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विजयादशमी के राम

प्रयाग शुक्ल
Updated Thu, 18 Oct 2018 05:37 PM IST
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राम

भारत के विभिन्न अंचलों के लिए विजयादशमी एक सांस्कृतिक ऋतु है, जिसमें धर्म, अध्यात्म, सामाजिक जीवन और कलाएं सब समाहित हैं। यह ऋतु निश्चय ही एक उमंग और उल्लास लाती है। मौसम में हल्की ठंडक भर जाती है। और विजयादशमी के आगमन के साथ वह आत्मीय गरमाहट भी, जो हम सबकी जानी-पहचानी है। आगमन से याद आई कि बंगाल में, जहां मैं बड़ा हुआ, 'आगमनी' शब्द का बड़ा प्रचलन हैः 'आगमनी' यानी मां दुर्गा के आगमन की सूचना। वहां दुर्गा पूजा के पंडाल सजने लगते हैं, कि आ रही हैं मां दुर्गा! और उत्तर भारत में रामलीलाओं की 'आगमनी' होती है। उत्तर भारत ही क्यों, दक्षिण भारत का मैसूर का दशहरा भी तो बड़े महत्व का माना जाता है। देश-विदेश से वहां की विजयादशमी देखने के लिए पर्यटक पहुंचते हैं। सभी अंचलों के बाजार भी सज जाते हैं।



दस सिर वाले रावण पर राम की, न्याय की, सत्य की विजय, विजयादशमी के मूल में है, और न्याय व सत्य की जीत संभव होती है-यह भावना मानो चारों ओर भर जाती है। एक नई ऊर्जा, एक नई आशा का संचार करती हुई। बुराई पर अच्छाई की जीत का इतना बड़ा आश्वासन एक बार फिर बन जाती है विजयादशमी। सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने लिखा है न 'राम की शक्ति पूजा' में-जय हो, जय हो हे पुरुषोत्तम नवीन/कह महाशक्ति राम में हुई लीन।


देखें, तो विजयादशमी में इस तरह राम और महाशक्ति एकाकार भी हो जाते हैं। विजयादशमी और दुर्गा पूजा हर तरह से सचमुच ऊर्जा के, शक्ति के प्रतीक हैं। बंगाल में तो आगमनी के साथ ही चंडी पाठ, दुर्गाशप्तशती का पाठ शुरू हो जाता है। अब तो गूगल पर, यूट्यूब पर, ये सारे पाठ उपलब्ध हैं, विभिन्न संगीतकारों के रचे हुए। जब हमने कहा कि विजयादशमी एक ऋतु है, और उसमें धर्म, आध्यात्म के साथ कलाएं भी समाहित हैं, तो यही सोचकर कि इस ऋतु में हमें संगीत, नाटक, नृत्य, मूर्तिशिल्प, हस्तशिल्प सब सक्रिय दिखते हैं। रामनगर की रामलीला की ओर ध्यान दें, तो मानो पूरी काशी ही राममय हो जाती है। वहां रामलीला का मंचन किसी एक ही मंच पर नहीं होता है। राम कथा के विभिन्न प्रसंग विभिन्न स्थलों पर अभिनीत होते हैं और नगरवासी उसमें दर्शक, अभिनेता और उसे संपन्न कराने की विभिन्न भूमिकाओं में होते हैं। सभी धर्मों के लोगों की उसमें भागीदारी रहती है। विभिन्न पात्रों के वस्त्र (वेशभूषा) सिलने से लेकर सज्जा और गाने-बजाने के जितने काम हैं, वे हिंदू भी करते हैं और मुसलमान भी।


न जाने कितने अरसे से देश की कई रामलीलाएं और विजयादशमी की अन्य प्रस्तुतियां इसी तरह परंपरागत रूप से होती चली आ रही हैं। रामनगर की, मैसूर की, कुल्लू दशहरे की, छत्तीसगढ़ की और दिल्ली के रामलीला मैदान की रोशनियां, जिससे जुड़ने में 'केंद्रीय ताकतें' भी गर्व महसूस करती हैं। रामलीला चूंकि नाटक का ही एक परंपरागत रूप है, और नाटक में सभी कलाओं का समावेश है। दशहरा इस अर्थ में भी सामाजिक-सांस्कृतिक उत्सव है, समारोह है कि उसमें समाज के सभी वर्ग शामिल होते हैं। जिस दिन रावण जलता है, और बच्चे-बुजुर्ग उसके पुतले को निहारते हैं कि यह कुछ डरावना, कुछ विचित्र, दस सिरों वाला पुतला भस्मीभूत होने वाला है, तो उस 'निहारने' में भला कौन नहीं शामिल होता है!


हां, हम हर साल मनाते हैं कि दाह हो कुरीतियों का, तरह-तरह के अन्याय का, सामाजिक विषमता का, आतंक का। वैसे ही दाह की कामना हम इस साल भी करेंगे। इस साल कामना हम यह भी करेंगे कि यौन शोषण का, स्त्री के साथ अन्यायी व्यवहार का, दुर्भावनाओं का दाह हो। राम ने रावण से युद्ध भी इसलिए किया था कि रावण ने सीता का अपहरण किया था, उसे पराधीन बनाना चाहा था। तो उन 'राम' को हम फिर जगाएंगे। हां, राम ही तो वह सहारा रहे हैं, जिन्हें हम जाने कितनी परिस्थितियों में याद करते रहे हैं रोज हीः सुबह की राम-राम के साथ, रोग-शोक, हर्ष-उल्लास में।


महात्मा गांधी याद आते हैं, इस वर्ष उनकी 150 वीं जयंती है, सो और भी अधिक याद आते हैं, राम संलग्नता के लिए। राम नाम तो उनके जीवन का मूल मंत्र था। इसी नाम में तो उन्हें मानो किसी मधुर ध्वनि की गूंज आती थी। वही उनके मन को करुणा से, शक्ति से, सत्य से, उत्तरदायित्व से, जन-जन के प्रति प्रेम से सिंचित करता था। उनके मुख से आखिरी समय भी तो यही निकला था, हे राम।

 

यह जो राम कथा है, राम की महिमा है और समाज में उसका जो प्रवेश है, वह संभव हुआ है संस्कृत में लिखी वाल्मीकि की रामायण से लेकर विभिन्न भाषाओं में लिखी गई रामकथाओं से, तुलसी के रामचरितमानस से। पर वह पीढियों तक दशहरा के माध्यम से भी रूपांतरित हुई है रावण दहन और रामलीलाओं से, जिसकी शुरुआत उत्तर भारत में स्वयं तुलसीदास ने की थी-ऐसी मान्यता है। हां, दक्षिण भारत में दशहरा बंगाल की तरह ही दुर्गा केंद्रित रहा है। दशहरा उत्सव 14वीं शती के विजयनगर साम्राज्य में महानवमी के रूप में मनाया जाता था। इतालवी यात्री निकोली द कोंती ने दर्ज किया है कि यह राज्य की ओर से समर्थित और प्रोत्साहित था, और बड़ी भव्यता और धूमधाम के साथ मनाया जाता था। इस अवसर पर मार्शल आर्ट्स की प्रस्तुतियां भी होती थीं। वीर भाव की देवी दुर्गा-चामुंडेश्वरी-की अर्चना होती थी। पर इन राजकीय समारोहों से अधिक महत्वपूर्ण तो वे समारोह रहे हैं, जिन्हें सदियों से लोग अपने-अपने स्तर पर मनाते रहे हैं और आज भी मनाते हैं।
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तो मनते रहें दशहरा के उत्सव और हम याद करते रहें कि ऐसे सांस्कृतिक समारोह, जो सहयोग, साहचर्य, सद्भाव की भूमि रचते रहे हैं, रचते रहें। वही सद्भाव और सहकार, जो देश भर से 'गॉड्स ओन कंट्री' केरल की जल प्रलय के वक्त दिखाई पड़ा। हम छोड़ न दें किसी को सड़क पर तड़पते हुए, सर्दी में ठिठुरते हुए, काम आएं एक-दूसरे की मुसीबत के समय-यह भी एक संदेश है रामकथा का। आज जब हम दशहरा मना रहे हैं, डीजल-पेट्रोल की कीमतें बढ़ी हुई हैं। किसान परेशान हैं, जब हम मना रहे हैं इस वर्ष दशहरा। वोट-वोट की गुहार है, जब हम मना रहे हैं दशहरा। चुनावों में चाहे जिसकी जीत-हार हो, पर हम जीतने न दें कभी शोषण को, अन्याय को, असत्य को। फिर दुहरा रहे हैं कि राम खड़े हुए इन्हीं सब के विरुद्ध, तो मने विजयादशमी राम के जीवन की मूल भावना के साथ। 

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