सब एकजुट हैं। कैसा अदभुत भाईचारा है! कुछ ही अवसर तो ऐसे आते हैं, जब राजनेताओं के आपसी वैमनस्य मिट जाते हैं। तब वे लोग एक तान में गाते हैं, हम होंगे कामयाब। वे वाकई सफल हैं, क्योंकि उन्हें मिल-जुलकर अपना हित साधना आता है। ऐसे ही मौकों पर वामपंथ-दक्षिणपंथ, दोनों के बीच गलबहियों की ‘ऐतिहासिक अक्लमंदी’ का सुबूत दिख जाता है। यही वक्त होता है, जब तमाम धर्मनिरपेक्ष ताकतें सांप्रदायिक शक्तियों के साथ मिलकर राजनीतिक समझ की नई परिभाषा गढ़ती हैं।
ऐसे दुर्लभ अवसर राजनीति में आजकल आए दिन आते ही रहते हैं। इस बार सारे रहबर एकजुट हुए कि उन्हें सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखा जाए। सभी एकमत हैं कि यदि उन्हें इससे बांधकर रखा गया, तो वे जनसेवा करते हुए अपनी चाहतों की उड़ान कैसे भरेंगे। देखिए, अनुशासन केवल दफ्तर के निचले स्तर के मुलाजिमों के लिए होता है। रचनात्मकता हमेशा अराजकता के मध्य फलती-फूलती है। हमारे नेता कितने प्रतिभावान कलाकार हैं, यह बात अब किसी से छिपी नहीं है। इनमें से कुछ तो इतने प्रतिभावान हैं कि उनका होना देश भर के कॉमेडियनों के लिए हमेशा चुनौती बना रहता है।
सारे सियासी दलों का कहना है कि वे तो देश सेवा का नो प्राफिट-नो लॉस वाला कारोबार करते हैं। उनके सारे ऑफिस इतने पारदर्शी हैं कि जब-तब ऐसी चीजें भी सामने आ जाती हैं, जो नहीं आनी चाहिए।। वैसे भी उनके पास जनता की मांगों के विस्तृत ब्योरे और सम्यक आश्वासनों के अलावा रहता क्या है। वे केवल सपने बांटने का काम ही तो करते हैं। ऐसे में उनसे सूचना अधिकार के दायरे में आने की उम्मीद करने का मतलब नहीं है।
जो लोग चुनाव में आठ करोड़ खर्च कर आठ लाख भी नहीं बताते, जो संसद में सवाल पूछने का भी पैसा लेते हैं, जो अपने निर्वाचन क्षेत्र में एक लाख खर्च कर एक करोड़ का प्रचार करते हैं, उनको पारदर्शिता के दायरे में बांधने की बात सोचना भी असंभव है। जो लोग कानून बनाते हैं, उन्हें कानून के दायरे में आने के लिए आप कह रहे हैं। यह भी नहीं समझते कि कानून बनाने वालों को बचने की पतली गली मालूम होगी ही।
आप कितने मूर्ख हैं, जो मानते हैं कि राजनीतिक दल चौबीसों घंटे एक-दूसरे के खिलाफ लड़ते रहते हैं। हां, संसद में फिलहाल वे चीख-पुकार जरूर रहे हैं। लेकिन अगली बार वेतन-भत्ता बढ़ाने के मुद्दे पर उन्हें फिर से गलबहियां डाले बैठे देख सकते हैं।