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यह नजदीकी क्या कहती है: रूस को रियायत, यूक्रेन पर दबाव; ट्रंप की नीति पर सवाल

स्टीफन वॉल्फ, अमर उजाला Published by: नितिन गौतम Updated Thu, 15 Oct 2026 07:22 AM IST

सार

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप और उनके रूसी समकक्ष व्लादिमीर पुतिन के बीच हुआ डीजल समझौता अमेरिकी नीति से एक बड़ा विचलन है। यूरोप और यूक्रेन के हित दांव पर हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से वाशिंगटन व मॉस्को के बीच ऐसी निकटता शायद ही पहले कभी देखने को मिली हो।
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पुतिन और ट्र्ंप - फोटो : पीटीआई


इस समझौते का समय भी दुर्भाग्यपूर्ण था। उस वक्त यूक्रेन और यूरोप का एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल मियामी में ट्रंप के दूतों स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर के साथ बातचीत कर रहा था। चर्चा में कथित तौर पर अमेरिका के नए प्रस्ताव शामिल थे, जिनका मकसद साढ़े चार साल से जारी युद्ध में जल्द से जल्द तनाव कम करना था। खबरों के मुताबिक, बातचीत के दौरान अमेरिकी दूतों ने संकेत दिया कि रूस पर लगे प्रतिबंधों में ढील दी जा रही है। इस घोषणा ने यूक्रेन और यूरोप के अधिकारियों को हैरान कर दिया। नतीजतन, बातचीत उसी दिन बिना किसी समझौते के खत्म हो गई, जबकि इसे एक दिन और चलना था। अगर अमेरिका और रूस के बीच यह डीजल समझौता सिर्फ ईंधन की आपूर्ति तक सीमित होता, तो इसे एक साधारण समझौता कहा जा सकता था। ट्रंप की घोषणा के मुताबिक, इसके तहत साठ लाख बैरल से कुछ कम डीजल की आपूर्ति होनी है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार, यह मात्रा अमेरिका की करीब डेढ़ दिन की डीजल खपत के बराबर है।


इस समझौते से वैश्विक बाजार में डीजल की कीमतों पर शायद ही कोई खास असर पड़ेगा, भले ही रूस ट्रंप की घोषणा के मुताबिक ईंधन की आपूर्ति कर सके। हालांकि, इस पर पहले से ही संदेह है, क्योंकि रूसी डीजल निर्यात में कमी मुख्य रूप से क्रेमलिन द्वारा लगाए गए निर्यात प्रतिबंध के कारण है। दरअसल, डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी मुख्य रूप से ईरान के खिलाफ ट्रंप की जंग का नतीजा है। ऐसे में, अगर इस समझौते का मकसद नवंबर की शुरुआत में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनाव से पहले डीजल की कीमतें घटाना है, तो इससे कोई बड़ा फायदा होने की उम्मीद नहीं है। हालांकि, यूक्रेन युद्ध पर इसके असर कहीं अधिक गंभीर और नुकसानदेह हो सकते हैं।


जनवरी 2025 में दोबारा सत्ता में लौटने के बाद से, यूक्रेन के खिलाफ रूस के युद्ध को खत्म करने के लिए ट्रंप का तरीका कीव पर धौंस जमाकर उससे रियायतें मनवाने का रहा है। हालांकि, ये कोशिशें काफी हद तक नाकाम रही हैं। यूक्रेन और उसके यूरोपीय सहयोगियों ने रूस को कोई भी क्षेत्र सौंपने के प्रस्ताव को लगातार खारिज किया है। ट्रंप का डीजल समझौता भी यूक्रेन पर दबाव बनाने की एक और कोशिश ही है, ताकि वह अपने सबसे प्रभावी हथियारों में से एक का इस्तेमाल करना बंद कर दे। खबरों के मुताबिक, यूक्रेन के लंबी दूरी तक मार करने वाले ड्रोन और मिसाइलों ने हाल के महीनों में रूसी तेल रिफाइनरियों को निशाना बनाया है। इससे रूस की तेल शोधन क्षमता में 60 फीसदी तक की गिरावट आई है।


हाल के हफ्तों में ट्रंप, यूक्रेनी राष्ट्रपति व्लादिमीर जेलेंस्की पर रूसी रिफाइनरियों पर हमले रोकने का दबाव डाल रहे हैं। साथ ही, वह डीजल की बढ़ती कीमतों के लिए ईरान युद्ध के बजाय यूक्रेन को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। हालांकि, इस मामले में कीव का रुख हमेशा एक जैसा ही रहा है। डीजल समझौते की घोषणा के बाद जेलेंस्की ने फिर कहा, ‘अगर रूस हमारे ऊर्जा ढांचे को नष्ट नहीं करता, तो यूक्रेन भी रूसी तेल रिफाइनरियों में आग नहीं लगाएगा।’ यह वही प्रस्ताव था, जिसे जेलेंस्की ने 22 सितंबर को रखा था और जिसका ट्रंप ने भी समर्थन किया था। लेकिन, रूसी राष्ट्रपति के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने कहा कि केवल रिफाइनरियों पर हमले रोकने से कीमतें कम नहीं होंगी। इसके लिए रूसी ऊर्जा निर्यात पर लगे प्रतिबंध भी हटाने होंगे।


नौ अक्तूबर को ट्रंप द्वारा घोषित डीजल समझौते से रूस को प्रतिबंधों में ऐसी ही राहत मिलती है। इस तरह, पुतिन को ऊर्जा समझौते का वह आर्थिक लाभ मिल गया, जिसकी उन्हें जरूरत थी, जबकि उन्होंने इसके सैन्य पहलू पर कोई प्रतिबद्धता नहीं जताई। दरअसल, जब ट्रंप ने दावा किया कि रूस और यूक्रेन, दोनों ‘ऊर्जा युद्धविराम’ पर सहमत हो गए हैं, पर दोनों देशों ने किसी भी समझौते से इन्कार किया, तो रूस ने ट्रंप की इस घोषणा का जवाब यूक्रेनी बिजली संयंत्र पर हमला करके दिया। डीजल समझौते की घोषणा के बाद ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन से और नजदीकी बढ़ाते हुए यूक्रेन से कहा कि उसे ‘नया नेता चुनना चाहिए।’ वहीं, मियामी में सप्ताहांत पर हुई बातचीत से संकेत मिला कि अगर हमले जारी रहे, तो वाशिंगटन यूक्रेन के साथ खुफिया जानकारी साझा करने और उसे हथियार बेचने पर रोक लगा सकता है। हालांकि, अमेरिका ने इन दावों पर कोई टिप्पणी नहीं की है।


हाल ही में, यूक्रेन को अपने जवाबी अभियान ‘ऑपरेशन विवाल्डी’ में बड़ी सफलता मिली है। जानकारों का मानना है कि इससे पूर्वी यूक्रेन के रणनीतिक रूप से अहम डोनेट्स्क क्षेत्र पर कब्जा करने की रूस की कोशिशों को झटका लगा है। ऐसे में युद्ध का आर्थिक पहलू और भी महत्वपूर्ण हो गया है। इस घटनाक्रम ने पहले से कमजोर अमेरिका-यूरोप (ट्रांसअटलांटिक) संबंधों पर दबाव और बढ़ा दिया है। यूरोपीय संघ की विदेश नीति प्रमुख काजा कल्लास ने कहा कि ‘रूसी डीजल पर प्रतिबंध हटाने से मॉस्को को युद्ध जारी रखने के लिए और अधिक धन मिलेगा।’ लेकिन, यूरोप अब पहले के मुकाबले अमेरिकी डीजल पर ज्यादा निर्भर है। यह कमजोरी इस बात को सीमित कर सकती है कि यूरोप रूस को राहत देने के अमेरिकी फैसले का कितना कड़ा विरोध कर पाएगा। आम तौर पर ऊर्जा के लिए अमेरिका से आयात पर यूरोप की निर्भरता इस बात पर भी सवाल उठाती है कि यूरोपीय संघ (ईयू) का अगला प्रतिबंध पैकेज असल में कितना असरदार और टिकाऊ होगा।
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इस बीच, किसी व्यापक शांति समझौते तक पहुंचने का रास्ता उतना ही मुश्किल लग रहा है, जितना डीजल समझौते से पहले था। सबसे दिलचस्प तो यह है कि रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने के बाद से वाशिंगटन और मॉस्को के बीच ऐसी निकटता शायद ही पहले कभी देखने को मिली हो।   
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