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नजरबंदी असली या दिखावा

Thu, 09 Feb 2017 06:22 PM IST
मरिआना बाबर
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मरिआना बाबर
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जमात उद दावा के सरगना हाफिज मोहम्मद सईद को नजरबंद रखने की घोषणा नवाज शरीफ सरकार या उनके मंत्रियों ने नहीं, बल्कि सेना के प्रवक्ता ने की, जिसने कहा कि 'नीतिगत फैसले' के रूप में नजरबंदी की घोषणा की गई है। सवाल उठने लगे कि दो तिहाई बहुमत वाली लोकतांत्रिक ढंग से चुनी शरीफ सरकार ने इस 'नीतिगत फैसले' की घोषणा की पहल क्यों नहीं की, जिसका सभी वर्गों में व्यापक स्वागत किया गया है।
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यह घोषणा प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और सैन्य प्रमुख जनरल बाजवा के बीच हुई एक बैठक के बाद की गई। सवाल यह भी है कि थाने में एफआईआर क्यों नहीं दर्ज करवाई गई, ताकि एक वैधानिक मामला बनता, जिसमें स्पष्ट रूप से इस नजरबंदी का कारण बताया जाता। ज्यादातर लोग हैरान हैं कि यह फैसला अब क्यों लिया गया और क्या यह नजरबंदी कायम रहेगी या अतीत की तरह अदालत मुंबई हमले के इस कथित मास्टरमाइंड को फिर से खुला घूमने की छूट दे देगी? संयुक्त राष्ट्र ने जमात उद दावा को प्रतिबंधित संगठनों की सूची में डाल रखा है और पाकिस्तान को उसके खिलाफ कार्रवाई करने और पाकिस्तान स्थित उसकी संपत्ति जब्त करने के लिए बाध्य किया है। हालांकि पाकिस्तान सरकार द्वारा सईद को नजरबंद रखने की कार्रवाई और जाहिरा तौर पर उसकी संपत्ति को जब्त करने का मामला ज्यादा दिनों तक नहीं टिक सकेगा।

मुंबई आतंकी घटना की सुनवाई जिस पाकिस्तानी अदालत में चल रही है, उसकी गति बहुत सुस्त है, क्योंकि भारत और पाकिस्तान, दोनों मुल्कों के आपराधिक कानून प्रक्रिया को देखते हुए एक देश में रहकर दूसरे देश में आपराधिक घटनाओं को अंजाम देने वाले अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई मुश्किल होती है। हालांकि बाद में पाकिस्तान के गृह मंत्री ने घोषणा की कि हाफिज सईद और उसके चार साथियों की गतिविधियों पर नजर रखी जाएगी और फलाही-इंसानियत फाउंडेशन की भी जांच की जाएगी, जो जमात उद दावा से संबद्ध है।
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नवंबर, 2008 में मुंबई में हुए भीषण आतंकी हमले के पीछे जमात-उद-दावा के हाथ होने का आरोप लगा था, जिसमें 150 से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों घायल हुए थे। जमात उद दावा के आतंकी जकी उर रहमान पर इस आतंकी घटना के मास्टरमाइंड होने का आरोप लगा था। कुछ महीनों बाद 2009 में लाहौर हाई कोर्ट ने सबूतों के अभाव में हाफिज सईद को जमानत दे दी थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी हाफिज सईद और उसके संगठन को क्लीन चिट दे दी। अप्रैल, 2015 में मुंबई हमले के दूसरे कथित मास्टरमाइंड लखवी को भी लाहौर हाई कोर्ट के फैसले पर अदियाला जेल से रिहा कर दिया गया।

इसमें कोई रहस्य नहीं है कि सईद और उसके संगठनों पर प्रतिबंध लगाया गया और फिर वह सुरक्षा प्रतिष्ठानों से संजीवनी पाकर एक नए नाम के साथ फिर से संगठित हुआ, क्योंकि तर्क दिया गया कि जमात उद दावा पाकिस्तान के भीतर कोई नुकसान नहीं पहुंचाता है, बल्कि उसकी गतिविधियां कश्मीर के लोगों की अधिकारों पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश हैं। कश्मीरियों के अधिकारों के लिए भारत के खिलाफ आतंकवाद का इस्तेमाल अस्वीकार्य है। कोई भी संप्रभु और लोकतांत्रिक मुल्क अपनी धरती से ऐसी गतिविधियों की इजाजत नहीं दे सकता। वर्षों से यह देखा गया है कि कैसे पाकिस्तान एक अछूत मुल्क बन गया है, क्योंकि अपनी धरती पर आतंकवाद को रोकने में अक्षमता को लेकर दुनिया भर में पाकिस्तान की आलोचना होती है।

कुछ ही हफ्ते पहले हाफिज सईद ने इस्लामाबाद का दौरा किया था और वहां उसने मीडिया को संबोधित कर जमात उद दावा के पांच फरवरी की योजना के बारे में बताया। पांच फरवरी को ही पाकिस्तान ने कश्मीर के लोगों के साथ अपनी एकजुटता का इजहार किया था। लेकिन कश्मीरियों के समर्थन का मतलब यह नहीं है कि किसी भी पाकिस्तानी संगठन को भारत में आतंकवाद फैलाने का अधिकार मिल जाता है।

यह सवाल भी उठाया जा रहा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने 1267 वें प्रस्ताव के जरिये पहले से ही हाफिज सईद और उसके प्रतिबंध पर प्रतिबंध लगा रखा है, तो पाकिस्तान की सरकार इतने दिनों बाद अब क्यों कदम उठा रही है। क्या पाकिस्तान सरकार ने डोनाल्ड ट्रंप के रुख को भांपकर, जो अपने नागिरकों को आतंकवाद की इजाजत देने के कारण पाकिस्तान के खिलाफ कदम उठा सकते हैं, यह कदम उठाया है? हर कोई मानता है कि ट्रंप प्रशासन ओबामा से अलग है और इस हफ्ते हमने देखा कि पठानकोट आतंकी हमले के कथित मास्टरमाइंड मसूद अजहर के खिलाफ प्रतिबंध लगाने के लिए अमेरिका के संयुक्त राष्ट्र में जाने का ब्रिटेन और फ्रांस ने भी समर्थन किया है। यह दुखद है कि चीन ने अमेरिकी कदम का विरोध किया, जिसके कारण इसे छह महीने के  लिए स्थगित कर दिया गया है।

डॉन में स्तंभकार सीरिल अल्मेडा ने लिखा है कि सईद की नजरबंदी कुछ ऐसी है, जिसे सरकार अपने तक सीमित रखना चाहती है, नागरिकों से साझा नहीं करना चाहती।  उन्होंने इसे 'गुप्त बातचीत' कहा है और हैरानी जताई है कि क्या यह झूठी शुरुआत है या वाकई सरकार जेहादी ढांचे को ध्वस्त करना चाहती है। इसका जवाब यही हो सकता है कि सरकार अपनी ताकत दिखाए, और जमात उद दावा या किसी भी अन्य जेहादी संगठन को आतंकवाद की इजाजत न दे। आतंकवाद को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

सुरक्षा मामलों के विश्लेषक जाहिद हुसैन कहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सूची में प्रतिबंधित ऐसे संगठनों के खिलाफ सरकार द्वारा अधूरे मन से की गई कार्रवाई इस बात का संकेत है कि सरकार अब भी उन पर प्रतिबंध नहीं लगाना चाहती। उम्मीद की जा सकती है कि कम से कम 2017 में सुरक्षा प्रतिष्ठान जेहादियों पर गंभीरता से प्रतिबंध लगाएगा और जिन्ना के सपनों की कुछ झलक वापस लाएगा।
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