केंद्रीय कैबिनेट द्वारा बालश्रम (प्रतिबंध एवं विनिमयन) कानून, 1986 में किए गए संशोधनों पर तूफान आ गया है। राजनीतिक ध्रुवीकरण के मौजूदा दौर में इस पर हो रही बहस नरेंद्र मोदी सरकार के समर्थकों और विरोधियों के बीच एक और कर्कश मैच में तब्दील होने लगी है। यह देखना महत्वपूर्ण है कि द्रमुक और पीएमके ने; इनमें से पीएमके केंद्र में सत्तारूढ़ एनडीए सरकार का घटक दल है, एनडीए सरकार के इस फैसले का विरोध किया है, जिसमें बालश्रम कानून में बदलाव किया गया है। इन पार्टियों का तर्क है कि बालश्रम कानून में बदलाव से बच्चों की शिक्षा और उनके सुखद भविष्य का अधिकार छिन जाएगा। हालांकि यह कानून बनाने के लिए एनडीए सरकार को इस विधेयक को संसद में लाना पड़ेगा। तब तक राजनीति को एक किनारे रखकर प्रस्तावित बदलाव के बारे में विचार करना ज्यादा उपयोगी होगा।
केंद्रीय कैबिनेट ने बालश्रम में बदलाव को जो मंजूरी दी है, उसके पीछे उद्देश्य क्या है? इन बदलाव में व्यावसायिक उपक्रमों में चौदह साल से कम उम्र के बच्चों से काम लेने पर प्रतिबंध शामिल है। यह एक स्वागतयोग्य कदम है। हालांकि इसमें एक प्रावधान यह है कि पारिवारिक और गैर खतरनाक उद्योगों में चौदह साल से कम उम्र के बच्चों से काम लेने पर मनाही नहीं है। बाल अधिकार से जुड़े कार्यकर्ता इस प्रस्ताव पर क्षुब्ध हैं। वे सरकार के इस प्रस्ताव से भी नाखुश हैं कि ऑडियो-विजुअल इंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में भी ऐसे बच्चों के काम करने पर प्रतिबंध नहीं है, बशर्ते कि उस क्षेत्र में बच्चों का काम उनकी पढ़ाई को प्रभावित नहीं करेगा।
कोई तर्क दे सकता है कि अगर बच्चों का कामकाज उनकी शिक्षा में असर नहीं डालता, तो फिर कुछ गलत नहीं है। मगर बाल अधिकार से जुड़े कार्यकर्ता इस पर नाराज क्यों हैं? इसकी कई वजहें हैं। दरअसल 'पारिवारिक व्यवसाय' अपने आप में बेहद अस्पष्ट शब्दावली है। ऐसे अनेक व्यवसाय असंगठित क्षेत्र में होंगे। फिर पारिवारिक व्यवसाय की परिभाषा परिवार से जुड़े बाहरी व्यक्तियों तथा दूर के रिश्तेदारों तक भी जाती है। जैसा कि मिर्जापुर स्थित सेंटर फॉर रूरल एजुकेशन ऐंड डेवलपमेंट ऐक्शन के निदेशक शमशाद खान पूछते हैं, यह कैसे तय किया जाएगा कि काम पर लगे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है या नहीं? कल्पना कीजिए कि पूरा दिन स्कूल में बिताने के बाद एक बच्चे से पारिवारिक व्यापार में हाथ बंटाने के लिए कहा जाता है। वैसे में वह कब पढ़ेगा, कब खेलेगा, और कब होमवर्क करेगा? अगर बच्चा पारिवारिक व्यापार में हाथ बंटाने के बजाय पढ़ना चाहता है, तो क्या होगा?
जिन बच्चों की पारिवारिक व्यवसाय में जरूरत है, वे वस्तुतः देश के सबसे गरीब और हाशिये के बच्चे होंगे। स्कूलों में पढ़ने वाले वे अपने परिवार में संभवतः पहली पीढ़ी के बच्चे होंगे। इस कारण स्कूल में दूसरे बच्चों के बराबर आने के लिए उन्हें अपनी पढ़ाई में ज्यादा ध्यान देना होगा। लेकिन इसके लिए वे बच्चे आखिर समय कैसे निकालेंगे? खान जैसे लोगों का कहना है कि पारिवारिक व्यवसाय में हाथ बंटाने से आगे चलकर इन बच्चों की शारीरिक और संवेदनात्मक क्षमता प्रभावित होगी तथा स्कूलों में इनकी अनुपस्थिति बढ़ेगी।
खान का मानना है कि मिर्जापुर जैसे कालीन निर्माण के इलाके में सरकार के ये प्रस्तावित बदलाव बच्चों पर काम का बोझ बढ़ाएंगे ही-क्योंकि वहां कालीन की बुनाई में परिवारजन वैसे भी घर के बच्चों से काम लेते हैं। तर्क यह दिया जा रहा है कि पारिवारिक कारोबार में बच्चों को काम करने देने से जहां परिवार का भला होगा, वहीं काम करने वाले बच्चों के लिए वैसी मुश्किलें नहीं आएंगी, जैसी बाहर काम करने पर आती हैं। लेकिन यह तर्क देते हुए जिस बात की अनसुनी की जा रही है, वह यह है कि जैसे ही परिवार का तर्क देते हुए बच्चों को काम पर लगाया जाएगा, नियोक्ताओं के लिए वयस्क कामगारों की मजदूरी बढ़ाने या अधिक वयस्कों को रोजगार देने की जरूरत कम होती जाएगी। ऐसे में, हाशिये के लोग गरीबी के चक्र से बाहर भला कैसे निकल पाएंगे?
देश के जिन पांच राज्यों में बाल मजदूरों की संख्या अधिक है, वे हैं-उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, गुजरात और बिहार। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, पिछले करीब एक दशक में बाल मजदूरों की संख्या में 60 फीसदी गिरावट आई है। वर्ष 2001 में देश भर में बाल मजदूरों की संख्या (पांच से चौदह वर्ष) 1.26 करोड़ थी, जो 2010 में घटकर 49 लाख रह गई। हालांकि बाल अधिकार कार्यकर्ता इस आंकड़े पर सवाल उठाते हैं। आंकड़े सच्चाई शायद ही बताते हों, क्योंकि बहुतेरे बच्चे ऐसा काम करते हैं, जो दिखाई नहीं देते। अगर हम बच्चों की महत्वाकांक्षाओं को रौंदते रहेंगे, और भूमंडलीकृत विश्व में उन्हें उनकी जगह से वंचित करेंगे, तो वे हमेशा शोषित ही रहेंगे। सच्चाई यह है कि जरूरतमंद अभिभावकों को छोड़कर कोई भी नहीं चाहेगा कि उसका बच्चा काम करे। इसलिए समाधान यह है कि अभिभावकों को काम और हुनर मुहैया कराए जाएं, इसके अलावा उनमें भी वंचित लोगों को नकद हस्तांतरण का लाभ मिले।
बच्चे भारत का भविष्य हैं-एक शिक्षित बच्चा न सिर्फ अपनी देखभाल ज्यादा अच्छे तरीके से कर सकता है, बल्कि अपने परिवार और समुदाय को आगे ले जाने की क्षमता भी रखता है।