अनेक टिप्पणीकारों का मानना है कि वित्त मंत्री अरुण जेटली का पहला बजट पिछली यूपीए सरकार के बजटों से कुछ ज्यादा अलग नहीं है। मशहूर आर्थिक विश्लेषक स्वामीनाथन अय्यर के मुताबिक जेटली के बजट को देखकर लगता है, मानो पी चिदंबरम के बजट को ही रंग-रोगन कर तैयार किया गया हो। इसकी तस्दीक इस बात से होती है कि कुछ महीने पहले अंतरिम बजट में पेश किए गए राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को जेटली ने भी जस का तस रखा है।
अंतरिम बजट में पी चिदंबरम ने 2014-15 के लिए राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.1 फीसदी तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा था। राजस्व वृद्धि के लक्ष्य को भी जेटली ने अंतरिम बजट के समान ही रखा है। जबकि अंतरिम बजट को लेकर भाजपा का रुख बेहद आलोचनात्मक था। तब भाजपा ने कहा था कि अंतरिम बजट में निर्धारित लक्ष्य न केवल अव्यवहारिक हैं, बल्कि आशावादी आंकड़ा तय कर यूपीए ने एनडीए सरकार पर बोझ भी बढ़ाया है। मगर अब अरुण जेटली ने 2013-14 और 2014-15 के लिए यूपीए के ज्यादातर अनुमानों को स्वीकार किया है।
इसके अलावा एनडीए सरकार ने यूपीए की ज्यादातर सामाजिक कल्याण की योजनाओं को भी इक्का-दुक्का बदलाव के साथ अपनाया है। शायद इसी वजह से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को कहना पड़ा, 'यह हमारे बजट की नकल है।'
बजट पेश करने के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली से जब लेखक ने इसकी वजह पूछी, तो उन्होंने बड़ी चतुराई से जवाब देते हुए कहा कि खर्च पर नियंत्रण करना और राजकोषीय सुधार का लक्ष्य निर्धारित करना एक अच्छी बात है।
इसी वजह से जेटली ने हूबहू उन कठोर लक्ष्यों को अपनाने का फैसला किया, जो पिछली सरकार ने निर्धारित किए थे। जेटली ने यह भी स्वीकार किया कि उन्होंने पिछली सरकार की सामाजिक क्षेत्र की कई योजनाओं की कमियों को दूर करते हुए उन्हें जारी रखने का निर्णय लिया है, क्योंकि गरीबों को इन नीतियों की बहुत जरूरत है। जेटली ने यह भी माना कि जिस देश में गरीबों की तादाद इतनी ज्यादा हो, वहां पूरी तरह बाजार आधारित आर्थिक दर्शन काम नहीं कर सकता। जब उनसे पूछा गया कि क्या यह समाजवाद की भाजपा की अपनी अवधारणा है, तो उन्होंने यह स्वीकारा कि समावेशी नीतियों की देश को जबर्दस्त जरूरत है। एक बार फिर से उनकी भाषा यूपीए सरकार जैसी ही दिख रही थी।
मेरे ख्याल से इसके पीछे कुछ हद तक नए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोच काम कर रही है। अगर पिछले कुछ हफ्तों में दिए गए मोदी के बयानों पर गौर करें, तो उन्होंने साफ तौर पर कहा है कि सरकार का लक्ष्य गरीबों का कल्याण है। उनका यह बयान अपने आप में समाजवादी है। दरअसल यूपीए के सामाजिक क्षेत्र के कई कार्यक्रमों को एनडीए द्वारा अपनाने की वजह यह है कि कांग्रेस पर ऐतिहासिक तौर पर गरीबों के कल्याण पर ध्यान देने वाली पार्टी का जो लेबल चिपका है, मोदी उसे हटाना चाहते हैं।
नेहरू से इंदिरा गांधी, और फिर सोनिया गांधी तक कांग्रेस ने अपनी एक कल्याणकारी छवि बनाने में कामयाबी पाई है। मोदी अपने लिए भी आहिस्ता-आहिस्ता ऐसी ही छवि चाहते हैं। संभव है कि सामाजिक क्षेत्र की यूपीए की नीतियों को अपनाने के पीछे एनडीए की सोची-समझी रणनीति हो।
बजट में एक दूसरा संदेश भी छिपा है। मोदी बखूबी जानते हैं कि बड़े उद्योगपतियों से उनकी नजदीकी की वजह से लोगों की नजर में उनकी छवि बड़े उद्योग समूहों के समर्थक की है। शायद इसी वजह से बजट में इस वर्ग को कोई खास सहूलियतें नहीं दी गई हैं। इसके उलट लघु और मध्यम दर्जे के उद्योगों की मदद हेतु 10,000 हजार करोड़ रुपये के फंड बनाने की घोषणा की गई है। इससे संघ परिवार को भी खुश होगा, क्योंकि उसकी हमेशा से चाह रही है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ समझे जाने वाले छोटे उद्यमों पर भाजपा फोकस करे।
आश्चर्य की बात है कि बजट में आम आदमी के लिए कड़वी दवा जैसी कोई चीज नहीं है। इसकी एक वजह यह है कि रेल किराये, चीनी और पेट्रोलियम उत्पादों के मूल्य में बढ़ोतरी करके बजट से पहले ही यह खुराक दी जा चुकी है। इसलिए वित्त मंत्री ने आयकर में छूट की सीमा को दो लाख से बढ़ाकर ढाई लाख रुपये सालाना करने और बचत पर कुछ अतिरिक्त कर राहत देने का फैसला किया । मतलब यह कि 30,000 रुपये तक मासिक वेतन पाने वालों को आयकर से छूट होगी।
इसके अलावा नए वस्तु और सेवा कर (जीएसटी) का मुद्दा भी है, जिस पर काफी समय से चर्चा तो हो रही है, मगर वित्त मंत्री ने बजट में इस पर कुछ खास नहीं कहा। दरअसल जीएसटी के लागू होने से न केवल करों का आधार व्यापक होगा और रियल एस्टेट व विनिर्माण जैसे क्षेत्र अप्रत्यक्ष कर के दायरे में आएंगे, साथ ही, काले धन पर अंकुश लगाने में भी मदद मिलेगी। जेटली ने लेखक को बताया कि जीएसटी को लागू करने के मामले में उन्होंने राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ मिलकर सारी तैयारियां पूरी कर ली हैं। केवल कुछ मुद्दों को सुलझाना बाकी है।
दरअसल पूरे बजट में वित्त मंत्री सुरक्षात्मक रवैया अपनाते दिखे, क्योंकि जैसा कि वह खुद स्वीकारते हैं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और मानसून कुछ ऐसी चीजें हैं, जो उनके नियंत्रण से बाहर हैं। इन्फ्रास्ट्रक्चर और मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र में जान फूंकने का वायदा कर वह विकास का जोखिम उठा रहे हैं। वह उम्मीद कर रहे हैं कि इससे आर्थिक विकास दर और रोजगार में बढ़ोतरी होगी और समद्धि आएगी। दरअसल देश के विशाल आकार और जटिलता को देखते हुए बजट एक जुए की तरह होता है, जिसमें नतीजों को लेकर आश्वस्त होने की गुंजाइश कम ही होती है।