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निराली है बिल की माया

Tue, 04 Aug 2015 08:13 PM IST
देवेंद्र सिंह सिसौदिया
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बिल शब्द ही ऐसा है, जो हर किसी को परेशान कर देता है। फिर चाहे वह बिल बिजली का हो, पानी का, या फिर किसी कानून का। बिल के नाम कई आंदोलन हुए और राजनीतिक रोटियां सेंकी गईं। बिल को आधा करने के आश्वासन पर तो कुछ नेता चुनावी वैतरणी पार कर सत्ता तक पहुंच गए। और जब सत्ता मिल गई, तो यू टर्न लेने में भी उन्होंने देर नहीं की। उन्होंने चुनाव के पूर्व किए वायदों में से कुछ प्रतिशत ही पूरा करने की बात कही। हालांकि यह अलग बात है कि जनता ने उन्हें लगभग शत-प्रतिशत अंक देकर सत्तासीन बनाया है।
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बिल से कौन परेशान नहीं है? अपनी ही सरकार का बिल फाड़कर रद्दी की टोकरी में डालने जैसी घटना भी हुई है। बिल से पक्ष हो या विपक्ष, दोनों परेशान हैं। शायद इसलिए अध्यादेश का सहारा भी लिया जाता है। बिल के विरोध का सहारा लेते हुए अपनी जमीन को बचाने के लिए हाल ही में युवराज ने दिल्ली में एक रैली कर डाली। उस रैली में हजारों किसान मौजूद थे। हालांकि जो किसानों के नाम राजनीतिक रोटी सेंकने और युवराज की आंखों का तारा बन अपनी जमीन मजबूत करने का प्रयास कर रहे थे, उनके कुर्ते-पजामे का बिल एक छोटे किसान को मिले मुआवजे से अधिक था। दिलचस्प है कि विदेशों में जमा काला धन तो नहीं आया, मगर विदेशों में जमा काले धन पर अंकुश लगाने के लिए अहम माने जा रहे अघोषित विदेशी आय और संपत्ति बिल लोकसभा में जरूर आ गया।

बहरहाल, सरकार और सरकारी कर्मचारी का बिल से चोली-दामन का साथ है। वेतन बिल, मेडिकल बिल, यात्रा भत्ता बिल जैसे अनेकों ऐसे बिल होते हैं, जिन्हें स्वीकृत कराने के नाम पर लाखों की बंदर-बांट होती है। वर्ष के अंत में तो आवंटित राशि खपाने के नाम पर सैकड़ों बिल स्वीकृत हो जाते हैं। दीगर यह भी है कि हर बिल की अपनी उम्र होती है। कुछ बिल दशकों तक लंबित रहते हैं, तो सांसदों के वेतन-भत्ते बढ़ाने वाले बिल की उम्र सबसे कम होती है। बिल की माया तो निराली होती है।
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