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जीडीपी से जो पता नहीं चलता

नारायण कृष्णमूर्ति
Updated Fri, 19 Oct 2018 04:49 PM IST
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जीडीपी में वृद्धि
हम सब जानते हैं कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) किसी देश की आर्थिक सेहत को आंकने का एक बुनियादी सूचकांक है। हाल के समय में भारत के जीडीपी विकास को लेकर बहुत से सवाल उठे हैं। लेकिन यह कोई नई बात नहीं है, क्योंकि जीडीपी के आकलन की कई तरह की धारणाएं हैं और इस बात को लेकर भिन्न तरह की राय और दृष्टिकोण हैं कि वास्तविक जीडीपी कितनी है। इसके साथ ही यह सार्वभौमिक स्वीकार्यता है कि भारतीय जीडीपी अगले कुछ दशकों में तेजी से आगे बढ़ेगी, जिससे विकास के सर्वाधिक तेज आंकड़े मिलेंगे और भारत वैश्विक रूप से एक बड़ी ताकत बनकर उभरेगा। 

ऐसा होना तय दिख रहा है, क्योंकि जीडीपी के मामले में हम पहले ही वैश्विक रूप से शीर्ष पांच देशों में आ चुके हैं।


लेकिन यदि हम अपने आसपास देखें, तो पता चलता है कि इसका आम आदमी के लिए न तो कोई मतलब है और न ही उसका कोई उस पर प्रभाव पड़ता है, क्योंकि आगे बढ़ती और उच्च जीडीपी भारतीय नागरिकों की समृद्धि का कोई संकेत नहीं देती। दो साल पहले जारी किए गए जीडीपी के नए आधार को लेकर की जाने वाली राजनीति या फिर संसद की प्राक्कलन समिति की मसौदा रिपोर्ट पर सरकार की आपत्ति, जिसमें जीडीपी के आकलन के मौजूदा तरीके की समीक्षा की सिफारिश की गई है, को जरा दरकिनार कर दीजिए। 



वास्तविकता यह है कि जीडीपी के आकलन या फिर जीडीपी तक पहुंचने के लिए इस्तेमाल किए गए डाटा को लेकर हमेशा विशेषज्ञों में मतभेद होंगे। लेकिन सवाल है कि आखिर हम जीवन स्तर को प्रभावित करने वाले आंकड़ों का विश्लेषण कैसे करें? हमारे जीवन स्तर को बताने वाला एक संकेतक प्रति व्यक्ति जीडीपी है। लेकिन यदि कोई प्रति व्यक्ति आय के स्तर को देखे तो भारत ऐसे कई देशों से पीछे है, जिन्हें हमने जीडीपी विकास दर के मामले में काफी पीछे छोड़ रखा है। जरा फ्रांस पर गौर कीजिए, जिससे हम राफेल लड़ाकू विमान खरीद रहे हैं, उससे हम जीडीपी के मामले में जरा आगे निकल गए हैं; लेकिन भारत की प्रति व्यक्ति आय 7,060 डॉलर है, वहीं फ्रांस की 43,720 डॉलर और यह हमसे छह गुना से भी अधिक है। 


यदि हम परचेजिंग पॉवर पैरिटी (क्रय शक्ति समता) या पीपीपी के आधार पर जीडीपी को देखें, जोकि एक आर्थिक सिद्धांत है, जिसमें विभिन्न देशों की मुद्राओं की कुछ वस्तुओं के आधार पर तुलना की जाती है, तो इसमें हम काफी पीछे हैं। वास्तव में पीपीपी के स्तर के आधार पर प्रति व्यक्ति आय के मामले में हम 123 वें स्थान पर हैं, जबकि फ्रांस 25वें स्थान पर है। पीपीपी कुछ और नहीं, बल्कि एक अवधारणा है जिसमें दो मुद्राएं तब साम्य में होती हैं, जब कुछ निश्चित वस्तुओं की कीमतें विनिमय दर को ध्यान में रखते हुए दोनों देशों में समान हों। निश्चित रूप से सिर्फ जीडीपी के आधार पर किया जा रहा आकलन न तो भारत के लिए और न ही भारतीय नागरिकों के लिए अच्छा है। 


हाशिये पर जाता आम आदमी


आदर्श रूप में देखें तो आर्थिक विकास का प्रभाव आम आदमी के दैनिक जीवन पर पड़ना चाहिए। इससे आम आदमी के पास बेहतर स्वास्थ्य सेवा, पानी की व्यवस्था, स्वच्छता, शिक्षा और आय के बेहतर साधन होने चाहिए यानी कुल मिलाकर उसका जीवन स्तर बेहतर होना चाहिए। लेकिन उत्तरोत्तर सरकारों ने जीडीपी की दौड़ में इन कारकों को नजरंदाज किया। वे जिस विकास की बात करती रहीं, वह समावेशी नहीं था और जिससे समाज के बड़े तबके की कीमत पर सिर्फ कुछ लोगों को लाभ हुआ। आज आम आदमी का सबसे बड़ा बोझ रोज की सबसे अनिवार्य आवश्यकता भोजन पर होने वाला खर्च है। 

शहरी क्षेत्रों में बढ़ते खर्चों को बेहतर ढंग से समझने के लिए हम बचत की घटती दर पर गौर कर सकते है, जोकि कुछ दशक पहले के पचास फीसदी की तुलना में तीस फीसदी रह गई है। बचत में आई गिरावट की कई वजहें हैं, जिनमें जीवन यापन का बढ़ता खर्च, कर्ज, धन की घटती कीमत, महंगाई में वृद्धि और बचत पर घटती ब्याज दर हैं। हम बचत करने वाले देश से कर्ज लेने वाले देश में बदल चुके हैं। पूरे भारत में देखा जा सकता है कि अमीर हो या गरीब या वंचित तबका, सब कर्ज ले रहे हैं। आसान कर्ज का मतलब है कि लोगों ने भी रोज की जरूरतों तक के लिए भी सामान्य से अधिक खर्च करना शुरू कर दिया है।


भारतीयों की एक पीढ़ी अपने जीवन स्तर को बनाए रखने को लेकर आज दुविधा में है, इसके लिए उन्हें दीर्घकाल की बचत में सेंध लगाने के साथ ही अपनी संपत्ति तक को दांव पर लगाना पड़ रहा है। देश की तेज गति से आगे बढ़ती जीडीपी के आधार पर कोई व्यक्तिगत तौर पर विकास का अनुभव नहीं कर सकता। इस अलगाव का संबंध रोजगार क्षेत्र में सुस्ती, महंगाई बढ़ने के साथ जीवन यापन की बढ़ती कीमत और इनसे भी कहीं अधिक अमीरों और वंचितों के बीच बढ़ती खाई है। 
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दुनिया के शीर्ष 62 लोगों के पास निचले क्रम के 3.5 अरब लोगों से भी अधिक संपत्ति है, जिसका मतलब है कि आय का भारी असमान वितरण है। इससे जीवन स्तर में भी फर्क बढ़ जाता है।  

विकास को और समावेशी बनाने के लिए समाज विज्ञानियों और अर्थशास्त्रियों ने जीवन स्तर और मानव विकास को संयुक्त रूप से मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) के रूप में वर्गीकृत किया है। एचडीआई का आय पैमाना वास्तव में सकल राष्ट्रीय आय है, जिसमें उस देश के नागरिकों द्वारा देश में और विदेश में अर्जित उत्पादन शामिल है और इसलिए जीवन स्तर को आंकने का यह बेहतर पैमाना है। एचडीआई वास्तविक प्रति व्यक्ति आय के साथ ही अपने पैमाने में जीवन प्रत्याशा और शिक्षा को भी जोड़ता है। इस पैमाने पर भी यूएनडीपी द्वारा जारी सूची में भारत 189 देशों की सूची में 130 वें स्थान पर है।


राजनेता और सरकारें अपनी सुविधा से भिन्न पैमाने पर निकाले गए जीडीपी आंकड़े पेश करती हैं। पर ऐसे समय जब हम बुराई पर सच्चाई की जीत का ज्श्न मना रहे हैं, हम अपने मिथकों से ऐसे सिद्धांत को अपनाएं जो विकास को व्यक्ति की इकाई के रूप में देखे। सो, अगली बार जब आप जीडीपी के बारे में सुनें तो बेसब्र होने की जरूरत नहीं है, यह एक और आंकड़ा होगा जिससे आपके जीवन पर बहुत कम फर्क पड़ेगा।
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