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और क्या सुबूत चाहिए?

तवलीन सिंह Published by: Raman Singh Updated Sun, 24 Feb 2019 07:37 PM IST
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तवलीन सिंह

यह सोचकर फिर मेरी नींद उड़ गई कि सरहद पर बहा वह खून मेरी नींद के लिए था। यह शब्द सोशल मीडिया पर 14 फरवरी की उस खून और दर्द भरी शाम से वायरल रहे हैं। मेरे कानों में ये शब्द तब जोर-जोर से गूंजने लगे, जब पुलवामा हमले के दो दिन बाद मैं दिल्ली की एक आलीशान कोठी के खूबसूरत बाग में एक दोस्त की बेटी की शादी में गई थी। उस शादी में कई ऐसे लोग आमंत्रित थे, जो इस देश की किस्मत के फैसले करते हैं। वहां मंत्री और पूर्व मंत्री थे, केंद्र सरकार के वर्तमान और पूर्व अधिकारी, जाने-माने पत्रकार और कई ऐसे विशेषज्ञ थे, जिनका विषय भारत की सुरक्षा है।



पुलवामा में शहीद हुए हमारे चालीस वीरों का दर्द सबको इतना सता रहा था कि किसी दूसरे विषय पर बात करना कठिन था। एक दूसरे से हम सब पूछते रहे कि अब क्या होगा। पाकिस्तान को किस तरह का जवाब दिया जाएगा। इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था, लेकिन इस पर सहमति जरूर थी कि जवाब देना अनिवार्य है, वर्ना पाकिस्तान का यह कायर युद्ध कभी बंद नहीं होने वाला है। इस देश का आम आदमी भी यही सोच रहा है। उसका सुबूत पिछले सप्ताह तब मिला, जब किसी भी शहर, कस्बे या गांव में तिरंगे में लिपटे शहीदों के ताबूत पहुंचे। इस तरह के हमले पहले भी हुए हैं, हमारे जवान पहले भी शहीद हुए हैं, लेकिन इस बार आम लोगों में जितना आक्रोश दिखा है, पहले कभी देखने को नहीं मिला। पहले कभी किसी शहीद की अंतिम यात्रा में हजारों लोग इस तरह भाग लेने नहीं निकले, जैसे बीते सप्ताह निकले।


सो जब ‘नए’ पाकिस्तान के नए प्रधानमंत्री ने अपनी पहली प्रतिक्रिया में कहा कि पाकिस्तान तभी कुछ करेगा, जब उसको ठोस सुबूत दिए जाएंगे, उन भारतीयों में भी आक्रोश दिखने लगा है, जो अक्सर अमन-शांति की बातें करते हैं। इमरान खान को सुबूत मांगते शर्म कैसे नहीं आई? जैश-ए-मोहम्मद ने स्वीकार किया है कि इस हमले को उसने अंजाम दिया है। जैश का सरगना मौलाना मसूद अजहर पाकिस्तान के बहावलपुर शहर से अपने जेहादी हमले करवाता है। और क्या सुबूत चाहिए? पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने अपनी पहली प्रतिक्रिया में धमकी भी दी कि भारत अगर पाकिस्तान पर किसी किस्म का हमला करता है, तो पाकिस्तान को जवाब देना पड़ेगा।


खान साहब जब से प्रधानमंत्री बने हैं, उन्होंने बार-बार कहा है कि भारत को पाकिस्तान के साथ बातचीत का सिलसिला फिर से शुरू करना चाहिए, क्योंकि युद्ध से कुछ हासिल नहीं होने वाला है। यह बात सही है। लेकिन क्या पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को अभी दिखा नहीं है कि बातचीत युद्ध के समय नहीं होती, युद्ध समाप्त होने के बाद ही होती है? भारत की भूमि पर पाकिस्तान अपने जेहादी दस्ते भेजकर लगातार युद्ध करता आया है। पाकिस्तान के जनरल अच्छी तरह समझ गए कि भारत को युद्धभूमि में हराना असंभव है। सो उन्होंने यह युद्ध शुरू किया, जिसको हम अभी तक जेहादी आतंकवाद कहते आए हैं। इन जेहादी हमलों के पीछे हमेशा पाकिस्तानी सेना का हाथ रहा है।


जिस आदिल अहमद डार ने पुलवामा में आत्मघाती हमला किया, उसको किसने प्रशिक्षित किया? अब यह साबित हो गया है कि विस्फोट में जो आरडीएक्स इस्तेमाल किया गया, वह उसको कहां से मिला? हमारी सेना ने श्रीनगर में मुठभेड़ में जिस ‘मास्टरमाइंड’ को मारा, वह सिर्फ मोहरा था। उसको कौन चला रहा था? पुलवामा के बाद हमको स्वीकार करना पड़ेगा कि सरहद पर ही हमारे वीर जवानों का खून नहीं बहा है, हमारे शहरों और कस्बों में नई सरहदें बन गई हैं।

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