इस बार भी वही हुआ, जो हर बार होता है। हमला पाकिस्तान ने किया हम पर और भारत सरकार के मंत्री ऐसे पेश आए, जैसे किसी पर दोष लगाने की हिम्मत ही न थी उनमें। इस बार तो हमारे रक्षा मंत्री ने ऐसा बयान दिया, जो अगर बतौर पाकिस्तान के रक्षा मंत्री देते, तो बात समझ में आती।
उन्होंने यह कहा, बिना जांच करवाए, कि हमलावर आतंकवादी थे, जिनके साथ कुछ ऐसे लोग थे, जो पाकिस्तानी सेना की वर्दियों में थे, यानी पाकिस्तानी सेना का इस हमले में हाथ नहीं था। जब देश भर में हल्ला हुआ, तो उन्होंने अपना बयान बदल तो डाला, पर जो मिट्टी पलीद होनी थी भारत की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, हो चुकी थी।
नुकसान यहां तक हुआ कि इमरान खान जैसे पाकिस्तानी राजनेताओं के बयान आने शुरू हो गए कि भारत सरकार को माफी मांगनी चाहिए पाकिस्तान से, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत किसी देश के दूतावास पर हमला करना उस देश पर हमला माना जाता है। हुआ क्या? दिल्ली में कांग्रेस के कुछ युवाओं ने पाकिस्तानी दूतावास के बाहर प्रदर्शन किए। बात सिर्फ इमरान खान के इस बयान की होती, तो कोई बात न थी।
भारत के रक्षा मंत्री की बहकी हुई बातों का असर वाशिंगटन तक पहुंचा। पाकिस्तानी अखबारों के मुताबिक, अमेरिका ने नियंत्रण रेखा पर हुई इस घटना को लेकर किसी को दोषी नहीं ठहराया है। यानी हमारे रक्षा मंत्री ने उन पांच शहीद हुए बहादुर भारतीय जवानों की स्मृति की बेअदबी की ऐसा बयान देकर।
वह नहीं समझ पाए हैं अभी तक कि भारतीय उपमहाद्वीप में खेल क्या खेला जा रहा है और कितने खतरे में हैं भारत के हित। सुनिए। अगले वर्ष अमेरिका सैनिकों को अफगानिस्तान से वापस बुलाने का ऐलान कर चुका है। इसे ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान तैयारी कर रहा है कि काबुल में ऐसी सरकार बने, जो पाकिस्तानी सेना के काबू में हो। वैसे ही जैसे नब्बे के दशक में तालिबान सरकार थी, जिनकी मदद उन जेहादियों को मिली, जिनको भारत सरकार ने रिहा किया 1999 में आईसी, 814 के यात्रियों के बदले। याद कीजिए कि ओसामा बिन लादेन और उनके साथी भी उस तालिबान सरकार के आदरणीय मेहमान थे।
पाकिस्तान के अफगान खेल में यदि कोई रुकावट है, तो वह है भारत की पुरानी दोस्ती अफगानिस्तान से, जिसको कायम रखने के लिए भारत सरकार ने पिछले दशक में करोड़ों रुपये का निवेश किया है वहां की सड़कों, अस्पतालों, स्कूलों और अन्य सामाजिक कार्यों में। इन कार्यों को पाकिस्तान के सेनाधिकारी शक की नजरों से देखते हैं और इनको खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं। हाल ही में जलालाबाद में भारतीय वाणिज्य दूतावास पर हुआ हमला इसी कोशिश का हिस्सा था।
आंकड़े बताते हैं कि 2003 से लेकर भारतीय दूतावासों पर, भारतीय संस्थानों पर अफगानिस्तान में 13 हमले हुए हैं, जिनमें 103 लोग मारे गए हैं। अक्सर इन घटनाओं में पाया गया है लश्कर-ए-ताइबा जैसी जेहादी तंजीमों का हाथ और आईएसआई की पूरी मदद। ये बिल्कुल वही संस्थान, वही लोग हैं, जिन्होंने बार-बार भारत के अंदर आतंकवादी हमले किए हैं। यह कोई राज की बात नहीं है। सवाल यह है कि भारत सरकार ने देश को इन जेहादियों से बचाने के लिए क्या कदम उठाए हैं। इसके जवाब दो शब्दों में हैं ः कुछ नहीं।
जेहादी आतंकवाद 21वीं सदी का सबसे भयानक युद्ध है। पाकिस्तान इस जेहाद का सबसे बड़ा केंद्र है, सो भारत पर जितने हमले हुए हैं जेहादी किस्म के, किसी और देश में नहीं हुए होंगे, लेकिन हमारे रक्षकों ने इस नए युद्ध को जीतने की कोई तैयारी नहीं की है। की होती, तो रक्षा मंत्री कम से कम ऐसे बयान देते इस नए हमले के बाद, जिससे साबित होता कि वह समझते हैं अच्छी तरह कि इस हमले के पीछे क्या है। ऐसा नहीं हुआ।
रक्षा मंत्री ए के एंटनी का बयान वैसा था, जैसा गृह मंत्री ने दिया था कुछ महीने पहले, जब चीनी सैनिक लद्दाख में दाखिल हुए थे। उस समय सुशील कुमार शिंदे ने मुस्करा कर कहा था, ऐसा तो होता रहता है, कभी वे इधर आ जाते हैं, कभी हमारे सैनिक उधर चले जाते हैं। विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने उस चीनी घुसपैठ की तुलना सुंदर चेहरे पर छोटी-सी फुंसी के साथ की थी। इन तीनों वक्तव्यों के हाथों में है, दोस्तो, अपने बदनसीब देश की सुरक्षा की तमाम जिम्मेदारी।