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संस्कृति के इस उपनयन संस्कार में हम

गौतम चटर्जी Published by: गौतम चटर्जी Updated Sun, 14 Mar 2021 03:10 AM IST
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human mind

इस साल के नोबेल भौतिक विज्ञानी रोजर पेनरोज की नई किताब का भारतीय संस्करण प्रकाशित हुआ है, द लार्ज, द स्मॉल ऐंड द ह्यूमन माइंड। शैडोज ऑफ द माइंड के बाद उन्हीं प्रश्नों पर संवाद करती यह उनकी अगली किताब है। इसी के साथ दिवंगत भौतिक शास्त्री डेविड बॉम की किताब भी आई है होलनेस ऐंड द इम्प्लीकेट ऑर्डर। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद अल्बर्ट आइंस्टीन के साथ काम कर भौतिक विज्ञान की दुनिया में एक नई दृष्टि देने वाले डेविड बॉम के जीवन का उत्तरार्ध जिद्दू कृष्णमूर्ति के साथ अर्थपूर्ण या रचनात्मक संवाद में बीता था। इसलिए उनके प्रयोगों और सिद्धांतों में दार्शनिक रहस्य की छाया भी मिलती है। उनका मुख्य शोध कहता है कि जो कुछ भी हमारे यथार्थ जीवन में घटता है, उससे पहले वह चेतना के एक अन्य स्तर पर घट चुका रहता है। इसे हम वस्तु जगत या वस्तुओं के यथार्थ जगत का छायालोक कह सकते हैं। ज्ञान के इस आलोक का यह वैज्ञानिक छायालोक हमें फिर पॉल डेविस, स्टीफन हॉकिंग और डेविड चाल्मर्स की स्थापनाओं में भी दिखता है। पेनरोज और डेविड बॉम की ये किताबें गणितीय भाषा में हमारे जीवन प्रश्नों और प्रकृति रहस्यों को नए छायालोक में देखती हैं। यह दृष्टि नई शती में नए छंग से संस्कारित हो रही हमारी जीवन शैली को प्रेरित और प्रतिकृत करती है। यह हमारी उस नई पीढ़ी का उपनयन संस्कार है, जिसके लिए शायद अभी वह तैयार नहीं है।



डिजिटल युग के बावजूद हमारी मेधावी युवा पीढ़ी अभी इस वैज्ञानिक संस्कार के लिए क्यों तैयार नहीं है, यह समझने की जरूरत है। नॉलेज और विज्डम, अंग्रेजी के इन दोनों शब्दों के लिए हम हिंदी में ज्ञान शब्द का ही प्रयोग करते हैं, जबकि नॉलेज का मतलब है जीवन और जगत का बाहरी ज्ञान या यथार्थ ज्ञान और विज्डम का अर्थ है सत्य या परम सत्य का ज्ञान। शिक्षा की भारतीय संहिता विद्यार्थी को यथार्थ ज्ञान के लिए तैयार करती है, जिसका एकमात्र उद्देश्य है रोजगार, अर्थ समृद्धि और सामाजिक प्रतिष्ठा। इस व्यवस्था में विज्डम और अच्छा व्यक्ति या योग्य विश्व नागरिक होने की कोई गुंजाइश नहीं है। यह सनातन और पारंपरिक विडंबना है कि जिस युवा को हम रोजगार के लिए तैयार करते हैं, उसी से हम अच्छे व्यक्ति की तरह व्यवहार की उम्मीद भी रखते हैं, क्योंकि हम शिक्षित होने के अर्थ को ज्ञानी और सुसंस्कृत और अच्छा मनुष्य के लिए भी प्रतिष्ठित कर चुके हैं, जो अब तक सिरे से गलत सिद्ध होता आ रहा है।


जबकि प्राचीन भारत और पूरे विश्व में ज्ञान के लिए युवा को पहले अच्छा होने के नैतिक दायित्व से परिचित कराया जाता था। वैदिक ऋषियों से लेकर सुकरात तक और लाओत्से तथा कन्फ्यूशियस से लेकर बुद्ध तक यही परंपरा मध्य काल तक दिखती है। आधुनिक भारत में इस शिक्षा व्यवस्था का निरंतर लोप होता चला गया। दर्शन का साथ लेकर चल रहे आधुनिक विज्ञानी युवाओं का नए ढंग से उपनयन संस्कार करने को शपथबद्ध हैं। उनके विज्ञान में क्वांटम भौतिकी के साथ बुद्ध भी हैं और वैदिक दृष्टि भी, सुकरात भी हैं और कान्ट और श्री अरविंद भी। वे शिक्षा को दोबारा विज्डम यानी अर्थ के ज्ञान की गरिमा और गौरव सौंपना चाह रहे हैं। वस्तु जगत को भ्रम कहने का साहस कभी विज्ञानी सोच भी नहीं सकता था। लेकिन श्रोडिंगर और हाइजेन्बर्ग जैसे क्वान्टम विज्ञानियों ने यह गैलीलियो साहस दिखाया। यह गैलीलियो साहस मनुष्य को सत्य की कसौटी पर देखने और दिखाने का उपनयन संस्कार है। इसी संस्कार का विस्तार हमें डेविड बॉम और पेनरोज में दिखता है।


भारतीय मानस में आदि शंकर का यह कथन सदियों से अंकित है कि यह संसार माया है। सांप और रस्सी के भ्रम का उनका रूपक भी भारतीय दर्शन साहित्य में प्रसिद्ध दृष्टि है। जेन और ताओ ऋषि भी यह कहते हैं कि ध्यान से पहले पहाड़ है, फिर पहाड़ नहीं है, ध्यान के बाद फिर पहाड़ है। कश्मीर के शैव ऋषि जैसे अभिनवगुप्त कहते हैं कि यह संसार उसी आत्मा की विभूति है, जिसे हम शिव कहते हैं। डेविड बॉम थिंग, थॉट और रियलिटी को लेकर यानी वस्तु, विचार और यथार्थ को लेकर मंथन करते हैं और उसके मूल अर्थ को निरुक्ति से लेकर बुद्ध देशनाओं तक देखने की कोशिश करते हैं।


सारांश यह हुआ कि संसार भ्रम नहीं, न ही रहस्य है, बल्कि एक ही संसार को लेकर जो असंख्य मन असंख्य संसार की रचना करते हैं, वे भ्रम हैं, यथार्थ की जगह छाया है। इस छायालोक के अंत से रियल थिंग या वस्तु का यथार्थ ज्ञान संभव है। यह अर्थ कान्ट की भाषा में उसी वस्तु में निहित है, जिसके रूप की छवि हमारे मन में अंकित है, जो एक समानांतर जगत की रचना कर चुकी है, जो ऐसी माया है, जिसके आवरण में सत्य छिप गया है। इस उपनयन संस्कार से अच्छा मनुष्य जीवन अवश्यंभावी है, जो भौतिक जीवन को वंचित करता नहीं, उल्टे वृहत्तर प्रकृति सत्य के संतुलन के साथ उसे संतुलित रखता है।

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