पिछले साल के आखिरी कुछ सप्ताह घर वापसी अभियान के हल्ले में बीत गए थे। नया वर्ष विहिप द्वारा राजेश्वर सिंह को स्वास्थ्य के आधार पर छुट्टी पर भेज देने की सूचना के साथ आया, जो घर वापसी अभियान के जरिये चर्चा में थे। अब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी यह सफाई दी है कि अभियान सरकार द्वारा प्रायोजित नहीं है।
यह सरल व्याख्या है कि धर्मांतरण दूसरे धर्मों के लोगों को हिंदू धर्म में वापस लाने का कार्यक्रम है। हालांकि विहिप अगर समझ बैठी है कि पचास से सौ लोगों को हिंदू धर्म में वापस लाकर वह देश की जनसांख्यिकी बदल देगी, तो यह भी उसका भ्रम है। पर सच यह है कि घर वापसी कार्यक्रम देश को ध्रुवीकृत करने और गैर हिंदुओं के प्रति द्वेष फैलाने की मंशा पर आधारित अभियान है।
हिंदूवादी संगठनों का तर्क है कि जब कुछ लोगों को इस्लाम या ईसाई बनाया जाता है, तो हल्ला नहीं मचता, पर दूसरे धर्म में चले गए लोगों की घर वापसी पर तथाकथित सेक्यूलर भारत एकजुट होकर निंदा करने पर उतर आता है। बल्कि राजेश्वर सिंह को महत्वहीन करने के बाद ये संगठन अब यह भी जताएंगे कि हिंदुत्व के उग्र तत्वों को सावधान कर दिया गया है। अगर संघ के अनुषांगिक संगठनों को ऐसा कोई संदेश दिया भी गया है, तो उसका अर्थ सिर्फ सतर्क रहना ही है। घर वापसी अभियान उसी तरह चलता रहेगा, जैसे पहले चलता आ रहा था। हां, इसमें बदलाव यही आया है कि इसे भाजपा का राजनीतिक समर्थन मिल गया है। इसके जारी रहने की संभावना का पता देश की बड़ी आबादी की सोच से भी चलता है, जो महसूस करती है कि मोदी सरकार को हिंदुत्व के एजेंडा पर बने रहना चाहिए-चाहे यह विकास के एजेंडा के साथ-साथ चले या पृथक रूप से। हाल में आए एक सर्वेक्षण के मुताबिक, 62 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि मोदी सरकार विकास को तवज्जो दें, 14 फीसदी लोगों का मानना है कि सरकार की प्राथमिकता में हिंदुत्व सबसे ऊपर होना चाहिए, जबकि 16 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि सरकार को अपने विकास कार्यक्रमों में हिंदुत्व को जोड़ना चाहिए। सर्वेक्षण के दौरान लोगों से एक और प्रश्न पूछा गया-क्या संघ के कट्टरवादी चेहरे सरकार के विकासवादी एजेंडा को पलीता लगा रहे हैं? 62 प्रतिशत लोगों ने इसका उत्तर 'हां' में दिया, 26 फीसदी लोगों ने इससे इन्कार किया, और 12 फीसदी लोगों का जवाब था, वे नहीं जानते। इस सर्वेक्षण से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ज्यादातर लोग सरकार के हिंदुत्व एजेंडा के पक्ष में नहीं हैं। पर जो तीस प्रतिशत लोग हिंदुत्व अभियान को जारी रखने की वकालत कर रहे हैं, क्या नरेंद्र मोदी उनकी अनदेखी कर पाएंगे? जाहिर है, मोदी सरकार हिंदुत्व और विकास के बीच संतुलन बनाकर चलेगी, पर राजनीतिक वजह से हिंदुत्व पर ज्यादा जोर देगी।
हिंदुत्व के झंडाबरदारों के घर वापसी अभियान के हल्ले से इतर एक दूसरी घर वापसी भी है, जो अगर इससे अधिक नहीं, तो बराबर का राजनीतिक महत्व रखती है। जनवरी, 2012 में जयपुर में आयोजित प्रवासी भारतीय सम्मेलन में नरेंद्र मोदी ने यह प्रस्ताव रखते हुए दूसरे सभी वक्ताओं को पीछे छोड़ दिया था कि दक्षिण अफ्रीका से गांधी जी की भारत वापसी के सौ वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में 2015 के प्रवासी भारतीय सम्मेलन की मेजबानी का दायित्व गुजरात को मिलना चाहिए। जब ज्यादातर लोग संदेह कर रहे थे कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का मुख्य चेहरा मोदी होंगे या नहीं, तब खुद मोदी ने यह इच्छा जताकर अपनी दूरदर्शिता का परिचय दिया था। प्रवासी भारतीय सम्मेलन इस बार गुजरात में हो रहा है। गांधी की घर वापसी को याद करते हुए साल भर कई कार्यक्रम किए जाएंगे। यह विद्रूप ही है कि सरकार एक तरफ तो महात्मा गांधी की प्रशंसा कर रही है, दूसरी ओर, नाथूराम गोडसे के मंदिर की नींव रखने का एक प्रस्ताव भी उसके पास है। यह सरकार के दोहरेपन का ही एक उदाहरण है।
सरकारी कार्यक्रमों और कर्मकांडी पोस्टरों के जरिये गांधी को याद करना पर्याप्त नहीं है। सिर्फ गांधी के अध्यात्म पर फोकस करते हुए हिंदुत्ववादी अभियान का औचित्य ठहराना तो और भी दुर्भाग्यपूर्ण होगा। धर्मांतरण के मौजूदा विवाद के बीच गांधी जी के शब्दों को याद करना चाहिए। उन्होंने कहा था, मैं उस 'धर्मांतरण के विरुद्ध हूं, जिसे हिंदू शुद्धि कहते हैं, मुस्लिम तबलीग और ईसाई धर्मांतरण।'
दक्षिण अफ्रीका में दो दशक बिताने के बाद सौ साल पहले गांधी ने जब भारत लौटने का फैसला किया था, तब वह महात्मा के नाम से नहीं जाने जाते थे। पर उन्होंने जो रास्ता चुना था, उसने उन्हें महात्मा बना दिया। भारत लौटने के बाद उन्होंने रेल के तीसरे दर्जे में बैठकर देश को देखा, नील मजदूरों का पक्ष लेकर संघर्ष शुरू किया, खिलाफत आंदोलन में कूदे और असहयोग आंदोलन के जरिये पहली बार औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध एक जनांदोलन को दिशा दी।
धर्म और अध्यात्म के मुद्दे पर कांग्रेस के दूसरे नेताओं से गांधी जी के मतभेद थे, इसके बावजूद उनके मानवतावादी रवैये ने ही अध्यात्मवाद की परिभाषा तय की। संघ परिवार सेक्यूलवाद के जनक के तौर पर जवाहरलाल नेहरू की आलोचना करते हैं। पर वह धर्मनिरपेक्षता की गांधी की समझ ही थी, जिसने नेहरू की सेक्यूलर सोच को मजबूती दी। नाथूराम गोडसे की पिस्तौल का निशाना बनने से पहले जनवरी, 1948 में गांधी सांप्रदायिक हिंसा के विरुद्ध उपवास पर थे। जब नेहरू सरकार पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने के लिए राजी हो गई, तभी गांधी ने अपना उपवास तोड़ा। उस अवसर पर विभिन्न धर्मों के सौ से भी अधिक नेताओं ने सांप्रदायिक हिंसा के खिलाफ प्रतिज्ञा पत्र पर दस्तखत किए थे। उन महात्मा गांधी की घर वापसी को याद करने का सबसे अच्छा तरीका तो यही होगा कि इस नाम से शुरू किए गए तमाम कार्यक्रम बंद किए जाएं।
-वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक