फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

राजनीति का खूंटा

Sun, 08 Feb 2015 06:42 PM IST
मूलचंद गौतम
विज्ञापन
विज्ञापन
इधर-उधर घूमते जानवर और आदमी में बड़ा फर्क होता है। द्वार-द्वार घूमने वाले की कोई इज्जत समाज में नहीं होती। इसीलिए लोग संघ, दल, गिरोह और अखाड़े में रहने को प्राथमिकता देते हैं, खासकर कलियुग में। पहले के युगों में अकेले दम पर भी काफी काम किया जा सकता था, लेकिन कलिकाल में यह नितांत असंभव है। वैसे भी मनुष्य एक सामाजिक जानवर/प्राणी है।
विज्ञापन


यही सोचकर अपुन ने खुद ही मर्जी से एक खूंटा चुन लिया है, ताकि द्वार-द्वार भटकना न पड़े और यह नसीहत न सुननी पड़े-अच्छा खासा मुस्टंडा है, मेहनत क्यों नहीं करता? बाबा तुलसीदास भी इस तरह के अपमानों से आजिज आकर अंत में 'राम नाम' के खूंटे से बंध गए थे। कुछ लोग खूंटा देखकर नाक-भौं सिकोड़ते हैं। वे खूंटों से बंध जाने वाले लोगों को अवसरवादी भी कहते हैं। बकने वाले बकते रहें, नसीब हमारे साथ है। अपने प्रधानमंत्री का भी यही मानना है कि नसीब साथ है, तो कौन क्या बिगाड़ लेगा?

कहा जाता है कि जिसका खूंटा मजबूत होता है, उसी का जुगाड़ और पौवा फिट होता है। वर्ना अकेले आदमी को कौन पूछे? हमारे गांव में एक मुंशी जी थे। उनका खूंटा बहुत मजबूत था। जाने कितने भोले-भाले किसानों की जमीनें उन्होंने कौड़ियों के भाव अपने और कुनबे के लोगों के नाम करा ली थीं। एक सिरफिरे पढ़े-लिखे ने उनके खिलाफ पुलिस-कचहरी में जाने की हिम्मत की थी, तो मुंशी जी ने मरते वक्त ऐसा काम किया कि सिर्फ उस सिरफिरे को ही नहीं, उसके पूरे कुनबे को जेल में ठुंसवा दिया। मजूबत खूंटा के कारण ही सत्ता से दूर छिटके मतंग सिहों की गिरफ्तारियां रोकने की कवायद होती हैं, यह अलग बात है कि इस मामले में खूंटे को ही उखड़ जाना पड़ा।
विज्ञापन


आवारा और दमदार जानवर, और आदमी भी, कभी-कभार जोर-आजमाइश में खूंटा उखाड़कर भागने की फिराक में रहते हैं। वैसे में मालिक उनके गले में रस्सी और सांकल के साथ चारपाई का एक पाया बांध देते हैं। राजनीति की भाषा में उसे सीबीआई कहते हैं। भागकर जाओगे कहां?
विज्ञापन

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें