हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति अपना जीवन समर्पित कर देने वाले लोगों की सूची में लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़े जिन सर्जकों का नाम लिया जाता है, उनमें डॉ. रामविलास शर्मा, गिरिजाकुमार माथुर, कुंवर नारायण, रघुवीर सहाय, कृष्णनारायण कक्कड़, रमा सिंह, डॉ.सूर्यप्रसाद दीक्षित, विनोद भारद्वाज, सुभाषचंद्र आर्य (मुद्रा राक्षस), प्रतापनारायण टंडन, इंदु जैन एवं राजी सेठ आदि के नाम प्रमुख हैं।
यह सच्चाई रेखांकित करने योग्य है कि इसी नवाबी किस्म के शहर से प्रगतिशील आंदोलन की शुरुआत सन 1936 में हुई। जिसका प्रथम अधिवेशन प्रेमचंद जी की अध्यक्षता में हुआ। हिंदी के वरिष्ठतम कवि कुंवरनारायण एवं कृष्ण नारायण कक्कड़ के सहयोग से एक पत्रिका `युग चेतना’ का प्रकाशन सन् 1954 में शुरू हुआ, जिसके प्रधान संपादक थे डॉ. देवराज।
डॉ. देवराज दर्शन और साहित्य सर्जन-चिंतन की दृष्टि से एक विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। उनकी हिंदी और अंग्रेजी में लगभग दो दर्जन पुस्तकें आज के पाठक की रुचि का विषय बन चुकी हैं। डॉ. देवराज विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग में मेटाफिजिक्स (तत्व मीमांसा) पढ़ाते थे।
सन् 1955 में छपी उनकी पुस्तक आधुनिक समीक्षा उन दिनों खासी चर्चा का विषय बनी थी। उनकी पुस्तक पढ़कर उनके दर्शनार्थ हम उनके `बादशाह बाग' स्थित आवास पर बिना बुलाए चले गए। डॉ. देवराज तो मिले नहीं, मिली उनकी बेटी- गोरी, छरहरी, कुछ-कुछ उदास सी। हमने परिचय दिया। वह बोली, `बैठिए। पापा आते ही होंगे, हो सकता है भूल भी गए हों कि घर लौटना है।'
दार्शनिक की बेटी एक पल ठहरी, फिर `तनिक धीरज रखें' कहकर भीतर चली गई। हम भौंचक्के से कुर्सी पर बैठ गए। फिर वही काया चाय के दो प्याले लिए आई। एक प्याला हमारी ओर बढ़ाती हुई बोली, `मेरा नाम नीरजा है। मैंने आपके बारे में सुना है।'
क्या? प्रश्न करने के बजाय हमने उसके चेहरे को गौर से देखा। उसके केश संवरे हुए नहीं थे। हम उसे देख रहे हैं, यह देखना शायद उसे अटपटा लगा हो, अस्तु उसने निर्विकार भाव से पूछा,`कुछ खाएंगे?' हमारे ना कहने के साथ ही उसकी आंखें अब ऊपर कॉर्निस पर बने गौरइया के नीड़ की ओर देखने लगीं।
शायद उसे चिंता थी कि वहां ऊपर खामोशी क्यों है। हमें उसकी आंखों का सूनापन देखकर `मां' की याद आई। मां भी अकसर ऊपर की छत पर अकेली बैठी आकाश की ओर टकटकी लगाए पता नहीं कहां खोई सी दीख जाया करती थी।
माथे पर गिर आए बालों को पीछे करते हुए उसने पूछा, `आपने लिखना कब शुरू किया?' हमने बताया हमारे नाना के बड़े भाई एक संन्यासी की सी जिंदगी बिताते हुए हमेशा कुछ लिखा करते थे, तब से। नीरजा ने बड़े संयत स्वर में टिप्पणी की, `संन्यास लिया थोड़े ही जाता है, वह तो भीतर से आता है। जैसे करुणा।'
उम्र में हमसे छोटी नीरजा की यह पंक्ति हमें थोड़ा अस्तव्यस्त कर गई। हमने विषय बदलकर डॉ. साहब की दिनचर्या के विषय में कुछ उखड़े से सवाल करने शुरू किए।
उसने कहा, `कोई चर्या हो, तो बताऊं। दिन, दोपहर, शाम, रात। फिर नया दिन, फिर वैसी ही धुंधभरी शाम।' हमें लगा, हमें रुकना नहीं चाहिए। चाय का प्याला रखकर हमने कहा, `युग चेतना के लिए एक रचना लाया था।' नीरजा बोली, `रुकने का मन नहीं, तो रचना छोड़ जाइए। यूं भी कौन किसी को रोक पाया है।'
दो दिन बाद डॉ. देवराज के यहां फिर जाना हुआ। कई शोधार्थी उनके पास बैठे थे। कमरे में घुसते हुए लगा कि कोई गंभीर विषय चल रहा है। दूर से नमन कर अपने लिए एक कोना तलाश कर हम भी बैठ गए।
डॉ. देवराज अस्तित्ववाद के प्रतिष्ठापक सारेन कीर्कगार्द की कृति आइदर/ऑर के विषय में बता रहे थे। ईश्वर अपने अकेलेपन से ऊबा। उसने आदम की सृष्टि की। फिर दोनों ऊबने लगे, तो उसने आदम की एक पसली से ईव की रचना की। इसी तरह कुछ दिन में तीनों ऊबने लगे, तब ईव ने (ईश्वर द्वारा बरजे जाने के बावजूद) ज्ञान का फल खा लिया।
परिणाम यह कि आदम और ईव, दोनों काम की गिरफ्त में आ गए। डॉ. देवराज ने यहां काम शब्द पर बल देते हुए `हाईजैक' शब्द का प्रयोग किया, कहा कि तरुणाई आई नहीं कि `वी आर हाईजैक्ड बाई ईरॉस।'
आदम और ईव की संतान केन और एबल भी ऊबे और इस तरह यह दुनिया बनी। अब हाल यह है कि सारी दुनिया ऊब रही है। इसी संदर्भ में डॉ. देवराज ने सार्त्र के उपन्यास (नौशिआ) उबकाई का उदाहरण दिया, जिसके नायक रोकांते के मन में आत्महत्या का विचार दौड़ा था।
पश्चिमी साहित्य और दर्शन में आत्महत्या करने वालों या आत्महत्या के विचार से आक्रांत होने वाले नायकों के बारे में जब डॉ. देवराज यह सब बता रहे थे, तभी जिस कोने में हम बैठे थे, वहां से परदे के पीछे हिलती सी एक छाया दिखी।
`तो क्या नीरजा यह सब सुन रही थी?' हमने अपने आपसे यह सवाल किया। हो सकता है वह उत्सुकतावश परदे के पीछे तक चली आई हो। चर्चा के बाद डॉ. देवराज ने कहा कि अभी हमारी रचना को वे ध्यान से पढ़ नहीं पाए हैं।
हमने उनसे यह भी निवेदन किया कि वे हमें अपनी मेटाफिजिक्स वाली क्लास में आ जाने दिया करें। उन्होंने कहा, `अवश्य, अवश्य, जरूर आओ। वैसे इसी तरह का `उपनिषद’ दो दिन बाद भी होगा। आ जाना।'
मन दो दिन बाद फिर बादशाह बाग चला गया। द्वार खटखटाया। नीरजा ने दरवाजा खोला। `अरे आप? बाकी के सब तो अभी आए ही नहीं। अब बैठिए और करिए प्रतीक्षा। अभी चाय भी नहीं मिलेगी। तब तक कुछ पढ़िए।'
जाते-जाते ऐसा कुछ उसने कहा, `जरा धैर्य नहीं।' हमें लगा कि नीरजा की झिड़कन में भी एक तरह का अपनापन है।
मेज पर डॉ. देवराज की कुछ पंक्तियां लिखी पड़ी थीं। शायद पैड खुला छोड़कर ही वे भीतर चले गए थे या भीतर थे।
यह बीसवीं सदी
पिछली सारी शताब्दियों से निराली
और विशिष्ट है इसका...
मन और मस्तिष्क बेहद पेचीदा और संश्लिष्ट है।
लगभग बीस मिनट बाद `उपनिषद' की शुरुआत हुई। डॉ. देवराज ने कहना शुरू किया, `तर्क द्वारा जिंदगी की पहेली को न सुलझा पाने की असहायता और मृत्यु के आटल्य से उद्भूत भय ने जिस स्थिति को जन्म दिया है, वह हास्यास्पद ही नहीं अनर्गल है। किंतु क्या इस अपरिभाषेय समस्या को आत्महत्या द्वारा सुलझाया जा सकता है।
अथवा क्या हत्या और आत्महत्या दोनों, अस्तित्व के खिलाफ विद्रोह व्यक्त करने के अलग-अलग ढंग हैं। दर्शन के क्षेत्र में आल्बेयर काम के दर्शन को, जिसका निर्वचन उसने `द रेबेल' नामक कृति में किया है, वह क्या नकारवाद के गाल पर एक तमाचा है? न भूलें, नकारवाद के जन्मदाता जैकोवी थे, जिसे तुर्गनेव ने अपने उपन्यास फादर्स ऐंड संस में पहली बार प्रतिष्ठापित किया।
जिंदगी की अनसुलझी प्रकृति को उद्घाटित करने के लिए। काम् ने जिन पात्रों को रचा है, वे एकदम आत्मनियोगी हैं। पुष्टि के लिए उसने ग्रीक पुराख्यान के एक पात्र सिसिफस को चुना है, जिसे ईश्वर से घृणा है। मृत्यु से विद्वेष रखता हुआ वह दिक् क्षेत्र में डूबता उतराता रहता है।
इस उद्दंडता की सजा उसे देवताओं ने यह कहकर दी है कि वह एक चट्टानी गोलाकार प्रस्तरखंड को नीचे से धक्का देता हुआ पहाड़ की ऊपरी चोटी तक ले जाएगा। सिसिफस बार-बार उस चट्टान को ऊपर तक ले जाता है, मगर बार-बार वह चट्टान उतनी ही तीव्रता से ढुनग कर फिर नीचे आ जाती है।
कुल मिलाकर मनुष्य जाति की समस्त उपलब्धियों की फलश्रुति यही होती है। चट्टान का पतनोन्मुख स्वभाव और मनुष्य की महत्वाकांक्षाओं के बीच एक अनवरत होड़ चलती रही है। हर सिकंदर, हर नेपोलियन और हिटलर का यही हाल होता है। वह नीचे आती चट्टान द्वारा कुचला जाता है। तो भी सूर्य न अपना उगना स्थगित करता है, न पृथ्वी अपना घूमना।
यदि यह व्यक्तिगत प्रारब्ध है, तो दुनिया में अब तक अभागों ने ही जन्म लिया है। क्योंकि सत्य-असत्य, भला-बुरा कुछ भी नहीं, इसलिए ऐसे नीतीतर समाज में जीने वाला यदि हत्या भी करे, तो भी समाज की रोजमर्रा की जिंदगी में कोई फर्क नहीं पड़ता और न ही आदमी की पीड़ा और यातना में कोई कमी आती है। इसके बाद डॉ. देवराज तात्विक मनोविज्ञान की ओर मुड़े।
उन्होंने कहा, `हत्या अक्षम्य है। मगर जहां तक आत्महत्या का प्रश्न है, आत्महत्या करने वाला समूचे हिग्वषय को धिक्कारता हुआ यह खामोश घोषणा करता है कि न कहीं कोई ईश्वर है, न कहीं कोई सुरक्षा। दुनिया सिर्फ मत्स्य न्याय के शिकंजे में फंसी शुरू से तड़प रही है। ऐसी दुनिया में जीते बने रहने के खिलाफ विद्रोह करता हुआ मैं स्वयं को मिटाकर इस अनर्गल त्रासदी में भाग लेने से इंकार करता हूं।'
यह कहकर डॉ. देवराज चुप हो गए। अगली बैठक में डॉ. देवराज ने एमील दुरखाइम की 1897 में प्रकाशित पुस्तक `आत्महत्या' के कुछ अंश पढ़े। जिसकी वजह से हम सभी अवसादग्रस्त हो गए। लगभग एक मास बाद डॉ. देवराज ने कहा कि उन्होंने मेरी रचना `युगचेतना' में प्रकाशित करने का मन बना लिया है।
सन् 1957 में डॉ. देवराज यूनेस्को के आमंत्रण पर अमरीका चले गए और हम भी लखनऊ विश्वविद्यालय की सोशलिस्ट पार्टी द्वारा संचालित कई तरह की गतिविधियों में उलझ गए। अर्से बाद कई सूत्रों द्वारा पता चला नीरजा ने आत्महत्या कर ली।