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राजनीतिक दलों का क्या होगा

Sun, 18 Dec 2016 07:03 PM IST
एम के वेणु
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एम के वेणु
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 85 फीसदी भारतीय मुद्रा को अमान्य करने की घोषणा के पांच हफ्ते बाद भी नकदी के संकट का अभाव खत्म होता नहीं दिख रहा है। रिजर्व बैंक के गवर्नर ने ऐसी कोई निश्चित तारीख बताने से इन्कार कर दिया, जिसके बाद लोग अपनी मर्जी से पैसे निकाल सकें। बैंकों और एटीएम के आगे कतार कम नहीं हुई है। इससे गरीब और निम्न मध्यवर्गीय लोग, खासकर देश के ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों में सबसे ज्यादा परेशान हैं, क्योंकि बड़े शहरों से बाहर उन इलाकों में बैंक की शाखाएं और एटीएम बहुत ही कम हैं।
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नोटबंदी के शुरुआती कुछ हफ्तों में गरीब लोगों के मन में यह भावना थी कि इससे अमीर लोगों को ज्यादा परेशानी होगी, क्योंकि रातोंरात पांच सौ और हजार रुपये के नोटों को अमान्य करार दिया गया। ऐसी भावना थी कि अमीर लोगों को दंडित किया जा रहा है। लेकिन अब ऐसा नहीं होने वाला, क्योंकि अमीर लोग अपने पांच सौ और हजार रुपये के सारे नोटों को बैंकिंग व्यवस्था में वापस डालने में कामयाब रहे हैं। तीन से चार लाख करोड़ रुपये के काले धन को खत्म करने के सरकार का मूल अनुमान गलत साबित हुआ है और शर्मिंदगी का एक बड़ा कारण बन गया है। नकदी के रूप में काले धन को पहचानने की अपनी विफलता छिपाने के लिए सरकार ने आयकर विभाग को छूट दे दी है, जो पिछले पैंतीस दिनों से पांच सौ और हजार रुपये के रूप में बैंकों में जमा करोड़ों रुपये की जांच की धमकी दे रहा है।

विडंबना देखिए कि आयकर विभाग, जो देश भर में सबसे ज्यादा भ्रष्ट माना जाता है, मोदी प्रशासन के लिए नैतिक पुलिस का काम करेगा। जाहिर है कि आयकर विभाग की नजरें बड़े व्यावसायिक संगठनों और बड़े राजनीतिक दलों पर नहीं होंगी, जो एक-दूसरे का ख्याल रखते हैं और काले धन के उत्पादन की पारिस्थितिकी में शीर्ष पर हैं। आयकर विभाग में इतनी हिम्मत नहीं है कि वे उनसे पूछताछ कर सके, क्योंकि बड़े व्यावसायिक संगठनों के साथ राजनेताओं का करीबी रिश्ता होता है। आयकर विभाग केवल छोटे जमाकर्ताओं और छोटे व्यवसायियों पर हाथ डालेगा, जो सबसे ज्यादा कमजोर होते हैं और जिनका राजनेताओं से कोई खास रिश्ता नहीं होता।
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पिछले हफ्ते रिजर्व बैंक ने घोषणा की कि बैंक आठ नवंबर के बाद जमा दो लाख और उससे कम रकम की सूचना भी आयकर विभाग को देंगे। जबकि शुरू में सरकार ने आश्वस्त किया था कि ढाई लाख रुपये ज्यादा जमा राशि की जांच होगी। स्पष्ट है कि सरकार छोटे जमाकर्ताओं पर निशाना साधना चाह रही है। ऐसे में, अगर एक निम्न मध्यवर्गीय महिला ने जीवन भर की अपनी बचत दो रुपये बैंकों में जमा कराई होगी, तो बैंक उसकी जानकारी आयकर विभाग को देंगे। आयकर विभाग ने पहले ही दो लाख से ज्यादा ऐसे जमाकर्ताओं को नोटिस भेज दिया है।

सरकार बड़े व्यावसायिक समूहों के बजाय छोटे जमाकर्ताओं पर ध्यान क्यों केंद्रित कर रही है? जबकि बड़े व्यावसायिक समूह विभिन्न परिष्कृत तंत्र, जैसे आयात बिल के जरिये (जो उन्हें विदेशों में विभिन्न डॉलरों की संपत्ति में बड़ी रकम हस्तांतरित करने में सक्षम बनाता है) सबसे ज्यादा काले धन का उत्पादन करते हैं। ये पैसे वे शेयर बाजार या अन्य वैश्विक वित्तीय चैनल के जरिये देश में वापस लाते हैं और चुनावों में राजनीतिक दलों को चंदा देते हैं। सरकारी एजेंसियों ने सबूत के साथ जांच करके रिपोर्ट दी है कि कुछ बड़े व्यावसायिक घरानों द्वारा कोयला और बिजली के उपकरणों के आयात बिल के जरिये पंद्रह हजार करोड़ रुपये अवैध रूप से विदेशों में हस्तांतरित किए गए। लेकिन इन व्यावसायिक संगठनों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई, क्योंकि वे बड़े राजनीतिक दलों को चंदा देते हैं।

पिछले हफ्ते वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी ने उन लाखों छोटे बचतकर्ताओं को एक तरह से धमकी दी, जिन्होंने पांच सौ और हजार रुपये की मुद्रा में कुछेक लाख रुपये बैंकों में जमा कराए हैं। उन्होंने कहा कि या तो उन्हें अपनी जमा राशि का पचास फीसदी कर के रूप में चुकाना चाहिए या 85 फीसदी दंड और अभियोजन का सामना करना चाहिए, अगर उन्होंने अपनी आय छिपाई है। ध्यान रहे, जमाकर्ताओं पर यह साबित करना है कि उसने पिछले दशकों में अपने पैसे पर कर चुकाया है। यानी एक 65 साल की मध्यवर्गीय विधवा को, जिसने जीवन भर में दो से चार लाख रुपये जमा किए हैं,  यह साबित करना होगा कि उन्होंने अपने पैसे पर कर चुकाए हैं। दूसरी तरफ वित्त मंत्रालय का कहना है कि पंजीकृत राजनीतिक दलों को चूंकि कर से छूट हासिल है, इसलिए अगर वे नकद में करोड़ों रुपये जमा करते हैं, तो उनसे कोई सवाल नहीं पूछा जाएगा। सरकार यह किस तरह का न्याय कर रही है?

फिलहाल राजनीतिक दलों को किसी भी व्यक्ति से बीस हजार रुपये तक चंदा मिलने पर स्रोत नहीं बताने की छूट मिली हुई है। भाजपा और कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियां अपने 70 फीसदी से ज्यादा चंदे को व्यक्तिगत चंदे के रूप में दर्शाती हैं, जिसका खुलासा उन्हें नहीं करना है। सबसे ज्यादा मोटी रकम उन्हें शीर्ष 500 व्यावसायिक समूहों से मिलती है। हैरानी की बात है कि राजनीतिक दल और व्यावसायिक समूहों की जांच आयकर विभाग नहीं करता है। पिछले चालीस दिनों में सरकार ऐसा कोई भी नियम-कानून लेकर नहीं आई है, जिससे राजनीतिक दलों और बड़े व्यवसायियों पर असर पड़े। देश की आम जनता यह सब घबराहट के साथ देख रही है। यही वजह है कि इस तरह की राजनीतिक भावना बढ़ रही है कि काले धन पर प्रहार का सरकार का यह अभियान आम लोगों और छोटे व्यवसायियों पर निशाना साधने के साथ खत्म हो जाएगा और व्यवस्था में काले धन का उत्पादन करने वाली बड़ी मछलियों को आसानी से छूट मिल जाएगी। राजनीतिक रूप से प्रधानमंत्री मोदी को इसकी महंगी कीमत चुकानी पड़ेगी।
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