अपने देश में मतदान कराने की प्रक्रिया बेहद जटिल, उबाऊ, कष्टसाध्य, यातनापूर्ण और खर्चीली है। यातना ऐसी कि जान पर बन आए। यह अकारण नहीं है कि इस बार भी कई कर्मचारियों की मृत्यु चुनाव कार्य के दौरान दिल का दौरा पड़ने से हुई। नक्सली हमले में जो कर्मचारी मारे गए, वह दूसरी त्रासदी है। इस अकाल मृत्यु में पीठासीन अधिकारी, सेक्टर मजिस्ट्रेट से लेकर जिलाधिकारी तक शामिल रहे। गर्मी की तपिश की बात न भी की जाए, तो भी पूरे देश में मतदान की पूरी प्रक्रिया संपन्न कराने में शासन, प्रशासन और आम नागरिकों को तमाम मुश्किलों से गुजरना पड़ता है। स्कूलों में पठन-पाठन प्रभावित होता है। अक्सर हम आम नागरिकों की परेशानियों को नजर अंदाज कर जाते हैं, पर जब शादियों के मौसम में वाहन जब्त कर लिए जाते हैं, तब शादी-ब्याह और कहीं आने-जाने में भी परेशानी हो जाती है। परिवहन निगम की बसों से लेकर टैक्सी वाहनों तक का चुनाव में इस्तेमाल किए जाने से लोगों के पास रेल सेवा के अलावा अन्य विकल्प नहीं बचता।
सुरक्षा बलों की तैनाती कितनी कष्टसाध्य होती है, इसे करीब से देखकर ही महसूस किया जा सकता है। आदर्श आचार संहिता के कारण चुनाव के दौरान तमाम विकास कार्य ठप हो जाते हैं। लगभग दो माह तक सरकारी दफ्तरों में सिर्फ चुनाव संबंधी कार्य ही होते हैं। लाखों सरकारी कर्मचारियों की चुनाव-कार्यों में तैनाती से कार्यदिवस का जो नुकसान होता है, सो अलग। व्यापार, पर्यटन, खेती-किसानी और चिकित्सा सेवाएं तक प्रभावित होती हैं। पुलिस बलों के चुनाव कार्य में लग जाने से अपराध बढ़ते हैं। अपराधों की विवेचना प्रभावित होती है। सिर्फ राजनीतिक दलों द्वारा ही नहीं, सरकार की ओर से भी चुनाव पर काफी खर्च किया जाता है। प्रथम लोकसभा चुनाव में महज 10.45 करोड़ ही खर्च हुए थे, लेकिन अब मतदाताओं और उम्मीदवारों की संख्या में बढ़ोतरी के साथ ही चुनाव पर होने वाले सरकारी खर्च में भी तेजी से वृद्धि हुई है। हमारे यहां बढ़ता चुनावी खर्च इसलिए भी चिंता का विषय होना चाहिए कि यह अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में होने वाले खर्च से होड़ लेता दिख रहा है।
बेशक दुनिया के दूसरे मुल्कों में भी चुनाव कराना खर्चीला होता है, पर अपने देश में चुनाव प्रक्रिया बेहद दुरूह होती जा रही है। इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल से गणना जैसी दुरूह प्रक्रिया से जिस तरह हमने निजात पाई है, उसी प्रकार पूरी मतदान प्रक्रिया को सामान्य प्रशासनिक कामकाज के तहत कराने पर भी विचार होना चाहिए। आधार कार्ड निर्माण के साथ ही देश में बायोमीट्रिक पहचान की प्रक्रिया शुरू हो गई है। अब व्यक्ति की पहचान केवल चेहरे से ही नहीं, उसकी आंख और अंगूठे के निशान से भी की जा सकती है और फर्जीवाड़े को आसानी से कंप्यूटर के जरिये पकड़ा जा सकता है। वीडियो रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल करते हुए कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को एक साथ जिला, तहसील या पुलिस मुख्यालयों में स्थापित कर और उनमें मतदाताओं के बायोमीट्रिक्स पहचान संरक्षित कर अंगूठे के निशान से मतदान के लिए सॉफ्टवेयर तैयार किया जा सकता है।
अशिक्षित ग्रामीण जनता को बायोमीट्रिक्स पहचान केंद्रों या इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों तक लाने में कुछ कठिनाइयां जरूर आ सकती हैं, लेकिन आम लोगों में शिक्षा एवं राजनीतिक जागरूकता फैलाकर इसका समाधान निकाला जा सकता है। ऐसा अभियान दूसरी योजनाओं के लिए भी लाभकारी होगा। देश का करोड़ों रुपया, जो चुनाव के दौरान खर्च हो रहा है, घूम-फिर कर पूंजीपतियों की जेबों में ही जा रहा है। नतीजतन आम जनता के हित में विकास के लिए धन की कमी हो रही है। ऐसे में इस खर्चीली मतदान प्रक्रिया के वैकल्पिक तरीकों पर विचार करना वक्त की जरूरत है।