैं कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने का समय आ गया है। उन्होंने यह भी कहा है कि अगर ऐसा होगा, तो जनता का पैसा बचेगा और राजनेताओं को भी उन चीजों पर ध्यान देने के लिए ज्यादा समय मिलेगा, जिनसे देश के आम आदमी के जीवन में असली परिवर्तन आ सकता है। लेकिन जब भी उन्होंने यह बात कही है, मेरे पत्रकार बंधुओं और बुद्धिजीवियों ने प्रधानमंत्री पर आरोप लगाया है कि इस सुझाव के पीछे भारत में लोकतंत्र को खत्म करने का गहरा षड्यंत्र है।
मेरी राय में भारत जैसे विशाल देश में, जहां किसी राज्य की सीमा पार करने पर भाषा बदल जाती है, अमेरिकी लोकतांत्रिक प्रणाली संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली से कहीं बेहतर होती। मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि संविधान बनाते समय हमने ब्रिटेन की नकल क्यों की। हमने अमेरिकी लोकतंत्र से प्रेरणा ली होती, तो यहां भी शुरू से तय होता कि नए राष्ट्रपति का कार्यकाल कितने वर्षों का होना चाहिए और जनवरी महीने की कौन-सी तिथि को नए राष्ट्रपति को शपथ ग्रहण करना होगा। वहां किसी राष्ट्रपति की लोकप्रियता जितनी भी हो, उसे दो कार्यकालों से अधिक नहीं मिलता। ऐसा होने से वंशवाद और तानाशाही के अवसर कम हो जाते हैं।
यहां पिछले सत्तर वर्षों में लोकतंत्र को हमने इतना कमजोर किया है कि तकरीबन हर राज्य में रजवाड़े पैदा हो गए हैं। पंचायतों तक में वंशवाद फैल चुका है। जो लोग दिल से देश की सेवा करना चाहते हैं, उनको मौका न देकर उन्हें राजनीति में आने के मौके दिए जाते हैं, जिनका मकसद सिर्फ अपने परिवार की सेवा करना है। असली लोकतंत्र जिन देशों में है, वहां सरकारी सेवाएं इतनी अच्छी होती हैं कि अमीरों और गरीबों के बच्चे एक ही स्कूल में दिखते हैं। उसी स्कूल में राजनेताओं और आला अधिकारियों के बच्चे भी दिखते हैं। सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य सार्वजनिक सेवाओं में भी यही हाल दिखता है।
भारत में ऐसा परिवर्तन कोई प्रधानमंत्री लाना भी चाहे, तो नहीं ला सकता, क्योंकि उसके कार्यकाल का आधे से ज्यादा समय चुनावों में लग जाता है। चुनाव जीतना बहुत जरूरी होता है, क्योंकि एक भी चुनाव हार गया, तो चर्चा शुरू हो जाती है कि सरकार की लोकप्रियता कम हो गई है और वह अगला लोकसभा चुनाव नहीं जीत सकती। वर्ष 2015 में हमने बिहार विधानसभा चुनाव को 2019 के लोकसभा चुनाव का रिहर्सल कहा था, और अब उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के बारे में भी यही बात कही जा रही है। इस बार प्रधानमंत्री पर दबाव और ज्यादा है, क्योंकि उनका आधे से ज्यादा कार्यकाल बीत चुका है। सो मार्च तक मोदी चुनाव प्रचार में ज्यादा और सरकार चलाने में कम ध्यान देंगे। नुकसान होगा, तो देश का होगा।
मैं लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की प्रधानमंत्री मोदी की पेशकश का समर्थन करती हूं। मेरी जानकारी में विपक्ष के कई राजनेता चुपके से इस सुझाव का समर्थन करते हैं। वे जानते हैं कि एक साथ चुनाव कराने की परंपरा पहले लागू हो गई होती, तो देश इतना बेहाल न होता।