यह अद्भुत है कि एनडीए सरकार ने विवादास्पद भूमि विधेयक पर झुकते हुए कांग्रेस को एक बड़ी रियायत दी और यूपीए के 2013 के विधेयक को ही लगभग स्वीकार कर लिया है, मगर संसद के कामकाज को सुचारु रूप से चलाने के लिए कांग्रेस को मना पाने में वह विफल रही है। इसके बजाय सदन की कार्यवाही में बाधा पहुंचाने वाले 25 कांग्रेसी सांसदों के निलंबन से विपक्ष को एकजुट होने का मौका मिला है, जिससे सत्तारूढ़ दल की समस्याएं जटिल ही हुई हैं। कांग्रेसी सांसदों के निलंबन से पहले विपक्ष बिखरा हुआ था और कांग्रेस को छोड़कर, ज्यादातर दूसरे विपक्षी दल चाहते थे कि दोनों सदनों का कामकाज सुचारू रूप से चले। मुलायम सिंह यादव ने लोकसभा अध्यक्ष से निलंबन को रद्द करने की मांग की है। नौ अन्य दलों के साथ समाजवादी पार्टी ने भी निलंबन के खिलाफ कांग्रेस के प्रदर्शन का समर्थन किया है।
विपक्षी दल संसद में उसी तरह जिद पर अड़े रहना चाहते हैं, जैसे भाजपा ने यूपीए-दो के शासन के दौरान किया था। उस समय भाजपा यूपीए के कई नेताओं का इस्तीफा लेने में कामयाब रही थी और विपक्ष के दबाव में अशोक चव्हाण (आदर्श घोटाला), ए. राजा, कणिमोझी (टू जी घोटाला), शशि थरूर, पवन बंसल और अश्वनी कुमार ने आरोप पत्र दाखिल होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था। टू जी घोटाले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय कमेटी (जेपीसी) के गठन की मांग को लेकर वर्ष 2010 के शीत सत्र में संसद का कामकाज पूरी तरह बाधित रहा। अंततः सरकार को बजट सत्र की शुरुआत में विपक्ष की मांग मानकर जेपीसी का गठन करना पड़ा।
अतीत में कई मौकों पर विपक्ष और सत्ता पक्ष भिड़ते रहे हैं, जिससे संसद का सत्र बाधित होता रहा है। यही नहीं, सांसदों को निलंबित करने के भी उदाहरण हैं, हालांकि ऐसा कम ही हुआ है, जब इतने ज्यादा सांसदों को निलंबित किया गया। लोकसभा अध्यक्षों ने बेहद तनावपूर्ण स्थितियों में भी ऐसा अतिवादी कदम नहीं उठाया। वर्ष 1989 में बोफोर्स तोप सौदों में कथित घोटाले के खिलाफ सरकार द्वारा कार्रवाई न करने के विरोध में विपक्षी सांसदों ने सामूहिक रूप से चुनाव से कुछ हफ्ते पहले इस्तीफा दे दिया था। और राजीव गांधी के नेतृत्व में 415 सांसदों की बहुमत की सरकार 1989 के चुनाव में हार गई और वीपी सिंह के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हुआ। उसके बाद कांग्रेस अपने दम पर कभी बहुमत हासिल नहीं कर पाई।
मात्र 44 सीटों तक सिमट चुकी कांग्रेस के लिए ललित मोदी प्रकरण और व्यापम घोटाला ईश्वर के उपहार की तरह है और 'पहले इस्तीफा, फिर बहस' की जिद ने पार्टी में नई जान फूंकी है। यह ठीक उसी तरह है, जैसा भाजपा ने यूपीए शासन के अंतिम वर्षों में कांग्रेस के साथ किया था। कांग्रेस के लिए दुखद यह है कि संसद को बाधित करने का दोष भाजपा उस पर मढ़ रही है और उच्च नैतिकता का हवाला देते हुए कह रही है कि वह चर्चा के लिए तैयार है, जबकि विपक्ष में रहने के दौरान उसने अलग रुख अपनाया था और यूपीए-दो के दौरान उसने इस्तीफे मांगते हुए दोनों सदनों को बाधित किया था।
हालांकि संसद के कामकाज में बाधा नई बात नहीं है। तथ्य यह है कि शोरगुल तो संसदीय कामकाज की भाषा का हिस्सा बनता जा रहा है। दुखद यह है कि बहस में कटौती हो रही है और कानून पारित नहीं हो रहा है, जो संसद का मुख्य काम है। आखिरकार संसद सड़कों की राजनीति का विकल्प नहीं है। दुखद यह है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव के स्तर में वृद्धि हुई है। दोनों पक्षों के बीच कड़वाहट बढ़ी है, इसलिए भाजपा एवं कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के बीच अविश्वास भी बढ़ा है। लोकसभा अध्यक्ष ने कई बार सर्वदलीय बैठक बुलाई, लेकिन उसका लाभ नहीं हुआ। दोनों पक्षों के बीच वास्तविक संवाद टूट गया है और ऐसे नेताओं का अभाव है, जो दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता कर सके, और जिसका सभी दलों में सम्मान हो।
संसद को चलाने की मुख्य जिम्मेदारी सत्तापक्ष की है और उसे विपक्ष को अपने साथ लेकर चलना होता है, कभी समझा-बुझाकर, कभी फुसलाकर, तो कभी थकाकर और कभी नर्म पड़कर। रास्ता निकालने के लिए लेन-देन की जरूरत होती है। यह मान्य तथ्य है कि तमाम मतभेदों के बावजूद सत्ता पक्ष की तरह विपक्ष की भी अहम भूमिका होती है, क्योंकि वही सरकार को जवाबदेह बनाए रखता है।
लेकिन अब तक भाजपा विपक्ष तक प्रभावी पहुंच बनाने में विफल रही है और यह केवल उसके कमजोर संसदीय प्रबंधन के कारण हुआ है। मसलन, सरकार ने भूमि अधिग्रहण विधेयक पर नरम रुख अपनाया, लेकिन सरकार के प्रबंधक कांग्रेस को मनाने के लिए इसे भुना नहीं पाए। यह सर्वविदित है कि सरकार ने मूलतः राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय किसान संघ जैसे संगठनों के आंतरिक दबाव के कारण अपना रुख नरम किया है। लेकिन इसकी वजह यह भी है कि विधेयक को पारित कराने के लिए सरकार के पास राज्यसभा में जरूरी संख्याबल नहीं है और संयुक्त सत्र बुलाकर इसे पारित करवाना उचित नहीं माना जाता, इसलिए राज्यों को अपना विधेयक पारित करवाने का रास्ता दिया गया।
इन तमाम मुश्किलों को देखते हुए समझदारी से काम लिया गया और सरकार किसानों की 'सहमति' और सामाजिक प्रभाव के आकलन संबंधी प्रावधानों को रहने देने की विपक्ष की जिद पर सहमत हो गई। पर असली बात यह है कि भाजपा इस फैसले का लाभ नहीं उठा पाई। और अब सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एवं उनके तमाम सहयोगियों ने संसद भवन के गेट पर प्रदर्शन किया। ऐसे में सबकी नजरें प्रधानमंत्री पर लगी हैं कि क्या देश का मुखिया होने के नाते वह विपक्ष को मनाने के लिए स्वयं कोई पहल करेंगे और न केवल अपनी चुप्पी तोड़ेंगे, बल्कि संसदीय गतिरोध को भी खत्म करेंगे, जो कि हमारे संसदीय लोकतंत्र के भविष्य के लिए शुभ नहीं है।