जब से केंद्र सरकार ने विधि आयोग को समान नागरिक संहिता पर विचार कर अपनी रिपोर्ट देने को कहा है, इस विषय पर राष्ट्रीय बहस शुरू हो गई है। इस पूरी बहस के पीछे संविधान का अनुच्छेद 44 है, जिसमें स्पष्ट लिखा है कि राज्य अपने नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता बनाने का प्रयास करेगा। परंतु यह अनुच्छेद राज्य के नीति निर्देशक तत्व का हिस्सा है, जो अदालत द्वारा लागू नहीं किया जा सकता। इसी कारण अनेक मामलों में सर्वोच्च अदालत ने दुख तो व्यक्त किया कि अभी तक अनुच्छेद 44 पर अमल नहीं हुआ है, किंतु उसने अपनी सीमाओं को देखते हुए कभी इस बारे में स्पष्ट निर्देश नहीं दिया।
समान आचार संहिता के आलोचकों का पक्ष है कि इसकी आड़ में सरकार हिंदू कानूनों को सभी संप्रदायों पर थोपना चाहती है। जबकि इसके समर्थकों का मानना है कि इससे कई विसंगतियां दूर होंगी और विशेषकर कुछ संप्रदायों की महिलाओं के साथ होने वाली ज्यादती पर रोक लगेगी। सायरा बानो ने तीन तलाक की प्रथा खत्म करने की एक याचिका सर्वोच्च न्यायालय में दायर की है, जिस पर सितंबर में विचार होना है। इस विषय पर सबसे पहला विवाद 1985 में हुआ था, जब शाह बानो मामले में सर्वोच्च अदालत ने अपराध विधान प्रक्रिया की धारा 125 के अंतर्गत शाह बानो को 500 रुपये प्रति माह भरण-पोषण के लिए देने का निर्देश दिया था।
एक गलतफहमी यह है कि निजी कानून (पर्सनल लॉ) धर्म का अभिन्न हिस्सा है। जबकि ऐसा नहीं है। निजी कानूनों में मुख्य रूप से विवाह, उत्तराधिकार, संरक्षण, गोद लेना तथा भरण-पोषण शामिल है। इन चीजों से किसी धर्म का मूल चरित्र नहीं बदलता। जब 80 प्रतिशत नागरिक एक कानून के तहत आ गए हैं, तो सबके लिए एक समान नागरिक संहिता न लाने का कोई औचित्य नहीं है। यह मामला अदालत में इसलिए आया, क्योंकि एक शादीशुदा हिंदू ने मुस्लिम बनकर दूसरी शादी कर ली। इसमें भी सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार को सलाह दी थी कि विधि आयोग को यह विषय सौंपा जाए, जो राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के साथ विचार-विमर्श कर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार करे। परंतु इस पर अमल नहीं हुआ।
दरअसल 18 वें विधि आयोग ने दो महत्वपूर्ण सिफारिशें की थीं, जो समान नागरिक संहिता की अवधारणा पर आधारित नहीं थीं, किंतु इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति थी। इसमें 1954 के विशेष विवाह अधिनियम में संशोधन कर भेदभावपूर्ण प्रावधानों को खत्म करना तथा सभी विवाहों का पंजीकरण अनिवार्य करना शामिल था।
अब यह मसला इतना तूल पकड़ता जा रहा है, क्योंकि मुस्लिम महिलाओं ने 50 हजार हस्ताक्षर इकट्ठा कर तीन तलाक की प्रथा को समाप्त करने की मांग की है। इससे मुस्लिम समाज का बदलता चेहरा भी सामने आता है। विधि आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति वीएस चौहान ने कई कानूनों का हवाला देकर स्पष्ट किया है कि कुछ कानून ऐसे हैं, जो सभी समुदायों पर लागू होते हैं और धर्म उनमें आड़े नहीं आता। बेशक समान नागरिक संहिता के लागू होने से कई विसंगतियां दूर होंगी, किंतु इसका ख्याल रखना होगा कि अल्पसंख्यकों के मन में इससे कोई भय पैदा नहीं हो। अल्पसंख्यकों की मानसिकता को भी समझने की जरूरत है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदू भी समान नागरिक संहिता का विरोध करते हैं। इसके अलावा हमारा संविधान सभी को अपने मन से किसी भी धर्म को मानने की आजादी देता है। इसलिए अल्पसंख्यकों को विश्वास में लेकर ही यह किया जाना चाहिए।