फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

हम लोग जरा देर से बाजार में आए

Mon, 18 Mar 2013 11:04 AM IST
परवेज आलम
विज्ञापन
विज्ञापन
दृश्य 1- एक 13 वर्षीय लड़की स्कूल से घर लौटते हुए गायब हो जाती है, बाद में पुलिस को उसका शव मिलता है। खबर सनसनीखेज है। हर अखबार एक्सक्लूसिव के जुगाड़ में लग जाता है। फिर पता चलता है कि एक रिपोर्टर महाशय तो बच्ची के गुमशुदा होते ही उसके फोन की हैकिंग कर उसकी वॉयस मेल सुनने में लग गए थे। जब आम जनता को पता चलता है कि अखबार वाले खबरों की तलाश में एक से एक घटिया हरकत कर गुजरते हैं, तो पूरे मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिह्न लग जाता है।
विज्ञापन


कुछ और लोग हिम्मत करके आगे आते हैं, जिनमें हॉलीवुड के स्टार भी हैं और राजनेता भी, और यह बताते हैं कि किस तरह उनको मीडिया ने परेशान किया है। दबाव में आकर सरकार एक वरिष्ठ जज लॉर्ड लेविसन की अध्यक्षता में व्यापक जांच का आदेश देती है। उनके सामने सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि क्या ब्रिटेन का प्रेस नैतिकता की सीमा लांघ चुका है? इस तरह शुरुआत हुई ब्रिटेन में लेविसन इनकॉयरी की, जिसकी रिपोर्ट अभी 29 नवंबर को प्रकाशित होते ही जबरदस्त बहस छिड़ गई है कि क्या प्रेस के लिए एक आचार संहिता की आवश्यकता है, और अगर है तो फिर प्रेस की मनमानी पर किस तरह अंकुश लगाया जाए।

दृश्य 2- एक उद्योगपति देश के एक बड़े टीवी चैनल के संपादकों पर आरोप लगाते हैं कि वे उनसे 100 करोड़ रुपये लेकर उनकी अच्छी छवि दिखाने का सौदा करना चाहते थे। यही नहीं, उद्योगपति ने इस प्रकरण की गुप्त रूप से पूरी फिल्मिंग भी कर ली थी। पुलिस हरकत में आई और टीवी चैनल के संपादकों को गिरफ्तार कर लिया। मामला अदालत के सामने है। चैनल के मालिकों ने गिरफ्तारी के डर से अग्रिम जमानत ले ली है।
विज्ञापन


दृश्य 3-  देश का एक बड़ा अखबार रिपोर्ट छापता है कि एक राज्य में कई बड़े-छोटे टीवी चैनल सरकार से करोड़ों रुपये लेकर खबर के नाम पर सरकारी प्रोपेगंडा प्रसारित कर रहे हैं। मजे की बात यह कि सारी सौदेबाजी कागज पर है। इसी को कहते हैं पेड न्यूज़! जाहिर है, पढ़ने वाले समझ ही गए होंगे कि दृश्य 2 और 3 भारत के हैं। तीनों घटनाएं इस बात की पुष्टि करती हैं कि मीडिया लंदन का हो या दिल्ली का, और या फिर किसी राज्य का, दाल में कुछ काला जरूर है। पूरी ही दाल काली है, ऐसा मैं नहीं मानता।

भारत में मीडिया की कथित ज्यादतियों की चर्चा से पहले ब्रिटेन की बात खत्म कर लेते हैं, जहां लेविसन इनकॉयरी के दौरान लगभग 300 लोगों ने जज के सामने हाजिर होकर गवाही दी, जिनमें दो पूर्व प्रधानमंत्री और वर्तमान प्रधानमंत्री भी शामिल हैं। लगभग 300 हलफनामे दाखिल किए गए और महीनों कार्यवाही चली। और यह इसलिए मुमकिन हुआ, क्योंकि आम जनता में मीडिया की हरकतों के खिलाफ गुस्सा था। मीडिया की इन्हीं हरकतों की वजह से मीडिया मुगल कहलाने वाले रूपर्ट मर्डोक को अपना अखबार न्यूज ऑफ द वर्ल्ड हमेशा के लिए बंद करना पड़ा। 13 वर्षीय बच्ची के फोन की हैकिंग का मामला इसी अखबार का 'कारनामा' था।

ब्रिटेन में जब-जब अखबारों की आचार संहिता बनाने या उन्हें रेगुलेट करने की बात उठी है, तब-तब पत्रकारों ने ऐसी मांगों के खिलाफ यह कहकर आवाज उठाई है कि प्रेस को अगर सरकार या बाहर की किसी एजेंसी ने रेगुलेट करने की बात भी की तो वह प्रेस की आजादी पर हमला समझा जाएगा। पत्रकार सहमत हैं कि हम खुद को रेगुलेट कर लेंगे। लॉर्ड लेविसन की रिपोर्ट कहती है कि प्रेस की खुद को रेगुलेट करने की कोशिश बुरी तरह नाकाम हुई है।

अब समय आ गया है कि ऐसी संस्था बने, जो हो तो बिलकुल गैरसरकारी, लेकिन उसके पास  कुछ कानूनी अधिकार भी होने चाहिए, ताकि वह टेढ़ी चाल चलने वाले अखबारों की नकेल थामकर उन्हें सही रास्ते पर ला सके। यहां बार-बार बात अखबारों की इसलिए हो रही है, क्योंकि ब्रिटेन के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया यानी रेडियो, टीवी आदि को  रेगुलेट करने के लिए एक अलग संस्था है 'ऑफकॉम' जिसके पास गलत ढंग से काम करने वाले टीवी चैनल्स पर जुर्माना लगाने के अलावा उनको नियंत्रित करने के भी व्यापक अधिकार हैं, लेकिन अखबारों पर नजर रखने वाली संस्था 'प्रेस कम्प्लेंट्स कमीशन' अधिकार न होने के कारण बिलकुल निकम्मी साबित हुई है।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन का कहना है कि वह लेविसन की सिफारिशों पर सरकार की ओर से कोई हस्तक्षेप नहीं चाहते, लेकिन खुद उनकी ही गठबंधन सरकार में शामिल 'लिबरल डेमोक्रेट्स ' के नेता निक क्लेग प्रेस को रेगुलेट करने के लिए संसद से कानूनी अधिकार दिलवाने के पक्ष में हैं। यही नहीं, ब्रिटेन का प्रमुख विपक्ष 'लेबर पार्टी' भी 'लिबरल डेमोक्रेट्स ' के साथ है। और तो और खुद मीडिया भी विभाजित है।

ब्रिटेन के परिप्रेक्ष्य और संदर्भ से हमें भारत में बहुत से इशारे मिल सकते हैं। पहली बात तो यह कि या तो खुद को प्रभावशाली ढंग से रेगुलेट करो या फिर इस बात के लिए तैयार हो जाओ कि सरकार आपको नियंत्रित करने के लिए कदम उठाए। भारत में बड़ी समस्या है इलेक्ट्रॉनिक मीडिया यानी प्राइवेट टीवी चैनल्स आदि, जो दिन-ब-दिन सवालों के घेरों में आ रहे हैं। एक आम आरोप टीवी चैनल्स पर यह भी है कि वह खुद ही वकील हैं, खुद ही मुंसिफ और बिना किसी को सफाई का मौका दिए फैसला भी सुना देते हैं। हर कोई दुखी नज़र आता है।

अभी बीते शनिवार दूरदर्शन के एक कार्यक्रम में मेरे साथ सभी मीडिया विशेषज्ञों ने स्वीकार किया कि भारतीय मीडिया पर जिस तरह के आरोप लग रहे हैं, उससे उसकी विश्वसनीयता पर वास्तव में गंभीर सवालिया निशान लग गए हैं- विशेष रूप से समाचार चैनल्स पर, और उसको खुद ही अपना घर ठीक कर लेना चाहिए। वरना जनता के दबाव में सरकार का हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाएगा, जो जाहिर है किसी को भी अच्छा नहीं लगेगा।

विशेषज्ञों का यह भी कहना था की भारत में भी अब लेविसन जैसी जांच कराने का समय आ गया है। सच यह है कि जनता के सब्र का पैमाना लबरेज हो चुका है, बस छलकना ही चाहता है। भारत के मीडिया ने आम तौर पर बहुत हिम्मत दिखाई है और जुझारू तरीके से काम किया है, लेकिन यह सच है कि कुछ गंदी मछलियां पूरे तालाब को गंदा करने पर आमादा हैं- जो न पत्रकार चाहते हैं और न मीडिया संस्थाएं। पत्रकार इस बात से बिलकुल खुश नहीं हैं कि उन्हें अपना जमीर बेचने पर मजबूर किया जाए। वे परेशान हैं और नहीं चाहते कि उन्हें शहरयार का यह शेर पढ़ना पड़े: उम्मीद से कम चश्म-ए-खरीदार में आए, हम लोग जरा देर से बाजार में आए।
विज्ञापन


लेखक बीबीसी, लंदन के पूर्व पत्रकार हैं

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें