जजों की कठोर टिप्पणी की तस्दीक मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर और भाजपा नेता सत्यपाल सिंह के बयानों से होती है। उनके अनुसार, मालेगांव विस्फोट मामले सहित कई मामलों में राजनीतिक लाभ से प्रेरित जांच में सबूतों को गढ़ा जा रहा था। सनद रहे कि संविधान के अनुसार पुलिस का विषय राज्य सरकारों के अधीन आता है। कानून के अनुसार लाखों अपराधी छूट जाएं, लेकिन एक निरपराध को सजा नहीं होनी चाहिए। यातना देकर लिए गए इकबालिया बयानों से मीडिया में सुर्खियां तो बन सकती हैं, लेकिन अदालत में मामले को टिकाने के लिए ठोस सबूत पेश करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष यानी जांच एजेंसी और राज्य सरकार की होती है। बचाव पक्ष की कमजोरी के आधार पर आरोपियों को सजा नहीं दी जा सकती। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर दोषी ठहराने के लिए सुसंगत तथ्य, साक्ष्यों की शृंखला और निर्णायक साक्ष्य जरूरी हैं।
मालेगांव मामले में बरी हुए समीर कुलकर्णी ने कहा कि बचाव और अभियोजन, दोनों पक्ष मुकदमों को लंबा खींचना चाहते हैं। उनके अनुसार, सह-आरोपियों ने वकील नहीं रखा होता, तो मुकदमा 15 साल पहले खत्म हो गया होता। उसी सिक्के का दूसरा पहलू सुरेन्द्र कोली है। उसने अपने मामले की खुद ही पैरवी करते हुए अभियोजन पक्ष की जांच में खोट को उजागर कर दिया। निरक्षर कोली जेल में रहकर साक्षर बना और कानून की किताबों की पढ़ाई की। उसने फॉरेंसिक लैब, विकास प्राधिकरण, अस्पताल और पुलिस विभागों में एक हजार से ज्यादा आरटीआई लगाकर सरकारी विभागों के जवाब और सीबीआई की चार्जशीट में विसंगतियों को उजागर किया।
एनआईए की विशेष अदालत के फैसले के बाद महाराष्ट्र सरकार की एटीएस एजेंसी की साख पर सवाल खड़े हो रहे हैं। अदालत से पहले मकोका के आरोप खारिज हो गए और फिर यूएपीए की मंजूरी को अवैध और खामियों से भरा माना गया। पंचनामे में गलतियां, गवाहियों में विरोधाभास, मूल दस्तावेज गायब होने और घायलों के फर्जी प्रमाण-पत्रों पर अदालत ने एटीएस को फटकार लगाई। कॉल डाटा रिकॉर्ड (सीडीआर) के साथ जरूरी 65-बी के सर्टिफिकेट और नार्को टेस्ट रिपोर्ट को पेश नहीं करने का फायदा आरोपियों को मिला। केंद्रीय एजेंसी एनआईए ने राज्य की एटीएस पर सबूत गढ़ने का आरोप लगाया था। उनका धीरे-धीरे खुलासा होने पर यह साफ हो रहा है कि किस तरह नेताओं के इशारे पर जांच एजेंसियां राजनीतिक विरोधियों को फंसा सकती हैं?
मुंबई ट्रेन धमाकों में 19 साल पहले 187 लोगों की मौत के मामले में हाईकोर्ट ने विशेष अदालत के फैसले को पलटते हुए 12 अभियुक्तों को बरी कर दिया। आरोपियों की जेल से रिहाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी है। पीड़ितों के अनुसार, यह फैसला जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा है। लोग यह सवाल पूछ रहे हैं कि सभी आरोपी बेगुनाह हैं, तो इतने बड़े आतंकी कृत्य का जिम्मेदार कौन था?
मालेगांव मामले में अदालत ने मृतक पीड़ित परिवारजनों को दो लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। जिन लोगों को पुलिस और जांच एजेंसियों ने फर्जी तरीके से फंसाया उनकी पीड़ा, अपमान, यातना, पारिवारिक संकट और सामाजिक कलंक की भरपाई कैसे हो सकती है? गलत जांच करने वाले लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए कानून में प्रावधान हैं। अब सीआरपीसी कानून की धारा-250 और नए बीएनएसएस की धारा-193 के तहत आरोपियों के लिए भी रिहाई के बाद हर्जाने की मांग होने लगी है।
आतंकवाद को धर्म से जोड़ने को नकारते हुए मालेगांव फैसले में जज ने कहा कि जन धारणाओं और मीडिया ट्रायल के आधार पर आपराधिक मुकदमों का फैसला नहीं हो सकता। यदि कोई संगठन गैरकानूनी नहीं है तो सिर्फ उससे जुड़े रहने पर किसी को अपराधी नहीं माना जा सकता। बिखरे गवाह, उलझे सबूत और आरोपियों की लंबी लिस्ट वाले मुकदमों के ट्रायल में कई दशक लग जाते हैं। उसके बाद रिहा हुए आरोपियों, थके हुए पीड़ित परिवार और डरे हुए गवाहों के लिए पुलिस और अदालत की यंत्रणापूर्ण लंबी प्रक्रिया सबसे बड़ा दंड है। कई दशकों में मामले की कई जजों की सुनवाई के बाद फैसला तो आखिरी जज ही लिखते हैं। इससे न्यायिक प्रशासन की कार्यपद्धति पर सवाल उठ रहे हैं? संविधान की प्रस्तावना में न्याय शब्द को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। विशेष अदालत के हजारों पेज के फैसले और जांचपत्र के लाखों पेज के दस्तावेजों वाले मुकदमों में सुप्रीम कोर्ट में संक्षिप्त नोट के आधार पर सुनवाई और फैसले को ध्यान में रखते हुए जल्द और सही न्याय की संभावना को तलाशना बेहद जरूरी है।