यही बात इस समय अमेरिका और ईरान को लेकर कही जा सकती है, जहां अमेरिका अपने युद्ध और उससे जुड़ी नीतियों के इतिहास को जानता, समझता और लिखता आया है। लेकिन यदि ट्रंप के नेतृत्व में वही अमेरिका इतिहास की गलतियों को दोहरा रहा हो, तो बात अजीब अवश्य लगेगी। अजीब इसलिए, क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच जो खेल चल रहा है, वह कभी-कभी दो कार्टून पात्रों टॉम एंड जेरी के झगड़े की तरह लगने लगता है। मजे की बात है कि दुनिया इस खेल को टकटकी लगाकर देख और झेल रही है। इससे भी बड़ा मजाक यह कि पाकिस्तान जैसे असफल और हाशिये पर पड़े देश में टॉम मध्यस्थता करने का हुनर देख लेता है। फिर, परिणाम कैसे होंगे? एक तरफ यह बताया जा रहा है कि अमेरिका और ईरान समझौते की पटरी पर आ चुके हैं। ऐसा प्रस्ताव तैयार हो चुका है, जिसमें 60 दिन का युद्धविराम, ईरान को 300 अरब डॉलर की आर्थिक मदद, ईरान में अमेरिकी कंपनियों को निवेश की अनुमति और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक आदि-आदि शामिल हैं। पर, ईरान के विदेश मंत्रालय की तरफ से तो कहा जा रहा है कि परमाणु कार्यक्रम पर कोई बातचीत ही नहीं हो रही।
ट्रंप होर्मुज स्ट्रेट में किसी तरह का टोल न लगने की घोषणा करते हैं, तो दूसरी तरफ ईरान की संसद इस पर अपना दावा मजबूत करने के लिए नया कानून लाने की तैयारी में है, ताकि टोल संबंधी फैसला सिर्फ ईरान और ओमान ले सकें। इसी बीच, यह खबर आ जाती है कि ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, क्योंकि उनके अनुसार ईरान की सत्ता पर अब पूरी तरह इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) के कमांडरों का कब्जा हो चुका है और दूसरी तरफ यह खबर कि अमेरिका ने ईरान की रडार-ड्रोन कंट्रोल साइट्स गोरुक और केश्म द्वीप पर हमला कर दिया है। हालांकि, आईआरजीसी ने भी जवाबी हमले में एयरबेस को निशाना बनाने का दावा किया है। अब आईआरजीसी अमेरिका को भरोसे लायक नहीं मानता और अमेरिका की नजर में ‘ईरानी रेजीम’ सबसे खराब। फिर डील किससे और कैसे?
फर्ज कीजिए कि युद्ध पूर्व की स्थिति बहाल हो जाए, समुद्री मार्ग फिर से खुल जाए, ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत सार्थक हो जाए, ऐसा शासन, जिसे सामरिक रूप से मजबूती मिली है, लेकिन सामरिक स्तर पर नुकसान भी हुआ है, फिर से वार्ता की मेज पर लौट आए, तो ? तो, दुनिया गहरी सांस लेगी और लोगों को आने वाले विकराल संकट से शायद जल्दी मुक्ति मिल जाएगी। पर, ये उम्मीदें तब बहुत दूर दिखने लगती हैं, जब आप ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ जैसी यूटोपियाई ग्रंथि के चलते इतिहास से मुंह मोड़ लेते हैं। इस भूल में आप न अपने प्रतिद्वंद्वी का आकलन कर पाते हैं और न उसके चरित्र व ताकत को पहचान पाते हैं। ट्रंप के साथ कुछ ऐसा ही हुआ है।
वैसे केवल ट्रंप को दोष देना शायद उचित न हो। यह रणनीतिक विफलता तो अमेरिका के हिस्से में आती रही है। दुश्मन की रक्षात्मक क्षमताओं और उसके प्रतिरोध के संकल्प को बहुत कम करके आंकना, जबकि अपनी आक्रामक शक्ति और युद्ध जारी रखने की क्षमता को ज्यादा मानना उसकी आदत में रहा है। तो, अब उसके पास विकल्प क्या हैं? सिर्फ नाकेबंदी और घेरेबंदी तक सीमित रहे अथवा फिर से युद्ध। संभव है कि दूसरे से अधिक निर्णायक परिणाम मिलें, लेकिन किस कीमत पर? यदि लक्ष्य समुद्री मार्गों को खोलना, ईरान को उसकी परमाणु क्षमताओं से वंचित करना और उसकी अवसंरचना को इतना नुकसान पहुंचाना होता कि वह भविष्य में खतरा न बने, तो लड़ाई का स्तर तथा तैयारी कुछ और होती। तब इसका स्वरूप सर्जिकल ऑपरेशन का नहीं होता, बल्कि ‘ऑल आउट वार’ का होता, वह भी ऐसे देश के खिलाफ, जिसकी आबादी इराक और अफगानिस्तान की संयुक्त आबादी से अधिक है और जिसका सैन्य तथा राजनीतिक नेतृत्व अंतिम व्यक्ति तक लड़ने के लिए तैयार है। लेकिन, अमेरिका ऐसा कर नहीं पाया। तो क्या अब कर पाएगा? शायद हां, पर ऐसी कीमत चुकाने के लिए अधिकांश अमेरिकी तैयार नहीं होंगे।
दरअसल, पिछले तीन दशक से अमेरिका अति-आत्मविश्वास और अत्यधिक सतर्कता के पेंडुलम-सी गति करता रहा है, जबकि अमेरिकी नेतृत्व दंभ और भय के बीच झूलता रहा है। इसकी शुरुआत 1991 से हुई, जब उसने कुवैत से इराकी सेना को बाहर निकालने में सफलता पाई। इसके बाद चाहे बिल क्लिंटन हों या जॉर्ज बुश जूनियर, बराक ओबामा हों या बाइडन, सभी के दंभ अफ्रीका से लेकर इराक तथा सीरिया से लेकर अफगानिस्तान तक उधड़ती हुई देखी गई। 2021 में अफगानिस्तान से अमेरिकी वापसी तो एक अव्यवस्थित त्रासदी थी। फिर भी, डोनाल्ड ट्रंप अनावश्यक युद्ध से नहीं बच पाए, जबकि वह अपनी (या घोस्ट राइटिंग) पुस्तक में ‘द आर्ट ऑफ द डील’ का सिद्धांत 1987 में ही पेश कर चुके हैं। इसलिए, जब उन्होंने चीख कर कहा-‘यू क्रेजी बास्टर्ड्स, ऑर यू विल बी लिविंग इन हेल’, तो लगा ट्रंप को अपनी ही किताब में लिखा हुआ समझ में नहीं आया। सच कहें तो, यह धमकी ट्रंप की हताशा से अधिक कुछ भी नहीं थी।
बहरहाल, ट्रंप समझौता और युद्ध के बीच बुरी तरह से फंस चुके हैं। अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों में जो उछाल आ रहा है, उससे कहीं ज्यादा ट्रंप की लोकप्रियता के आंकड़े फिसलते हुए नजर आ रहे हैं। ये ट्रंप की खीज और हताशा को बढ़ा रहे हैं। वह जिस समझौते का प्रयास कर रहे हैं, उसे उन्हीं का एक सीनेटर ‘विनाशकारी गलती’ कह रहा है, तो दूसरा चेतावनी दे रहा है कि यह ‘उस कागज के लायक भी नहीं है, जिस पर इसे लिखा जाएगा।’ इस फेहरिस्त में और भी नाम हैं। सुना है कि ट्रंप को युद्ध में धकेलने वाले इस्राइली प्रधानमंत्री समझौते वाली बात से नाखुश हैं। वह तो इस युद्ध को ईरानी ‘रेजीम’ को बदलने का अवसर मान रहे थे। जो भी हो, बात यहीं पर अटकी है कि फिर ‘आर्ट ऑफ द डील’ का असली उस्ताद कौन है? सौदेबाजी की असली ताकत किसके पास है?