जो मदर थीं और मान्य थीं, ईसाई धर्मगुरु पोप फ्रांसिस ने वेटिकन के मुख्य चौराहे के विशाल व भव्य समारोह में उन्हें संत घोषित किया-सेंट टेरेसा ऑफ कोलकाता। शायद ईसाई धर्मपीठ द्वारा दिया जाने वाला यह सबसे बड़ा सम्मान है, जो कहते हैं कि बिरलों को मिलता है। मदर टेरेसा की मृत्यु के बाद से ही यह कोशिश चल रही थी कि उन्हें मदर से ज्यादा ऊंची जगह दी जाए। ईसाई धर्म संस्थान भी यह समझ रहा था कि जल्दी से कोई संत नहीं गढ़ा गया, तो कहीं लोग यह न समझने लगें कि इस धर्म में आंतरिक बल कम हो रहा है, इसलिए मात्र 17 वर्षों के भीतर मदर संत बना दी गईं। ईसाई धर्म और ईसा मसीह के प्रति मन-प्राणों से समर्पित मदर टेरेसा को मिलने वाला यह सम्मान आखिर क्या है, जिसका जश्न मनाने में हम भारतीय भी पंक्तिबद्ध खड़े थे? और पंक्ति में थे कौन-कौन? केंद्र सरकार, जिसकी तरफ से सुषमा स्वराज्य अपना दल लेकर गईं; बंगाल की ममता बनर्जी और दिल्ली के अरविंद केजरीवाल गए।
मेरे सामने सवाल यह है कि जिन मदर टेरेसा की अकूत व अकथनीय सेवा के हम सब ऋणी हैं, वे मां बन कर ही हमारी सबसे बड़ी बन गई थीं कि अब संत बनकर? उन्हें संत बनाकर अपने धर्मपीठ में स्थान देने वाले ईसाई धर्मावलंबी चाहे जो भी सोचें, हमें तो यह सोचना ही चाहिए कि क्या हमें ‘मां टेरेसा’ छोटी लगती रही हैं? मदर टेरेसा ईसाई सेविका थीं, जिन्होंने कोलकाता से शुरू कर देश में कितनी ही जगहों पर अपने सेवा-केंद्र शुरू किए, जहां अनाथों, रोगियों, बेसहारा दरिद्रों आदि की अहर्निश सेवा चलती थी। मूक और नि:स्वार्थ सेवा का ऐसा बड़ा आयोजन, मुझे पता नहीं है कि किसी दूसरे धर्म के किसी अनुयायी ने चलाया हो और चलाए रखा हो। इसलिए तो वह मां थीं। हर मां अपने घर की ऐसी ही मूक व नि:स्वार्थ सेवा करती है। बस, फर्क इतना ही हुआ कि मदर टेरेसा ने अपने घर का आंगन बहुत बड़ा बना लिया था। उनके काम और उनकी मर्यादा के बारे में बहुत सारे सवाल उठाए जाते हैं और ज्यादातर उन लोगों द्वारा उठाए जाते हैं, जो अपने जीवन व कार्य में मदर टेरेसा जैसा समर्पण तो नहीं ला पाए, लेकिन जो उससे मिलने वाली पहचान से ईर्ष्या करते हैं। लेकिन मदर टेरेसा किसी के लिए भी ईर्ष्या का नहीं, समर्पण का मानक बननी चाहिए, क्योंकि कृतज्ञ समर्पण ही उनकी पूंजी थी। उन्होंने एक जगह कहा भी कि राजमार्गों पर नहीं, अनजान रास्तों पर चलिए। इससे हम कहीं पहुंचें या न पहुंचें, एक पगडंडी तो बन ही जाएगी जिस पर दूसरे भी चल सकेंगे। सेवा की ऐसी ही पगडंडियों की साधक थीं मदर टेरेसा।
वह किसी भी तरह धर्मों की एकात्मता का शोध करने वाली जागृत बौद्धिक नहीं थीं। वह ईसाई धर्म से अनुप्राणित समर्पित सेविका थीं, जिन्हें हर दुखी, बेसहारा और अनचाहेपन के भाव से विकल मानव में प्रभु ईसा के दर्शन होते थे और उसकी सेवा ईसा की सेवा है, ऐसा मानकर वह सेवारत रहती थीं। मां से संत बनाने में इन बातों का कम, इसका आधार ज्यादा लिया गया कि मदर ने चमत्कार कितने किए? चमत्कार धार्मिक आडंबर का सबसे अंधेरा कोना होता है, जो अंधविश्वास फैलाता है, अवैज्ञानिकता को बढ़ाता है और हमारे आत्मविश्वास की धज्जियां उड़ाता है। वह मां थीं तो हमारी थीं; संत बन गईं, तो धर्म के मतलब की रह गईं। हम मां टेरेसा के ऋणी हैं।