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इस मुलाकात का मतलब क्या है

Thu, 09 Feb 2017 06:26 PM IST
अवधेश कुमार
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अवधेश कुमार
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हार्दिक पटेल और उद्धव ठाकरे के बीच वैसे कोई समानता नहीं  है । हार्दिक की  पहचान पटेल समुदाय के लिए आरक्षण की मांग से किए गए आंदोलन से जुड़ी है और उद्धव उस शिवसेना के प्रमुख हैं, जिसने 'महाराष्ट्र मराठियों के लिए' नारे से अपनी राजनीति शुरू की थी और जो बाद में हिंदुत्व से जुड़ गई। पर मुंबई में जिस तरह दोनों ने हाथ मिलाया तथा एक दूसरे को दोस्त करार दिया, उसके राजनीतिक निहितार्थ तलाशने की जरूरत है। उद्धव के अनुसार, गुजरात के विधानसभा चुनाव में हार्दिक पटेल उनके चेहरा होंगे। हालांकि शिवसेना गुजरात में कोई राजनीतिक ताकत नहीं है, पर हार्दिक पटेल को प्रभावशाली पटेलों के एक वर्ग का समर्थन है। इस समय शिवसेना भाजपा के खिलाफ हो चुकी है तथा हार्दिक अपने ऊपर कार्रवाई के बाद से उसके खिलाफ है ही। यानी भाजपा के दो विरोधियों ने एक दूसरे से हाथ मिलाया है। अगर यह सामान्य मुलाकात होती, तो इसमें पत्रकार वार्ता की कोई जरूरत नहीं थी।
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इस समय इन दोनों की मुलाकात का तात्कालिक महत्व वृहन्मुंबई महानगरपालिका चुनाव के संदर्भ में ज्यादा है। मुंबई में रहने वाले गुजराती मतदाताओं में बड़ी संख्या पाटीदार समाज यानी पटेलों की है। शिवसेना ने 11 गुजरातियों को टिकट देकर उस समुदाय को अपने साथ लाने की रणनीति अपनाई है। जबकि मुंबई में रहने वाला आम गुजराती भाजपा समर्थक माना जाता है। हार्दिक की यात्रा केवल मुलाकात तक सीमित नहीं रही। गोरेगांव में पटेल नवनिर्माण सेना की ओर से रोड शो का आयोजन हुआ, जिसमें हार्दिक पटेल शामिल हुए।

हार्दिक पटेल भाजपा से  बदला लेना चाहते हैं। उन्हें पता है कि अकेले पाटीदार समुदाय के आरक्षण के नाम पर भाजपा को सत्ता से खदेड़ना संभव नहीं। गुजरात में दूसरी ऐसी कोई शक्ति नहीं है, जिससे वह हाथ मिला सकें। गौरतलब है कि हार्दिक पटेल का परिवार भाजपाई रहा है। गुजरातियों पर से भाजपा के प्रभाव को खत्म करने के लिए हार्दिक संभवतः उसी प्रकार की विचारधारा की कोई शक्ति खड़ी करना चाहते हैं। हार्दिक को गुजरात को अपने संघर्ष का मैदान बनाना है। संभवतः इसलिए उन्होंने शिवसेना का चुनाव किया है। अपने संगठन को विस्तार देने के लिए उन्होंने यह बयान भी दिया कि वह दलितों तथा पिछड़ों के विरोधी नहीं हैं। ऐसे में, लगता है कि इस मुलाकात के पीछे तात्कालिक रणनीति नहीं, कुछ दूरगामी सोच भी है।
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पर यह दोस्ती क्या भाजपा को शिकस्त देने में सफल होगी? शिवसेना भले भाजपा को कोस रही है, पर वह प्रदेश सरकार में शामिल है। इस कारण उसके भाजपा विरोध में वह जान नहीं है। शिवसेना में भी सरकार से अलग होने को लेकर दो प्रकार के विचार हैं। एक पक्ष तुरंत पार्टी को सरकार से बाहर देखना चाहता है, दूसरा वर्ग महानगरपालिकाओं के चुनाव के बाद इस बारे में फैसला करने का इच्छुक है। इससे पहले कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका का चुनाव भाजपा-शिवसेना ने अलग-अलग लड़ा। पर परिणाम ऐसे आए कि दोनों को साथ आना पड़ा। विधानसभा चुनाव भी दोनों ने अलग-अलग लड़ा था।। किंतु राजनीतिक परिस्थितियों के कारण शिवसेना को सरकार में शामिल होने को विवश होना पड़ा। इस तरह भाजपा को लेकर शिवसेना की नीति आगे-पीछे की रही है। इस समय हार्दिक की राजनीति के बारे में कुछ कह पाना कठिन है। इसलिए शिवसेना प्रमुख से उनकी मुलाकात और दोनों की रणनीति के बारे में कुछ भी दावा नहीं किया जा सकता।
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