भारत करीब 83 फीसदी एलपीजी और 56 फीसदी एलएनजी का आयात होर्मुज मार्ग से करता है। भारत अपने कुल एलपीजी आयात का अधिकतर हिस्सा पश्चिम एशिया से प्राप्त करता है। उल्लेखनीय है कि देश में करीब 33 करोड़ लोग अब भी एलपीजी इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में, तेल कंपनियों द्वारा घरेलू व वाणिज्यिक गैस सिलिंडर की कीमतों में बढ़ोतरी से अब वैश्विक संघर्ष का असर घर की रसोई तक पहुंचना चिंताजनक है। गौरतलब है कि भारत में पिछले करीब चार वर्षों से पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं। लेकिन, फिलहाल जो स्थितियां बन रही हैं, उनसे जाहिर है कि भारत के लिए तेल की कीमत से कहीं अधिक महत्वपूर्ण सवाल तेल की निरंतर आपूर्ति का भी है।
कुछ ही दिन पहले अमेरिका की ओर से कहा गया कि भारत को अगले 30 दिनों के लिए रूस से तेल खरीदने की छूट दी जा रही है, जबकि सच तो यह है कि भारत पहले से ही रूस से तेल खरीद रहा था। केंद्रीय पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्री का यह आश्वासन महत्वपूर्ण है कि भारत होर्मुज जलडमरूमध्य के अलावा अन्य मार्गों से भी कच्चे तेल का आयात करता है, इसलिए फिलहाल आपूर्ति पर संकट नहीं है। कतर, जिससे भारत अपने कुल एलएनजी आयात का 40 फीसदी हिस्सा प्राप्त करता है, द्वारा एलएनजी उत्पादन रोके जाने और पश्चिम एशिया का संकट जल्दी खत्म न होने की सूरत में भारत को तात्कालिक तौर पर ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे दूसरे एलएनजी निर्यातकों पर ध्यान देना चाहिए। लेकिन दीर्घकाल में हमें बायो गैस उत्पादन पर भी ध्यान देना होगा।
इस क्षेत्र में भारत के लिए इतनी संभावनाएं हैं कि वह गैस की अपनी कुल जरूरत को कृषि व शहरी कचरे से ही प्राप्त कर सकता है। पश्चिम एशिया की अस्थिरता ने दुनिया को फिर याद दिलाया है कि ऊर्जा केवल ईंधन नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा का आधार भी है। भारत अगर इस संकट को अवसर में बदलते हुए दीर्घकालिक ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में ठोस कदम उठाता है, तो भविष्य के ऐसे झटकों का असर काफी हद तक सीमित किया जा सकता है।