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इस संघर्ष में कोई पूरी तरह अच्छा नहीं: ईरान निर्दोष नहीं, लेकिन अमेरिका-इस्राइल ज्यादा दोषी

रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 22 Mar 2026 06:47 AM IST

सार

ईरान अपने आंतरिक दमन और बाहरी हस्तक्षेप के कारण निर्दोष नहीं है, लेकिन इस्राइल और अमेरिका अधिक दोषी हैं, क्योंकि उनके पास कहीं अधिक विनाशकारी शक्तियां हैं। वे उनका इस्तेमाल भी करते हैं।
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पश्चिम एशिया संघर्ष - फोटो : ANI


पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष पर मुझे प्रोफेसर बेतेे की यह बात याद आई। इस संघर्ष में एक ओर अमेरिका और इस्राइल हैं, तो दूसरी तरफ ईरान। युद्ध की दिशा और स्वरूप को तय करने में इन देशों के नेताओं के व्यक्तित्व की भूमिका अहम रही है। पहले उस नेता की बात करते हैं, जो अब जीवित नहीं हैं-अली खामेनेई। ईरान के सुप्रीम लीडर ने बमबारी होने पर छिपने की जगह साहस दिखाया और मृत्यु को स्वीकार किया। उनके साहस को (जबकि उनके दुश्मन शक्तिशाली और कपटी थे), कुछ वामपंथी बुद्धिजीवी साम्राज्यवाद-विरोधी नायक के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। उनकी मृत्यु का तरीका उनके जीवन और उनके शासन के स्वरूप को नहीं ढक सकता।


ईरान के सर्वोच्च नेता के रूप में खामेनेई के सामने तीन विकल्प थे। पहला, अपने लोगों की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं को स्वीकार करना-धार्मिक वर्ग को धीरे-धीरे राजनीति से अलग करना और एक अधिक स्वतंत्र समाज का निर्माण करना। इसमें महिलाओं की समानता पर भी जोर देना चाहिए था-उन पर थोपे गए दमनकारी पहनावे के नियमों को हटाकर उन्हें देश के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन में भागीदारी का मौका देना चाहिए था।


ओमान, कतर और विशेष रूप से सऊदी अरब जैसे खाड़ी देशों की तरह ईरान के पास भी प्रचुर मात्रा में तेल संसाधन हैं, लेकिन उनसे अलग, ईरान के पास एक ज्यादा शिक्षित जनसंख्या, उद्यमशीलता और वैज्ञानिक अनुसंधान की समृद्ध परंपरा रही है, तथा 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले शिक्षा और नौकरी में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी रही है। इसके अलावा, ईरान की सांस्कृतिक विरासत खाड़ी देशों की तुलना में कहीं अधिक समृद्ध है-जहां महान दार्शनिक, कवि और संगीतकार हुए। खामेनेई इस विरासत से अच्छे से परिचित थे और इसका उपयोग करके एक बेहतर और आत्मनिर्भर ईरान बना सकते थे।


लोकतंत्र के साथ आर्थिक विकास का रास्ता, खामेनेई अपना सकते थे। दूसरा मार्ग था, लोकतंत्र के बिना आर्थिक प्रगति (सिंगापुर मॉडल) का, लेकिन उन्होंने तीसरा मार्ग देश के भीतर दमन और विदेशों में लापरवाह विस्तारवाद का चुना। लेबनान और यमन में सशस्त्र समूहों का समर्थन तथा सीरिया में बशर-अल-असाद की कठोर सरकार को सैन्य सहायता देना, इन सबने उन देशों को बुरी तरह तबाह करने में भूमिका निभाई। खामेनेई के नेतृत्व में ईरान ने खुद को इस्लामी दुनिया का नेता घोषित किया और इस्राइल के प्रति गहरी शत्रुता जाहिर की। अपने सहयोगी हिजबुल्लाह के माध्यम से बार-बार हमले करता रहा। तेहरान में वर्षों से ‘इस्राइल मुर्दाबाद’ और ‘अमेरिका मुर्दाबाद’ जैसे नारे आम हो गए हैं।


इस्राइल के लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे बेंजामिन नेतन्याहू की बात की जाए, तो वह खामेनेई की तरह ही कट्टर विचारधारा वाले, बल्कि उससे भी अधिक कठोर कहे जा सकते हैं। उनका सख्त जियोनिज्म उनके पारिवारिक परिवेश से आता है-उनके पिता एक प्रसिद्ध दक्षिणपंथी इतिहासकार थे और उनके भाई 1976 में एंटेबे हवाई अड्डे पर बंधकों को बचाते हुए मारे गए थे। अपने लंबे कार्यकाल में नेतन्याहू ने व्यवस्थित रूप से फलस्तीनी राज्य बनने की संभावना को कमजोर किया, वेस्ट बैंक में अवैध बस्तियों का व्यापक विस्तार किया। फलस्तीन के प्रति उनकी नफरत इतनी ज्यादा थी कि एक दौर में उन्होंने कमजोर करने के लिए हमास को भी बढ़ावा दिया।


अक्तूबर, 2023 में हमास के हमले के बाद उन्होंने सख्त प्रतिक्रिया दी। गाजा पर बड़ा सैन्य हमला किया, जिसमें हजारों नागरिक मारे गए और लाखों लोग बेघर हो गए। हमले की वजह से अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने उन्हें युद्ध अपराधी घोषित किया है। नेतन्याहू और उनका परिवार विलासिता पसंद है और उन पर व्यापारियों से महंगे उपहार लेने के आरोप लगे हैं। संभव है कि लगातार युद्ध में जुटे रहना आंशिक रूप से उन पर चल रहे भ्रष्टाचार के मामलों से बचने का प्रयास हो। सत्ता में बने रहने और न्याय से बचने के लिए उन्हें अमेरिका के राष्ट्रपतियों का समर्थन मिलता रहा है, जिन्होंने उनके कामों और फलस्तीन के स्वतंत्र राज्य की संभावना को नष्ट करने के प्रयासों को अनदेखा किया। सभी राजनीतिक नेता सत्ता प्राप्त करना और बनाए रखना चाहते हैं, लेकिन खामेनेई और नेतन्याहू के मामले में विचारधारा भी महत्वपूर्ण रही-पहले के लिए इस्लामी धर्मतंत्र और दूसरे के लिए जियोनिस्ट विस्तारवाद। तीसरे प्रमुख व्यक्ति डोनाल्ड ट्रंप की बात करें, तो वह भी सत्ता से प्रेरित हैं, लेकिन उनके पास कोई स्पष्ट विचारधारा है या नहीं, यह कहना कठिन है। वे स्वयं को धार्मिक ईसाई बताते हैं, लेकिन उनके निजी जीवन में नैतिक मूल्यों का पालन नहीं दिखता।
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2000 से 2009 तक डेमोक्रेट रहे ट्रंप बाद में रिपब्लिकन बनकर राष्ट्रपति बने। उन्होंने युद्ध-विरोधी मंच पर सत्ता में वापसी की, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने नाइजीरिया, सोमालिया और वेनेजुएला पर हमले किए और ईरान के खिलाफ बड़े सैन्य अभियान चलाए-जबकि ये देश अमेरिका के लिए प्रत्यक्ष खतरा नहीं थे।


इस तरह ट्रंप विचारधारा से अधिक अवसरवाद से प्रेरित हैं। उनके निर्णयों के पीछे अहंकार और लालच प्रमुख प्रेरक शक्तियां हैं। ईरान पर हमले के पीछे कोई स्पष्ट, तर्कसंगत कारण दिखाई नहीं देता। उनके दिए गए कारण भी आपस में विरोधाभासी रहे हैं। उनके असली उद्देश्य क्या थे-इस पर कई अटकलें हैं : शायद वह बराक ओबामा द्वारा ओसामा बिन लादेन को मार गिराने से आगे निकलना चाहते थे या गाजा में ‘रिवेरा’ (पर्यटन क्षेत्र) बनाने जैसे आर्थिक स्वार्थ, या फिर केवल सैन्य शक्ति के प्रदर्शन का आनंद या ईरान के तेल संसाधनों पर कब्जा करना। कारण जो भी हो, लालच या क्रूर जिज्ञासा-ईरान पर हमलों ने भारी मानवीय त्रासदी पैदा की। हजारों लोग मारे गए, लाखों बेघर हुए। वहीं इस्राइल की बमबारी से लेबनान में भी बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए हैं। इससे न केवल क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ी, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी संकट की स्थिति पैदा हो गई। इस संघर्ष में कोई भी पक्ष पूरी तरह अच्छा नहीं है। ईरान, इस्राइल और अमेरिका-तीनों के नेता हिंसा का सहारा लेने में संकोच नहीं करते। फिर भी उन्हें समान रूप से दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि उनकी शक्ति और विनाश की क्षमता समान नहीं है। ईरान अपने आंतरिक दमन और बाहरी हस्तक्षेप के कारण निर्दोष नहीं है, लेकिन नेतन्याहू का इस्राइल और ट्रंप का अमेरिका अधिक दोषी हैं, क्योंकि उनके पास कहीं अधिक विनाशकारी शक्ति है और वे उसका इस्तेमाल भी करते हैं।
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